ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
एक भड़भड़े लेखक की भड़भड़ी दास्तान
01-Jan-2019 01:49 PM 926     

समय : जुलाई, 1986। स्थान : प्रेस क्लब ऑफ बॉम्बे। देवेश ठाकुर से शाम पाँच बजे मिलने का तय हुआ था। डॉ. दशरथ सिंह भी आने वाले थे। मैं जब प्रेस क्लब पहुंची तो शाम के सात बज रहे थे, लेकिन पूरा यकीन था कि दोनों लेखक बंधुओं से मुलाक़ात अवश्य हो जाएगी। साहित्यिक चर्चा के लिए दो घंटे का समय तो कोई समय ही न हुआ। प्रेस क्लब में पहुँचकर मैंने देखा कि बम्बई के इन दो लेखकों के साथ दिल्ली के एक लेखक भी जमे हुए हैं। सुना था, ये अकसर बम्बई आया करते हैं। वैसे तो किसी को इस बात से क्या लेना-देना कि ये अकसर बम्बई क्यों आया करते हैं, लेकिन ये अपने तईं इतने दरियादिल हैं कि अपने बारे में अफवाहें उड़ाने से भी बाज़ नहीं आते। इनके साथ पाँच मिनट बैठकर भी कोई यह सहज सूँघ सकता है कि इन्हें अपने बारे में ज़बरदस्त मुगालते हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि अभी भी दिल्ली में कॉफ़ी हाउस की मेज़ों पर इनके द्वारा इनके मुग़ालते उसी गर्माहट से परोसे जाते होंगे। लेखन-कर्म के साथ अन्य कई कामों में भी सक्रिय रहे हैं। संक्षेप में कहें तो छोटी-सी जान, बेहद हलकान।
तो साहब, सच कहें तो इन्हें प्रेस क्लब में देखकर हम बड़े प्रफुल्लित हुए। प्रफुल्लित होना हमारी आदत है। यूं भी बम्बई में रहते हुए हम किसी भी दिल्ली वाले को देखकर प्रफुल्लित हो जाया करते थे।
जब हमने इन तीनों लेखकों के पास रखी चौथी कुर्सी संभाली तो जाना कि उस मेज़ पर चर्चा उस समय हाल ही में दिवंगत हुए एक लेखक की चल रही थी। उन दिनों हर कहीं उनके प्रति श्रद्धांजलियों का दौर था। श्रद्धांजलि के लिए शारीरिक मौत कितनी ज़रूरी है, मुझे एक क्षण के लिए लगा था। मेरे वहां पहुँचने पर उनकी बातचीत में कुछ पल का व्यवधान पड़ा, नमस्ते, नमस्ते...। देर हो गई...। क्षमा...। आदि की औपचारिकता निभाने में। इसके बाद दिल्लीवासी लेखक जोशोखरोश के साथ जब पुनः शुरू हुए तो पता चला कि मृतक लेखक की चर्चा ज़रूर थी लेकिन दौर श्रद्धांजलियों का नहीं, बल्कि लानतों का था। दिल्लीवासी लेखक अपनी बुलंद आवाज़ में कह रहे थे, "साला कहाँ का लेखक था? मर गया, इसका मतलब यह तो नहीं कि हम उसे महान कहने लगें?" मैं इनका बडबोलापन दिल्ली से जानती थी। हमने देवेश जी से उनकी रचना पढ़ने के लिए ली तो ये फिर उसी बुलंदी से बोले, "यह साला देवेश, क्या खाकर लिखेगा? यह भी कोई लेखक है?" देवेश और दशरथ सिंह मंद-मंद मुस्कुराते रहे जैसे इनकी ये बातें सुनने के आदी हों और निस्तार न पाने की स्थिति के साथ समझौता कर चुके हों। उसके बाद यह दिल्लीवासी मुझे मूलतः दिल्लीवासी के साथ बड़ी अपनत्व की डोर जोड़ते हुए मुझे अपने लेखन से होने वाली आय का हिसाब-किताब गिनाने लगे तो मुझसे सिर्फ यही सोचा गया कि भई, असली लेखक तो यही हैं, हम (उनकी भाषा में "साले") क्या खा कर लिखेंगे? उनके मुंह से उनके कारनामों की चर्चा कोई उगता हुआ लेखक सुन रहा होता तो तुरंत शीश नवा देता। यह तो हम ही बेमुरव्वत थे जो उनकी आत्म-प्रगल्भता और स्व-पूजा से एलर्जिक हो उठे और सबसे विदा मांगने लगे। शायद दूसरे भी महफ़िल ख़त्म करने का बहाना ढूंढ रहे थे और हम चारों उठ कर प्रेस क्लब से बाहर आ गए।
स्वयंभू लेखक एक क्षण के लिए एकांत पाकर हमसे बोले, "क्या हाल हैं तुम्हारे?" मैंने कहा, "ठीक हैं।" वह फिर बोले, "और कैसी हो?" मैंने कहा, "और भी ठीक हूँ।" इसके उत्तर में उन्होंने कहा, "अच्छा है, मस्ती मार रही हो।" पाठकगण कृपया यह न समझें कि हमने इन्हें इस अंदाज़ में बोलने की कोई छूट दी हुई है। यह इनकी अपनी भाषा-शैली है जो इनके व्यक्तित्व में इस कदर रच-बस गई है कि यह पहचाने जाते हैं अपने इन्हीं अंदाजों से। हम या कोई उन्हें सही भाषा-शैली का उपयोग क्या सिखा सकता है? यह महान लेखक हैं। हम तो बेचारे उस समय मात्र यही सोच पाए कि वाह जनाब, लेखक जो करे, वह साहित्य और लेखिका जो करे, वह मस्ती? बड़ी टुच्ची मानसिकता लेकर आप पौराणिक पात्रों का उद्धार करने में लगे हैं। जी हाँ, ये पौराणिक पात्रों पर लिख रहे थे। हमें गुस्सा तो बहुत आया पर हमने सब्र किया, सोचा, ये किन्हीं व्यक्तिगत कारणों से कुंठित हैं इसलिए इन पर रहम किया जाए। "क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात" वाली मुस्कराहट अपने चेहरे पर लाकर हमने सब से विदा ली।
उधर हम दिल्ली पहुँचे और श्रीराम सेंटर का चक्कर लगाने की ग़रज़ से मोना गुलाटी और बॉबी के साथ मंडी हाउस की ओर रुख किया। थिंक ऑफ़ द डेविल एंड ही इज़ देअर। ये वहाँ पहले से विराजमान थे। मेरे द्वारा पत्रिका "वैचारिकी संकलन" निकालने से ये बेहद आक्रान्त थे। यदि मुझमें आत्मबल की कमी होती तो इनकी बातों से अवश्य निरुत्साहित हो गई होती। फिर जैसे एक पिता अपने बेटे द्वारा खर्चीला शौक पालने के वक़्त उसे समझाता है, ये मुझे समझाते रहे। मैंने सचमुच उन्हें पितातुल्य समझा और अपनी योजनाओं के बारे बताते हुए कहा कि मुझे जहाँगीर आर्ट गैलरी (मुंबई) के सौजन्य से कुछ प्रसिद्ध चित्रकारों की कलाकृतियों के ब्लॉक मिल गए हैं। "तुम औरत हो न इसलिए..." इनका झनझनाता हुआ पत्थर मेरे दिल और दिमाग पर लगा। ये उस आदर के काबिल ही नहीं हैं जो मैंने इन्हें इनके साथ एक ही मेज़ पर बैठकर चाय पीना स्वीकार करने के रूप में दिया। मेरे उठते-उठते ये अपने उसी उजड्ड अंदाज़ में बताते रहे कि किस प्रकार ये अपना पैसा खर्च करके साहित्य की सेवा कर रहे हैं, इन्हीं के बल पर साहित्य टिका हुआ है, एकमात्र यही साहित्य के रखवाले हैं और इनके दुबले होने का राज़ शहर का अंदेशा नहीं, बल्कि साहित्य है। इन्होंने अंतिम धमकी दी, "देखो, "वैचारिकी संकलन" में कुछ ऐसा-वैसा लिखा तो याद रखना, बचोगी नहीं।" शायद मेरा खून कर देंगे। क्योंकि इन्हें अपनी योजनाएं बताते हुए हमने इनसे कह दिया था कि पत्रिका के "प्रसंगवश" स्तम्भ में हम अन्य प्रसंगों के साथ लेखकों की अप्रासंगिक बातें लिखा करेंगे ताकि मुखौटों की संस्कृति छिन्न-भिन्न हो और प्रबुद्ध पाठक स्वयं तय कर सकें कि कौन लेखक कितने पानी में है?
वहाँ से लौटते हुए बॉबी ने डरते-डरते पूछा, "मॉम, ये आपके दोस्त हैं?" मैं क्या जवाब देती? भैड़े-भैड़े यार भैड़ी फत्तो के। आखिर कृष्ण बलदेव वैद का संवाद याद आ ही गया। इस सारी बातचीत के मध्य मोना गुलाटी ने खामोश रह कर आश्चर्यचकित किया था। वर्ना मोना और चुप बैठे? और आश्चर्यचकित किया था तभी पदार्पण किए हरिप्रकाश त्यागी और कुबेर दत्त ने यह भंगिमा देकर कि वे भी मेरे द्वारा पत्रिका निकालने को डिसएप्रूव कर रहे हैं। तौबा...
अप्रासंगिक : जगदीश चतुर्वेदी ने एक बार कहा था, "हिन्दी साहित्य में मकार (क पर ज़ोर देकर उन्होंने मक्कार कहा था) लेखिकाएँ बहुत हैं जैसे मणिका मोहिनी, मन्नू भंडारी, ममता कालिया, मृदुला गर्ग, मंजुल भगत, मालती शर्मा आदि।" मैंने उत्तर दिया था, "हिन्दी साहित्य में जोकरों और पागलों की भी कमी नहीं है, जैसे जगदीश चतुर्वेदी, जगदम्बा प्रसाद दीक्षित, प्रभाकर माचवे, प्रदीप पंत, पंकज बिष्ट आदि।" लेकिन हमारे इस लेख के नायक जो वस्तुतः खलनायक हैं, न जकार हैं, न पकार, ये तो विकार हैं।

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