ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अंजली त्रिपाठी
अंजली त्रिपाठी
उत्तर प्रदेश में जन्म। कई दशकों से राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय शिक्षण क्षेत्र से जुड़ीं हैं। सिंगापुर में डी.ए.वी. के माध्यम से स्वयंसेविका के रूप में उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं में अध्यापन। हिंदी की प्रगति के लिए सतत प्रयासरत हिंदी फाउंडेशन, सिंगापुर से भी ताल्लुक रखती हैं । साहित्य सृजन के अतिरिक्त चित्रकारी व हस्तकला में रुचि। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। सम्प्रति- सिंगापुर में रहती हैं।

मिटने की कगार पर लॉरांग बुआंगकॉक

दुनिया में देहात या देहात में दुनिया! दोनों अजूबे - एक कुदरत का, दूजा फ़ितरत का। अरे भई दुनिया में देहात का वही अस्तित्व है जो देह में हात (हाथ) का। देखो न; खुद ही देखो - दे हात (हाथ), ले हाथ, चले ह

फ़िलमियाँ बुखार

मुझमें फ़िल्मी बुखार के कीटाणु विरासत में मौजूद कब पाए गए, ख़बर नहीं।
हाँ, इतना तो था कि हम बड़ों से आँख छिपाकर फ़िल्मी स्टाइल में ज़ुल्फें,
नुक्कें निकालते और बनते सँवरते। इस तरह पनाह दिए फ़

अरमान है

सड़क किनारे एक छोटी-सी दुकान की रंग-बिरंगी दीवार से शरीर को टिकाए, बदरंगे, मटमैले से कपड़ों में तेज़ बारिश में भीगने से अपने को बचाता हुआ वह, कान से चिपके पुराने मॉडल के मोबाइल पर ऊँची आवाज़ में न जाने

माँ का सिंगार

निज भाषा के प्रचार
और प्रसार के लिए
हर प्रयास तुम करो
हाँ ये आस तुम करो
विकास तुम करो।

माँ भारती की गोद में लेखनी स्वतंत्र है
है बोलने का हक़ भी विचार भी स्व

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