ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अंतिम व्यक्ति को वै·िाक करने का स्वप्न
01-Jan-2016 12:00 AM 1742     

वर्ष दो हजार पंद्रह की दूसरी छमाही का आरम्भ भारत के लिये अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। इस समय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने "डिजिटल इंडिया' योजना का उद्घाटन किया, जिसमें द इंटरनेट से शासन में सुधार की शक्ति, रोजगार सृजन और नई-नई सम्भावनाओं का सृजन कर भारत के वंचितों और सुविधा सम्पन्न लोगों के बीच की खाई को पाटने की संभाविता बतायी गयी। यह कोई एकाएक घटना नहीं थी। पूर्ववर्ती सरकारों ने भी इस दिशा में प्रयत्न किया है और यह क्रांति पहले से ही चल रही है। खासकर रोज हजारों लोग द इंटरनेट से जुड़ रहे हैं और बढ़ती तादाद में लोग पत्र व्यवहार, मनोरंजन, शॉपिंग, पढ़ाई, रोजगार, विज्ञापन, सामाजिकता और जीवनसाथी ढूँढने हेतु इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के लिए यह आवश्यक है कि सूचना और संचार की यह क्रांति विस्तृत पैमाने पर सर्वसुलभ हो और इसका लाभ सुदूर भारत के गाँवों के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। इस कार्यक्रम की तीन मुख्य बातें बतायी गयी हैं : एक- डिजिटल आधारभूत संरचनाओं का निर्माण, दो- सरकारी सेवाओं को ऑनलाइन करना, और तीन- आम नागरिकों को डिजिटल सामथ्र्य प्रदान करना। पहली बात दूसरे के लिए आवश्यक है और तीसरी बात कार्यक्रम की सफलता है। डिजिटल इंडिया का सारा दारोमदार उच्च गति युक्त  और सस्ती इंटरनेट सेवा के सार्वत्रिक पहुँच पर आश्रित है। यह प्रत्याशा है कि देश में वर्ष 2018-19 तक 50 करोड़ लोग इंटरनेट उपभोक्ता के बेंचमार्क को पार कर जायेंगे। इसका मतलब यह है कि तब भी एक अरब लोग इससे वंचित रहेंगे। ये ज़्यादातर गाँवों के रहने वाले लोग हैं, जहाँ डिजिटल आधारभूत संरचना का विकास करना अभी बाकी है। लेकिन केंद्र और राज्यों के बीच का तनाव "बहुत कठिन है डगर पनघट की' दिखाता है। इसके अलावे, आने वाले वर्षों में जब ग्रामीण बाज़ार बढ़ेंगे, तब कम मूल्य वाली नई और बिना रुकावट वाली प्रौद्योगिकी की ज़रूरत बाज़ार बढ़ाने के लिए होगी। इसके साथ ही साथ मात्र इंटरनेट जुड़ाव से कुछ नहीं होगा, द इंटरनेट कनेक्शन की गुणवत्ता और उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा यह सुनिश्चित करेंगे कि यह आम आदमी के जीवन में कितना घुल- मिल पायेगा? आज भी शहरों में मोबाइल उपभोक्ताओं को मात्र 2जी-3जी सर्विस उपलब्ध है और 3जी सेवा का लाभ केवल उच्च आय वर्ग के लोग उठा पाते हैं। 4जी सेवा तो कई मोबाइल सेवा प्रदाता देते ही नहीं हैं। द इंटरनेट सुरक्षा भी चिंता का क्षेत्र है। अगर लोग पायेंगे कि यह तकनीक उनका डेटा, परिचय या पैसा चुरा लेता है तो सब धरा का धरा रह जायेगा।
यद्यपि एक बार सभी चीजें धरातल पर आ जाएंगी तो यह मानना उचित होगा कि अन्य योजनाएँ भी परवान चढ़ेंगी - चाहे यह डिजिटल शासन, उपभोक्ता बिल देना, ऑनलाइन डॉक्यूमेंट रखना, फॉर्म या निविदा भरना, परीक्षाएँ देना या फिर इ-कॉमर्स का हो। ऑनलाइन बाज़ार ने पहले ही अपना स्वभाव बदल लिया है। फिर डिजिटल उद्यमिता में सर्वप्रथम पारदर्शिता और उसके बाद खुदरा व्यापार का आधार विस्तृत करना और अंततः उपभोक्ताओं के बीच अपने प्रतियोगियों से पहले और कम मूल्य पर सामग्री उपलब्ध कराना है। अंतिम बात इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह आम व्यक्ति और श्रम बाजार के लिए स्वातंत्र्य का साधन होगा।
जैसे ही युवा अपना ई-फर्म बनाता है, वह मात्र राज्य के लिए रोजगार सृजन के बोझ को कम नहीं करता है, अपितु वह कई नवाचरण युक्त समाधान की संभावना भी बन सकता है। इसके अतिरिक्त द इंटरनेट पारम्परिक रोजगार, जैसे- ज़्यादा इलेक्ट्रॉनिक सामानों और ज़्यादा कुशल श्रमिकों का उत्पादन, ज़्यादा तकनीकी सहायता केंद्रों की स्थापना इत्यादि का माहौल देते हुए "मेक इन इंडिया' कार्यक्रम को भी प्रत्यक्षतः पोषित करेगा।
यह सब भारत जैसे विस्तृत भूभाग वाले विकासशील देश के लिए स्वप्न जैसा है। अतएव डिजिटल इण्डिया के स्वप्न महल के उन नौ स्तम्भों के महत्व और सरकार के द्वारा उन्हें लागू करने में आने वाली चुनौतियों का जिक्र ज़रूरी है।
ब्राॉडबैंड हाईवे : डिजिटल इंडिया का पहला लक्ष्य राष्ट्रीय सूचना आधारभूत संरचना के नाम से ब्राॉडबैंड नेटवर्क को प्राप्त करना है ताकि भारत के सभी शहरों, छोटे नगरों और 2 लाख 50 हजार गाँवों को डेटा केंद्र और नेटवर्क निकाय सहित इससे वर्ष 2016 के अंत तक जोड़ा जा सके। यह बहुत बड़ा स्वप्न है। अगर यह सफल हुआ तो यह आम नागरिकों के बहुमाध्यमी सूचनाओं, विषयवार रुाोतों और सेवाओं तक पहुँच को रूपांतरित करने के अलावे सरकार को भी सूचनाओं को इकट्ठा करने में मददगार साबित होगा। हालाँकि मात्र केबल बिछ जाना यह सुनिश्चित नहीं करता है कि लोग इसका इस्तेमाल करेंगे ही। ब्राॉडबैंड और राष्ट्रव्यापी फाइबर - ऑप्टिक आधारभूत संरचना होने के वर्षों बाद भी अभी भारत में मात्र डेढ़ करोड़ तार से जुड़े ब्राॉडबैंड उपभोक्ता हैं। यद्यपि मोबाइल ब्राॉडबैंड इस्तेमाल में अपार वृद्धि हुई है, अभी मात्र 8.5 करोड़ लोग फेसबुक, व्हाट्सएप और चित्र तथा वीडियो को साझा करने के लिए इससे जुड़े हैं। अनुभव कहता है कि मात्र ब्राॉडबैंड उपलब्धता ही नहीं, बल्कि खाली पाइप की जगह उपभोक्ता सामग्री ही नेटवर्क इस्तेमाल को बढ़ावा देता है और उपभोक्ता सामग्री या कंटेंट क्रिएशन सरकारी कार्यक्षेत्र नहीं है। अतएव डिजिटल इंडिया कार्यक्रम टेलिकॉम कंपनियों और दूसरे नए उद्यमियों के बीच सेवा और सामग्री हेतु करार की अपेक्षा रखता है।
मोबाइल/दूरभाष सेवा की सार्वत्रिक पहुँच : यह वर्ष 2018 तक मोबाइल नेटवर्क के सार्वत्रिक पहुँच पर केंद्रित है। यद्यपि मोबाइल सेवा की पहुँच भारत की अधिसंख्य आबादी तक हो गयी है, तथापि अभी 42 हजार 300 गाँवों को इससे जुड़ना बाकी है। इसके अलावे सार्वत्रिक पहुँच ही नेटवर्क के सही रूप में चालू होने की गारन्टी नहीं देते हैं। अभी भी भारत के बड़े-बड़े शहरों में मोबाइल नेटवर्क पर दवाब के कारण कॉल ड्रॉप या कॉल नहीं हो पाने या फिर नेट कनेक्ट नहीं हो सकने की शिकायतें मिलती हैं। स्पेक्ट्रम की कमी भी निम्न स्तरीय और उच्च मूल्य वाली सेवा का कारण है। अतएव डिजिटल इंडिया के लिए ज़्यादा स्पेक्ट्रम होना ज़रूरी है।
पब्लिक इंटरनेट पहुँच : डिजिटल इंडिया के इस स्तम्भ का लक्ष्य सरकार संचालित सुविधाओं (कॉमन सर्विस सेंटर) को बढ़ाना है जो निम्न स्तरीय डिजिटल जुड़ाव वाले सुदूर ग्रामीण इलाकों में नागरिकों को डिजिटल सेवाएं देता है। लक्ष्य 1 लाख 40 हजार सुविधा केंद्रों से बढ़ाकर 2 लाख 50 हजार सुविधा केंद्र करना है ताकि हर गाँव में एक केंद्र हो सके। इसका लक्ष्य 1 लाख 50 हजार डाकघरों को भी विविध सेवा केंद्रों में तब्दील करना है। इन सबके पीछे यही भाव है कि ग्रामीण को कम से कम दूर चलकर ही अधिक से अधिक दूरस्थ सेवा का लाभ मिल सके। यह सेवा वर्ष 2006 से ही अनुमोदित है। अब देखना है कि डिजिटल इंडिया कार्यक्रम इसमें कितनी गति दे पाता है।
ई-शासन : प्रौद्योगिकी द्वारा शासन में सुधार : डिजिटल इंडिया के सभी स्तम्भों में यह सर्वाधिक पुराना प्रयास है। दशकों से ई-शासन कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं, लेकिन यह बाबुओं के सहयोग की अपेक्षा करता है। ई-शासन की प्रक्रियाओं और सेवाओं में मैन्युअल डेटाबसों का डिजिटाइजेशन, ऑनलाइन अनुप्रयोग और ट्रैकिंग, नागरिक दस्तावेजों के संग्रह का ऑनलाइन इस्तेमाल, शासन के कार्यवृत को पारदर्शी करने वाला स्वचालन और लोक समस्या निवारण आते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल इंडिया के सामने सफल पायलट प्रोजेक्ट्स देने की चुनौती होगी।
ई-क्रांति : सेवाओं का इलेक्ट्रॉनिक निष्पादन : ई-क्रांति के अन्तर्गत 41 बड़े ई-शासन प्रयास आते हैं, जो "मिशन मॉड प्रोजेक्ट्स' कहे गए हैं। इसमें ई-शिक्षा (सभी स्कूलों को ब्राॉडबैंड और वाई-फाई तथा अधिकतम ऑनलाइन पाठ¬क्रम से जोड़ना), ई-स्वास्थ्य सेवा, कृषि के लिए प्रौद्योगिकी, न्याय, वित्तीय सेवा, योजना और साइबर सुरक्षा शामिल है। डिजिटल इंडिया के समक्ष यह चुनौती होगी कि ये मात्र पायलट प्रोजेक्ट बनकर ही न रह जायें। अतएव क्रियान्वयन ही डिजिटल इंडिया के सफलता की कुँजी होगी।
सबके लिए सूचना : डिजिटल इंडिया के इस स्तम्भ का मकसद नागरिकों को वेब, मोबाइल और सोशल मीडिया के द्वारा सरकार से जोड़ना है। यह प्रयास नागरिक पोर्टल ग्न्र्क्रदृध्.त्द और अन्य सोशल मीडिया के द्वारा पहले से जारी है। वर्तमान सरकार भी सोशल मीडिया का बखूबी इस्तेमाल कर रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी स्वयं वि?ा के सर्वाधिक प्रभावशाली ट्विटर इस्तेमाल करने वाले हैं जिनके 1.3 करोड़ फॉलोवर हैं, किन्तु आलोचक कहते हैं कि डिजिटल चॅनेल्स का इस्तेमाल दो तरफा न होकर मात्र रेडियो और टीवी की तरह होता हैं, जिसमें फॉलोवर्स के सवालों और प्रतिक्रियाओं को संपादित किया जाता है। अभी हाल ही में चेन्नई बाढ़ का प्रधानमंत्री के हवाई सर्वेक्षण का सम्पादित चित्र विवाद में आया था।
इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण : यह महत्वाकांक्षी योजना वर्ष 2020 तक इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में कुल शून्य आयात या निर्यात के बराबर आयात का लक्ष्य करती है। वर्तमान में 4 खरब डॉलर मूल्य के इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की खपत 5 वर्षों के अंदर होनी है और इसका तीन चौथाई आयात किया जाना है। यह बहुत बड़ी चुनौती है। इसके लिए चिप निर्माण, मोबाइल और सेट टॉप बॉक्स निर्माण को बढ़ावा देना होगा। सरकार ने इसके लिए "मेक इन इंडिया' कार्यक्रम को बढ़ावा देना शुरू किया है, किन्तु आलोचक यह भी कहते हैं कि "डिजिटल इंडिया' से "मेक इन इंडिया' में भटकाव कहीं पूर्ववर्ती सरकार की आकाश टेबलेट योजना की तरह टाँय-टाँय फिस्स न हो जाए।
रोजगार हेतु सूचना प्रौद्योगिकी : यह छोटे शहरों और गाँवों के एक करोड़ छात्रों को पांच वर्ष के अंदर आईटी क्षेत्र में रोजगार दिलाने हेतु प्रशिक्षण का प्रोजेक्ट है। इसके अंतर्गत सभी पूर्वोत्तर राज्यों में बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग यानि बीपीओ केंद्रों की स्थापना, तीन लाख सर्विस प्रदाता कार्यकर्ता और पांच लाख ग्रामीण टेलिकॉम कार्यकर्ता का प्रशिक्षण शामिल है। यहाँ चुनौती संख्या नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं की गुणवत्ता है। इस क्षेत्र में रोजगारदाता कार्यकर्ताओं की कम गुणवत्ता की शिकायत करते रहे हैं और अनेक फर्म को अपने स्तर से प्रशिक्षण पर खर्च करना पड़ता है।
शीघ्र उपज कार्यक्रम : यह कार्यक्रम पहले से जारी है। इसके अंतर्गत सरकारी कर्मचारियों के 1.3 करोड़ मोबाइल नंबरों और 20 लाख इ-मेल पतों का डेटाबेस, बायोमेट्रिक उपस्थिति, लोक स्थलों और वि?ाविद्यालयों में वाई-फाई की उपलब्धता, विद्यालयों में ई-बुक, एसएमएस आधारित मौसम और प्राकृतिक आपदा सूचना शामिल है।
यहाँ अनुप्रयोग ही चुनौती है। उदाहरण के लिए, ऑफिसियल ई-मेल होने के बावजूद अधिकांश सरकारी कर्मी कई कारणों से व्यक्तिगत ई-मेल सर्विस का इस्तेमाल करते हैं। इससे सरकारी डेटा का दुरूपयोग होने का खतरा हो सकता है।
इन सभी चुनौतियों के बावजूद भारत के श्रेष्ठतम बिजनेस नेतृत्व जैसे, अम्बानी भाईयों, टाटा ग्रुप और विप्रो के अजीम प्रेमजी ने डिजिटल इंडिया में 70 अरब डॉलर निवेश करने का फैसला लिया है, जो डिजिटल भारत के स्वप्न को आ?ास्त करता दिखता है। इन कंपनियों ने 18 लाख रोजगार सृजन का भी वादा किया है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका की सिलिकॉन वैली में "गरीबी पर नेटवर्क और मोबाइल फोन से प्रहार' और "हाइवे से ज़्यादा महत्वपूर्ण आईवे' इत्यादि जुमलों का इस्तेमाल कर माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, सिस्को, क्वालकॉम, एप्पल और अडोब जैसे इस क्षेत्र के बड़े खिलाड़ियों से हाथ मिलाया है। प्रत्युत्तर में माइक्रोसॉफ्ट ने पांच लाख गांवों में सस्ता ब्राॉडबैंड बिछाने, गूगल ने 500 रेलवे स्टेशनों पर वाई- फाई इंटरनेट सेवा बहाल करने और और क्वालकॉम ने 10 अरब का फण्ड इंडिया स्टार्ट अप हेतु घोषणा की है।
अब यह देखना बाकी है कि सचमुच एक छोटा किसान अपने खेत के पट्टे और फसल के अधिकतम मूल्य के लिए आ?ास्त होगा, एक मछुआरा समुद्र में ज़्यादा मछली पकड़ पायेगा और सन फ्रांसिस्को में बैठा एक नौजवान रोज स्काइप पर भारत में रह रही अपनी बीमार दादी से बात कर पायेगा; जैसा श्री मोदी कहते हैं या फिर डिजिटल इंडिया का यह स्वप्न भी किसी डिजिटल फ़िल्म की तरह आभासी ही रहेगा।

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