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अनुवाद की समस्या
01-Jun-2018 03:40 PM 6189     

अनुवाद एक अत्यंत कठिन दायित्व है। रचनाकार किसी एक भाषा में सर्जना करता है, जबकि अनुवादक को एक ही समय में दो भिन्न भाषा और परिवेश/वातावरण को साधना होता है। परिवेश और वातावरण पर बल देते हुए राधाकृष्णन ने गीता के अनुवाद के बहाने कहा था- "गीता के किसी भी अनुवाद में वह प्रभाव और चारुता नहीं आ सकती, जो मूल में है। इसका माधुर्य और शब्दों का जादू किसी भी अन्य माध्यम में ज्यों का त्यों ला पाना बहुत कठिन है। अनुवादक का यत्न विचार को ज्यों का त्यों प्रस्तुत करने का रहता है, परन्तु वह शब्दों की आत्मा को पूरी तरह सामने नहीं ला सकता। वह पाठक में उन मनोभावों को नहीं जगा सकता, जिनमें कि वह विचार उत्पन्न हुआ था।" (राधाकृष्णन, भगवद्गीता (हिन्दी), राजपाल एण्ड संज, भूमिका, पृष्ठ 8)
एक अनुवादक के लिए स्थानीय संस्कृति और परिवेश का ज्ञान आवश्यक है। कई साल पहले एक इतिहासकार वीर कुंवर सिंह पर शोध के सिलसिले में भारत आये थे। उन्होंने एक फाइल में "डद्वद्धण्त्" शब्द देखा जिस पर कुंवर सिंह ने कभी एक लाख रुपये खर्च किये थे। उक्त इतिहासकार ने लिखा कि वीर कुंवर सिंह की एक "बूढ़ी" हो चली रखैल थी जिस पर उन्होंने रुपये खर्च किये थे। एक जमींदार के बारे में ऐसा निष्कर्ष निकालना तनिक स्वाभाविक और सुविधाजनक भी था। कुछ दिनों बाद उसी फाइल को एक बिहारी इतिहासकार ने देखा और "डद्वद्धण्त्" को "बरही" पढ़ा। लिखा कि कुंवर सिंह ने पोते की बरही पर लाख रुपये खर्च किये थे। यद्यपि यह किस्सा है, लेकिन है सारगर्भित। कहने की ज़रूरत नहीं कि वाल्टर हाउजर द्वारा की गई ऐसी भूलों की ओर के.के. शर्मा ने उचित ही हमारा ध्यान आकर्षित किया है।
रवींद्रनाथ ठाकुर ने एक बार पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी से कहा था : "हिन्दी मैं पढ़ लेता हूँ, सामान्यतः उसका अर्थ भी समझ लेता हूँ, किन्तु शब्दों के साथ जो वातावरण लिपटा होता है, उसे मैं नहीं समझ सकता। सच तो यह है कि शब्दों के साथ लिपटे हुए वातावरण का ज्ञान मुझे अपनी भाषा को छोड़कर और कहीं भी नहीं होता, यहां तक कि अंग्रेजी में भी नहीं।" (दिनकर, संस्मरण और श्रद्धांजलियां, पृष्ठ 79) गुरुदेव से बातचीत के उपरांत चतुर्वेदी जी ने कहा, "दिनकर जी, रवींद्रनाथ स्वीकार करते हैं कि अँगरेजी शब्दों के साथ लिपटे हुए वातावरण को वे समझ नहीं पाते। यह एक बात है, जिसकी खबर उन सभी भारतीय लेखकों तक पहुंचा दी जानी चाहिए, जो अपनी भाषाएं छोड़कर अँगरेजी में लिख रहे हैं, विशेषतः कविताएं लिख रहे हैं।" (वही) इसलिए, जो दोनों भाषा का "मर्म" नहीं जानता, अच्छा अनुवादक नहीं हो सकता। अर्थ का अनर्थ तो कोई भी कर सकता है!
अर्थ का अनर्थ तब ज्यादा ही होता है जब हम शब्दशः अनुवाद कर देना चाहते हैं। हर भाषा की अपनी एक खास प्रकृति है। इसलिए जिस भाषा में हम अनुवाद कर रहे होते हैं, उसकी प्रकृति, उसके मिजाज का रक्षण आवश्यक हो जाता है। शब्दशः अनुवाद एक खतरनाक बीमारी है, क्योंकि एक भाषा के शब्द हू-ब-हू दूसरी भाषा में अक्सर नहीं मिलते। कई बार शब्द महज शब्द नहीं होते, उनके साथ एक अवधारणा जुड़ी होती है। उन अवधारणाओं का अनुवाद किसी भी विदेशी भाषा में, जहां वैसी किसी अवधारणा का अस्तित्व न हो, मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव कार्य है। एक अच्छे अनुवादक को भाषा की इस सीमा की मर्यादा समझनी होगी। नहीं तो क्या ज़रूरत थी कि अंग्रेजी की किताबों अथवा शब्दकोशों में स्वदेशी, सत्याग्रह और अहिंसा जैसे अवधारणात्मक पद ज्यों के त्यों उठा लिये जाते? हिन्दी में भी ठीक अंग्रेजी की तरह अनगिनत शब्द हूबहू ले लिये गये हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि आज भी हम इस बहस से मुक्त नहीं हो सके हैं कि "सेकुलरिज्म" और "धर्मनिरपेक्षता" तथा "धर्म" और "रिलीजन" एक ही चीज हैं कि भिन्न हैं। यह समस्या तब और विकट रूप में प्रस्तुत होती है जब हम बोली के शब्दों का अनुवाद करना चाहते हैं। बोली के शब्दों और भंगिमाओं का अनुवाद जब उसी देश की भाषा में असंभव है तो विदेशी भाषा के बारे में क्या कहा जाये। क्या रेणु का "मैला आँचल" उपन्यास बोली के शब्दों को छोड़कर रचा जा सकता था? देवेंद्र सत्यार्थी का विश्वास करें तो स्त्री गीतों में जो दर्द और करुणा है उसका अनुवाद दुनिया की अन्य किसी भी भाषा में मुश्किल है।
समय में बदलाव के साथ शब्द के अर्थ भी बदलते रहे हैं। वेदों का अनुवाद आज की संस्कृत भाषा के प्रचलित शब्दार्थों के सहारे नहीं हो सकता, ठीक जैसे शेक्सपीयर के जमाने की अंग्रेजी का अनुवाद आज के प्रचलित शब्दों और अर्थों के सहारे असंभव है। पाणिनि जब निरुक्त की रचना कर रहे थे तो इस समस्या से भी जूझे थे। लगभग चार सौ शब्द थे जिनका ओर-छोर पाणिनि को ज्ञात नहीं हो पा रहा था। इस वैयाकरण ने उन शब्दों की एक सूची भी दी है। इसलिए एक अच्छे अनुवादक से उम्मीद की जाती है कि भाषा की समझ के साथ ही उसका इतिहास बोध भी विकसित हो।
प्रत्येक विषय की अपनी भाषा है, उसके खास पारिभाषिक शब्द हैं जिनकी बारीकी का पता उस विषय के जानकार को ही होता है। इसलिए अनुवाद की आदर्श स्थिति यह है कि कविता का अनुवाद कवि करे, कहानी का अनुवाद कहानीकार और समाज विज्ञान की पुस्तकों का अनुवाद कोई समाज विज्ञानी ही करे। तभी विषय के साथ न्याय की उम्मीद की जा सकती है।
अनुवाद की एक समस्या श्रेष्ठता बोध और हीनता बोध की भावना भी है। हम किसी भाषा को श्रेष्ठ मान लेते हैं तो किसी को हीन। हम भारतीय विदेशी भाषा के शब्दों का शुद्ध उच्चारण करने की कोशिश करते हैं। हवेनत्सांग और माओत्सेतुंग को वांगच्वांग तथा माओजेडोंग होते देर नहीं लगती लेकिन अंग्रेजी काल में मिश्र, गुप्त और मौर्य जो मिश्रा, गुप्ता, मौर्या बना वह आज भी जारी है। हिन्दी अनुवादकों में निज भाषा को लेकर एक हीनता, उपेक्षा और अगंभीरता का भाव है। हिन्दी अनुवाद की शायद ही कोई किताब हो (एनसीईआरटी अपवाद है) जिसमें इतिहासकार बिपन चंद्र का नाम बिपिन चंद्र न लिखा हो। अंग्रेजी की किताब में शायद ही कहीं बिपिन लिखा मिले।
इन सब के बीच कुछ अनुवादों ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया है। तोलस्तोय की किताब का "पुनरुत्थान" नाम से भीष्म साहनी का अनुवाद और नेहरू की "डिस्कवरी ऑफ इंडिया" का "हिंदुस्तान की कहानी" नाम से सस्ता साहित्य मंडल का अनुवाद उम्दा कहा जा सकता है। नेहरू की ही "लेटर्स फ्रॉम ए फादर टू हिज डॉटर" के अनुवादक प्रेमचंद जी हैं। उस अनुवाद पर कौन टिप्पणी कर सकता है! हावर्ड फॉस्ट के उपन्यास का अमृतराय ने "आदिविद्रोही" नाम से बेजोड़ अनुवाद किया है।

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