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समय माँगेगा सवालों के जवाब
01-Mar-2019 03:33 PM 1664     

पंकज चतुर्वेदी, जल, जंगल, जमीन से जुड़े मुद्दों पर खोजी पत्रकारिता का सुस्थापित नाम है। वे स्वयं विज्ञान के छात्र रहे हैं, शिक्षा अभियान से जुड़े हुये हैं, बुंदेलखण्ड की मिट्टी से जुड़े हुये हैं अतः प्रकृति से जुड़े समसामयिक ज्वलंत विषयों पर उनकी गहरी समझ है। हमने जब तब उन्हें यहां वहां पढ़ा ही है। वे सतही लेखन नहीं करते बल्कि उनके लेख ऐसे शोध कार्य होते हैं जो आम आदमी के समझ में आ सकें तथा जन सामान्य के लिये उपयोगी हों। वे प्रकृति से जुड़े हर उस विषय पर जहां उनकी नजर में कुछ गलत होता दिखता है समाज को, सरकार को, नीति निर्माताओ को, क्रियान्वयन करने वालों को और हर पाठक को समय रहते चेताते दिखते हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में संग्रहित कुल 53 आलेख अलग-अलग समय पर समसामयिक मुद्दों पर लिखे गये हैं। जिन्हें पर्यावरण, धरती, शहरीकरण, खेती, जंगल, जल है तो कल है इन छह उप शीर्षकों के अंतर्गत संकलित किया गया है। सभी लेख प्रामाणिकता के साथ लिखे गये हैं। लेख पढ़कर समझा जा सकता है कि लेखन के लिये उन्होने स्वयं न केवल अध्ययन किया है वरन मौके पर जाकर देखा समझा और लोगो से बातें की हैं। पहला ही आलेख है "कई फुकुशिमा पनप रहे हैं भारत में" यह लेख जापान में आई सुनामी के उपरान्त फुकुशिमा परमाणु विद्युत संयंत्र से हुये नाभिकीय विकरण रिसाव के बाद भारतीय संदर्भों में लिखा गया है। लेख में आंकड़े देकर ऊर्जा के लिये परमाणु बिजलीघरों पर हमारी निर्भरता की समीक्षा के साथ वे चेतावनी देते हैं "परमाणु शक्ति को बिजली में बदलना शेर पर सवारी की तरह है।" यूरेनियम कारपोरेशन आफ इंडिया के झारखण्ड से यूरेनियम के अयस्क खनन तथा उसके परिशोधन के बाद बचे आणविक कचरे का निस्तारण जादूगोड़ा में आदिवासी गांवों के बीच किया जाता है। लेखक की खोजी पत्रकारिता है कि वे आंकड़ों सहित उल्लेख करते हैं कि इस प्रक्रिया में लगे कितने लोग कैंसर आदि बीमारियों से मरे। उन्होंने 1974 के पोखरण विस्फोट के बाद उस क्षेत्र के गांवों में कैंसर के रोगियों की बढ़ी संख्या का उल्लेख भी किया है। लेख के अंत में वे चेतावनी देते हैं कि यदि हमारे देश के बाशिंदे बीमार, कुपोषित और कमजोर होंगे तो लाख एटमी बिजलीघर भी हमें सर्वशक्तिमान नहीं बना सकते।
आखिर कहां जाता है परमाणु बिजली घरों का कचरा? लेख में बुंदेलखण्ड में किये जा रहे आणविक कचरे के निस्तारण पर चिंता जताई गई है। पेड़-पौधे भी हैं तस्करों के निशाने पर, जरूरत है पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता की, गर्म होती धरती, कहीं घर में ही तो नहीं घुटता है दम, पत्तियों को नहीं तकदीर को जलाता है समाज, खोदते-खोदते खो रहे हैं पहाड़, पालिथिन पर पाबंदी के लिये चाहिये वैकल्पिक व्यवस्था जैसे भाग एक के लेख उनके शीर्षक से ही अपने भीतर के विषय की जानकारी देते हैं और पाठक को आकर्षित करते हैं। पत्तियों को नहीं तकदीर को जलाता है समाज लेख में पंकज जी ने दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का संदर्भ देकर प्रभावी तरीके से खेत के अवशेष के प्रबंधन पर कलम चलाई है।
दूसरे भाग "धरती" के अंतर्गत कुल चार लेख हैं। दुनिया में बढ़ते मरुस्थल, ग्लेशियर प्राधिकरण की आवश्यकता, बंजर जमीन की समस्या को रेखांकित करती उनकी कलम आह्वान करते हुये कहती है कि जमीन के संरक्षण की जवाबदारी केवल सरकारों पर है जबकि समाज का हर तबका जमीन का हर संभव दोहन करने में व्यस्त है, यह चिंता का विषय है।
हमारा देश गांवों का कहा ज़रूर जाता है पर गांवों से शहरों की ओर अंधाधुंध पलायन हो रहा है, इसके चलते शहरों का अनियंत्रित विस्तार होता जा रहा है। शहरीकरण की अपनी अलग समस्यायें हैं। इन विषयों पर लेखक ने मौलिक चिंतायें तथा अपनी समझ के अनुसार बेहतरी के सुझाव देते हुये लेख लिखे हैं। प्रधानमंत्री जी का स्वच्छता कार्यक्रम सहज ही सबका ध्यानाकर्षण कर रहा है, किन्तु विडम्बना है कि हमारी मशीनरी पाश्चात्य माडल का सदैव अंधानुकरण कर लेती है। हास्यास्पद है कि हम डॉलर में मंहगा डीजल खरीदते हैं, फिर हर गांव कस्बे शहर में कचरा वाहन प्रदूषण फैलाते हुये घर-घर से कचरा इकट्ठा करते हैं और वह सारा कचरा किसी खुले मैदान पर डम्प कर दिया जाता है। इस तरह सफाई अभियान के नाम पर विदेशी मुद्रा का अपव्यय, वायु प्रदूषण को बढ़ावा, जमीन का दुरुपयोग हो रहा है। बेहतर होता कि हम साईकिल रिक्शा वाले कचरा वाहन उपयोग करते जिससे कुछ रोजगार बढ़ते, डीजल अपव्यय न होता, प्रदूषण भी रुकता।
महानगरीय संस्कृति से पनपते अपराधों पर उनका लेख सामाजिक मनोविज्ञान की उनकी गहरी समझ प्रदर्शित करता है। इस लेख में उन्होंने देह व्यापार से जेबकतरी तक की समस्याओं पर कलम चलाई है। जाने कितने करोड़ रुपये नदियों की साफ सफाई के नाम पर व्यय किये जाते हैं, पर एक ही बाढ़ में सारे किये कराये पर पानी फिर जाता है। मुम्बई, चेन्नई, बेंगलोर और इस साल केरल की बाढ़ प्रकृति की चेतावनी है। जिसे समझाने का तार्किक यत्न पंकज जी ने किया है। जल मार्गों पर कूड़ा भरना उन्होंने समस्या की जड़ निरुपित किया है। उनकी पैनी नजर सड़कों पर जाम की समस्या से लेकर फ्लाईओवर तक गई है।
खेती और किसानी पर इस देश की राजनीति की फसलें हर चुनाव में पक रही हैं। कर्ज माफी के चुनावी वादे वोटों में तब्दील किये जाना आम राजनैतिक शगल बन गया है, पंकज जी ने 12 लेख फसल बीमा, रासायनिक खादों के जहर के प्रभाव, किसानों के लिये कोल्ड स्टोरेज की जरूरत, सूखे से मुकाबले की तैयारी, बीटी बीजों की समस्या आदि पर लिखे हैं। "जब खेत नही होंगे" लेख पढ़कर पाठक चौंकता है। पंकज जी से मैं सहमत हूं कि "किसान भारत का स्वाभिमान हैं।" वे लेख के अंत में वाजिब सवाल खड़ा करते हैं "हमें जमीन क्यों चाहिये अन्न उगाने को या खेत उजाड़कर कारखाने या शहर उगाने को?"
आये दिन अखबारों में शहरों में आ जाते जंगली जानवरों की खबरें सुर्खी से छपती हैं। बस्ती में क्यों घुस रहा है गजराज?, शुतुरमुर्ग भी मर रहे हैं और उनके पालक भी, घुस पैठियों का शिकार हो रहे हैं गैंडे, बगैर चिड़िया का अभयारण्य जैसे लेख उनकी व्यापक दृष्टि, भारत भ्रमण और अलग-अलग विषयों पर उनकी समान पकड़ का परिचायक है। वे प्रकृति के प्रहरी कलमकार के रूप में निखर कर सामने आते हैं।
कहा जाता है अगला विश्वयुद्ध पानी के लिये होगा। जल जीवन है, जल में जीवन है और जल से ही जीवन है। जल ने जीवन सृजित किया है। वहीं जल में विनाश की असाधारण क्षमता भी है। पानी समस्त मानवता को जोड़ता है। विभिन्न धर्मों में पानी का प्रतीकात्मक वर्णन है। ब्रह्माण्ड की संरचना और जीवन का आधार भूत तत्व पानी ही है। जल भविष्य की वैश्विक चुनौती है। पिछली शताब्दि में विश्व की जनसंख्या तीन गुनी हो गई है, जबकि पानी की खपत सात गुना बढ़ चुकी है। जलवायु परिवर्तन और जनसंख्या वृद्धि के कारण जल स्त्रोतों पर जल दोहन का असाधारण दबाव है। विश्व की बड़ी आबादी के लिये पेयजल की कमी है। जल आपदा से बचने, जल उपयोग में हमें मितव्ययता बरतने की आवश्यकता है। "जल है तो कल है" खण्ड में लेखक ने 10 आलेख प्रस्तुत किये हैं। सभी लेखों में पानी को लेकर वैश्विक चिंता में वे बराबरी से भागीदार ही नहीं, वरन वे अपनी ओर से तालाबों के महत्व प्रतिपादित करते हुये समस्या का समाधान भी बताते हैं। कूड़ा ढ़ोने का मार्ग बन गई हैं नदियां, लेख में जल संसाधन मंत्रालय के संदर्भ उद्धृत करते हुये वे विभिन्न नदियों में विभिन्न शहरों में प्रदूषण के कारण बताते हैं। दिल्ली में यमुना का प्रदूषित काला पानी जन चिंता का मुद्दा है, हिंडन जो कभी नदी थी, लेख में पंकज जी ने हिंडन को हिडन होने से बचाने की चेतावनी दी है।
लेखक अपने समय का गवाह तो होता ही है, उसकी वैचारिक क्षमतायें उसे भविष्य का पूर्वानुमान लगाने में सक्षम बना देती हैं, हमें समय के सवाल में उठाये गये मुद्दों पर गहन चिंतन मनन और हमसे जो भी प्रकृति संरक्षण के लिये हो सके करने को प्रेरित करती हैं। लेखकीय में पंकज जी ने लिखा है "सुख के लोभ में कहीं हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिये विकल्प शून्य समाज न बना दें।" "समय के सवाल" एक निरापद दुनिया बनाने के विमर्श का उनका खुला आमंत्रण हैं। पुस्तक पठनीय ही नहीं, चिंतन मनन और क्रियान्वयन का आह्वान करती समसामयिक कृति है।

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