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अपनी बात दार्जिलिंग
01-Feb-2016 12:00 AM 3245     

कवि दार्जिलिंग के होटल ठहरा था। सुबह सोकर उठा खिड़की खोली, तो भौंचक रह गया। हिमाच्छादित कंचनजंगा पर सुनहली धूप की पृष्ठभूमि में रंग-बिरंगे फूलों का मेला। निहारता ही रह गया कवि। फिर उसका मन मान से भर गया। मेरी भागीदारी एवम् उपस्थिति के बग़ैर प्रकृति ने इतना सुन्दर आयोजन सजा लिया!
राजशेखर को पहली जनवरी को कालका मेल से कलकत्ते से चण्डीगढ़ आना था। जब वह ट्रेन पर चढ़ने के लिए हावड़ा जंक्शन पहुँचा तो भौंचक सा रह गया। प्लैटफॉर्म और ट्रेन को बारात की तरह सजाया गया था। आठ नम्बर प्लैटफॉर्म सुरुचिपूर्ण तरीके से बैलूनों और झंडों से सजाया हुआ था। यात्रियों के बीच चॉकलेट बाँटे जा रहे थे। ट्रेन पर लगे बोर्ड के इश्तिहार को पढ़ने से उसे मालूम हुआ कि कालका मेल आज से डेढ़ सौ साल पहले पहली जनवरी को ही पहली बार सफर पर निकला था। आज का समारोह उस ऐतिहासिक अभियान को समर्पित था। राजशेखर कवि नहीं है, वह रामकृष्ण मिशन स्कूल की प्रज्ञा से दीक्षित एक वकील है। उसके मस्तिष्क में उन्नीसवीं सदी में ईस्ट इंडिया कम्पनी, बीसवीं सदी में ब्रिाटिश हुकूमत, स्वाधीनता संग्राम और फिर आजाद भारत का इक्कीसवीं सदी में प्रवेश -- इस पूरी यात्रा की तस्वीरें फिल्म की रील की तरह उभड़ आर्इं। 1अप/2डाउन ईस्ट इंडियन रेल के नाम से 1 जनवरी 1866 से इस ट्रेन की यात्रा हावड़ा और दिल्ली के बीच प्रारम्भ हुई। और बाद में इसे कालका तक बढ़ा दिया गया। कालका से शिमला को छोटी लाइन की रेल जोड़ती थी। उस वक्त कलकत्ता देश की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी और शिमला शीतकालीन। देश पर गोरे प्रभुओं की हुकूमत थी। कालका मेल दोनों राजधानियों को जोड़ता था। इसी ट्रेन से गर्मी शुरु होते ही पूरा सरकारी अमला शिमला के लिए प्रस्थान करता और फिर मौसम के अनुकूल होने पर वापस कलकत्ता आता।
1850 के पहले देश में रेललाइन नहीं थी 1853 ई. में पहली रेलगाड़ी चली। पूर्वी भारत में पहली रेलगाड़ी ने 15 अगस्त, 1854 को हावड़ा और हुगली के बीच की 24 मील की दूरी तय की थी। रेलवे का विकास शुरू में थोड़ी सी अवधि तक ईस्ट इंडिया कम्पनी और फिर बाद में उपनिवेशी ब्रिाटिश सरकार ने किया। सन् 1947 में औपनिवेशिक शासन से मुक्त होने पर ही भारतीय यात्री रेलवे की योजना में प्राथमिकता पा सके।
तब देश के संसाधनों का व्यावसायिक दोहन करने तथा गोरे प्रभुओं को सुविधाजनक आवागमन का साधन उपलब्ध कराने का उद्देश्य था इसका। तब इस ट्रेन में अंग्रेजी हुकूमत के उच्च अधिकारी सफर करते थे। अन्य यात्रियों के लिए इस ट्रेन में यात्रा संभव नहीं थी। वायसराय वाहन से सीधे ट्रेन के कोच तक पहुंच सकें, इसके लिए हावड़ा और कालका, दोनों ही स्टेशन पर इंटरनल कैरेज की व्यवस्था की गई थी। कालका में तो नहीं, पर हावड़ा में प्लेटफॉर्म 8 और 9 के बीच आज भी यह सुविधा मौजूद है, अब इसका उपयोग आमलोग करते हैं। बड़ा सरकारी अमला अपने वाहनों से सीधे रेलवे कोचों के दरवाजों तक चले आते थे। हावड़ा के 8 तथा 9 नम्बर के प्लैटफॉर्म अभी भी इसकी गवाही देते हैं। उनका प्राथमिक उद्देश्य देश पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए सिपाहियों को ढोना, ब्रिाटेन के सूती मिलों के लिए कपास का निर्यात करने के लिए और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना था।
सन् 1941 ई. में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के कलकत्ते में ब्रिाटिश प्रशासन के सुरक्षा घेरे से छिपकर निकल कर रहस्यमय और सनसनीखेज तरीके से अफगानिस्तान के रास्ते जर्मनी के लिए पलायन की वारदात से भी कालका मेल जुड़ा हुआ है। गोमो जंक्शन से इसी ट्रेन द्वारा वे दिल्ली तक आए थे।
कालका मेल का साहित्य से भी नजदीकी रिश्ता रहा है। बांग्ला साहित्य में फेलूदा लोकप्रिय निजी गुप्तचर हैं। वे अपने को सत्यान्वेषी कहते हैं। प्रतिष्ठित फिल्मकार एवम् बांग्ला साहित्यिक सत्यजीत राय की फिल्मों, उपन्यास और कहानियों के केन्द्र में फेलूदा रहे हैं। फेलूदा ने कालका मेल पर बहुत सारे अभियान किए हैं।
एक और अभिनव आयोजन। जनवरी, 2016 का पहला पखवारा। दिल्ली की सड़कों पर की अफरातफरी में कमी महसूस हो रही थी। परिवहन की विशृंखलता में कमी दिख रही थी। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश उन अनेक सम्पन्न और सामान्य लोगों में शामिल थे, जो कार-पुलिंग यानी अपने निजी वाहनों की शेयरिंग कर रहे थे। वर्ग-चेतना, स्टैटस तथा अहम् के प्रति सजग अनेक लोग मेट्रो और बस जैसे सार्वजनिक परिवहन के साधनों का उपयोग कर रहे थे। अपनी सम्पन्नता के उपभोग एवम् प्रदर्शन की प्रवृत्ति पर अंकुश से सामूहिक आयोजन सम्भव हो पाया क्योंकि अब इस तथ्य की अनदेखी करना सम्भव नहीं रह गया है कि अपने पर्यावरण पर हमारे क्रमशः तेज होते हुए हस्तक्षेप भविष्य में इस धरती पर मनुष्य के जीवित रहने के लिए खतरनाक हैं।
इस आयोजन की पृष्ठभूमि। दिल्ली में खतरनाक स्तर पर पहुँचे हुए वायु-प्रदूषण पर उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियाँ और अवलोकन के साथ विभिन्न पर्यावरणविदों की चिन्ता एवम् चेतावनी के आलोक में दिल्ली सरकार का एक प्रयोग था यह। अब धरती के संसाधनों पर हमारी अभूतपूर्व पहुँच एवम् उनसे छेड़छाड़ करने की सामथ्र्य के अनियन्त्रित उपयोग के दुष्परिणाम की अनदेखी करना मुमकिन नहीं रह गया है।
अंगरेजी के कवि शेली की एक कविता का शीर्षक है- ऑज़ायमैंडियास। इसमें एक विशाल एवम् समृद्ध साम्राज्य के भग्नावशेष का वर्णन है। एक समृद्ध एवम् शक्तिशाली साम्राज्य बालू के विस्तार में कैसे तब्दील हो गया? कठिन प्रयास से निर्मित की गई इन भव्य संरचनाओं को छोड़कर इनके महान निर्माता अन्तध्र्यान हो गए। कविता में वाचक प्राचीन सभ्यताओं के देश मिरुा से लौटे यायावर से मुलाकात का जिक्र करता है। यायावर रेगिस्तान के मध्य में एक भग्न मूर्ति की चर्चा करता है। मूर्ति टूट गई है, पर उसके चेहरे की अभिव्यक्ति अभी भी स्पष्ट हैं। चेहरे कड़क और शासक की तरह शक्तिशाली प्रतीत होता है। शासक दुष्ट होते हुए भी प्रजावत्सल था।
यायावर ने मूर्ति की पीठिका पर शिलालेख पढ़ा, जिसमें ऑज़ियामैण्डियास आने जाने वाले पथिकों को कहता है ---- मेरे चारों ओर देखो, कितने विस्मयकारी रूप से महिमामय हूँ मैं। लेकिन उसके महिमामय होने का कोई साक्ष्य अगल बगल में नहीं है। दूर-दूर तक, जहाँ तक आँखें जा सकती हैं, बालू ही बालू फैला हुआ है।
हम कोलकाता के अजायबघर गए थे। वहां और वस्तुओं के अलावे एक मिरुा की पाँच हजार साल पहले की एक ममी देखी तो मानव समाज और सभ्यता के लम्बे एवम् जटिल सफर और चढ़ाव उतार की तस्वीरें चेतना में उभड़ने लगीं। यह ममी सुदूर अतीत में एक विकसित सभ्यता के अस्तित्व की गवाही दे रही थी। प्राचीन मिरुा एवम् मेसोपाटामिया के समसामयिक सिन्धु घाटी की सभ्यता के भग्नावशेषों के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका की सीमा क्षेत्र के अन्तर्गत ऐनासाज़ी तथा कैहोकिया, मध्य अमेरिका के माया नगर, दक्षिण अमेरिका में मॉशे तथा तिवानाकु, अफ्रीका में ग्रेट ज़ाम्विबिया विलुप्त हुई सभ्यताओं के कई एक उदाहरण हैं। आज वि?ाायन के असर से पर्यावरणीय प्रदूषण पूरे जीव-मण्डल को विलुप्ति के कगार पर ले जा सकता है।
पर्यावरण का कुप्रबन्धन करते हुए मनुष्य समाज के प्रबन्धन किए जाने के प्रयोग पहले अनेकों बार किए जा चुके हैं। नतीजा हमारे सामने है, सीख हमें लेनी है।

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