ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अमेरिका में प्रवासी भारतीय
01-Jan-2016 12:00 AM 1705     

जेसे मानवेतर जीव भोजन, पानी और सुरक्षा के लिए समस्त सृष्टि में इधर-उधर भ्रमण करते रहते हैं वैसे ही मनुष्य के यत्र-तत्र भरण और प्रवासन का इतिहास भी रहा है। बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए उत्तर-पूर्व भारत के तथा व्यापार के लिए दक्षिण के चेट्टियार व्यापारियों के सुदूर दक्षिण-पूर्व में आवागमन का इतिहास सदियों पुराना है। अफ्रीका के पूर्वी तटीय देशों को भी गुजराती, पारसी, बोहरा, बनिया आदि व्यापार के लिए जाते रहे हैं। गुलाम प्रथा समाप्त होने पर अपने उपनिवेशों में सस्ते मजदूर और कहें तो लगभग गुलाम के रूप में भारत के गरीब-गुरबे मारीशस, गुयाना, त्रिनिदाद, फीजी, सूरीनाम आदि देशों में ले जाए गए। ब्रिाटेन, फ़्रांस और पुर्तगाल आदि देशों के भारत में उपनिवेश होने के कारण भारतीयों का इन देशों में भी आना-जाना रहा। अमरीका में भारतीयों का प्रवास उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में माना जा सकता है। विद्वानों के अनुसार 1850 से 1870 के मध्य कोई दो सौ भारतीय अमरीका आए-गए होंगे। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दस-पंद्रह वर्षों में  उच्च अध्ययन के लिए अमरीका जाने वाले लोगों में कुमारी आनंदीबाई जोशी,डॉ. एस. स्वामीनाथन, ग़दर पार्टी  के नायक शहीद करतार सिंह साराभा आदि प्रमुख थे। कुछ प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को अमरीका में पढ़ने के लिए रजवाड़ों और अमरीकी प्रवासी भारतीयों ने सहायता की जैसे अम्बेडकर आदि।
प्रारंभिक काल में तीन तरह के लोग यहाँ आए। धर्मगुरु विवेकानंद, सारदानंद,  अभेदानंद, परमानन्द, योगानंद आदि, आकांक्षा से भरे छात्र, पंजाब के किसान मजदूर और बंगाल-महाराष्ट्र-पंजाब के क्रान्तिकारी। 1893 में अमरीकनों ने भारतीय मनीषी विवेकानंद का दार्शनिक उद्घोष सुना, 1984 में वेदान्त सोसाइटी की स्थापना हुई फिर भी इन्हें उतनी लोकप्रियता नहीं मिली जितनी स्वामी प्रभुपाद और रजनीश को मिली। प्रामाणिक दस्तावेजों के अनुसार 1899 में स्थायी आवास की खोज में अमरीका (कैलेफोर्निया) में आने वाला पहला भारतीय आप्रवासी बख्शीश सिंह नामक पंजाबी सिक्ख था।
इस समय अमरीका में भारत मूल के लोगों की संख्या 31 लाख अर्थात कुल आबादी का एक प्रतिशत है। जो क्रमशः हिंदी, पंजाबी तथा अन्य भारतीय प्रांतीय भाषाएँ बोलते हैं। धर्म के अनुसार 51 प्र.श. हिन्दू, 18 प्र.श. ईसाई, 10 प्र.श. मुसलमान, 5 प्र.श. सिक्ख, 2 प्र.श. जैन और 14 प्र.श. अन्य (अघोषित) हैं।
भारत से प्रारंभ में आए अधिकतर लोग मजदूर टाइप के लोग रहे। छठे दशक में भारत से अध्ययन करने वाले योग्य विद्यार्थी और नौकरी करने वाले अध्यापक, इंजीनीयर और डॉक्टर आने शुरू हुए। सबसे अधिक लोग 1990 के आसपास सूचना प्रौद्यौगिकी का विकास शुरू होने के अमरीका आने शुरू हुए। और आज भारत मूल के सर्वाधिक लोग इसी क्षेत्र में सक्रिय हैं। इनकी संख्या कोई 40 प्र.श. है।
कुछ प्रसिद्ध भारतीय जिन्होंने अमरीकी समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है, वे हैं - ए.के.मजूमदार, हरगोविन्द खुराना, अमर बोस, सत्य नडेला, बोबी जिंदल, कल्पना चावला, अज़ीज़ अंसारी, पद्मालक्ष्मी, दीपक चोपड़ा, नीना देवुलुरी, दिलीप सिंह सौंध, नोरा जोन्स, संजय गुप्ता, फरीद ज़कारिया, प्रीत भरारा, अमत्र्य सेन, सुन्दर पिचाई, विनोद धम, काल पेन, निक्की हेली और सलमान खान (खान अकादमी) आदि।
अमरीका में भारत मूल के सर्वाधिक शिक्षित और तनख्वाह पाने वाले लोग हैं। नौ प्रतिशत गरीब हैं जिनकी वार्षिक आय 20 हजार डॉलर प्रति वर्ष है जो अमरीका के राष्ट्रीय औसत से अधिक है। जेलों में मात्र डेढ़ दो सौ लोग हैं। इससे कहा जा सकता हैं कि ये कानून के पाबंद लोग हैं या फिर दुस्साहसी नहीं हैं। लगभग सभी अपने काम से सीधे घर लौटने वाले भले आदमी हैं। इसी तरह से ड्रग्स का सेवन करने वाले भी बहुत कम हैं। तलाक भी अन्य नस्लों और मूल के लोगों की बजाय कम हैं। भारतीय समाज का यह वर्ग यदि भारत में होता तो भी तुलनात्मक रूप से बेहतर ही  होता।
ऐसा शांत और अपने काम धंधे से काम रखने वाला वर्ग कहीं भी, कभी भी किसी देश या समाज के लिए समस्या नहीं बनता। यही बात अमरीका के भारत मूल के समुदाय के साथ है। हालांकि आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से समृद्ध होने के बावजूद इस समाज के साथ कुछ ऐसी स्थितियां हैं जो इस समूह को अन्य देशों के समूहों की तरह अमरीकी समाज में अपनी शक्तिशाली उपस्थिति दर्ज करवाने में सहयोगी नहीं हैं। यहाँ भारत मूल के विभिन्न समुदायों में अंग्रेजी के अतिरिक्त कोई अन्य समान भारतीय भाषा नहीं है। इसी तरह बहुदेववादी राष्ट्र होने के कारण सबके अपने-अपने मंदिर भी पाए जाते हैं। हालांकि शिव, विष्णु आदि के मंदिरों में सभी जाते हैं लेकिन वहाँ भी समान भाषा न होने के कारण भाषाओं के अनुसार अलग-अलग ग्रुप बने दिखाई देते हैं। और जब अंग्रेजी में समारोह संचालित होता है तो गणेश एलेफेंट गॉड और हनुमान मंकी गॉड बन जाते हैं। एलेफेंट या मंकी शब्द से गणेश और हनुमान की क्या छवि भक्तों के मन में बनती है यह तो वे ही जानें, लेकिन जब अंगद रावण से कहते हैं- हे मूर्ख, क्या हनुमान बन्दर हैं? तो इस अनुवाद का मर्म समझ में आ जाता है। यहाँ बसे भारतीयों को भाषा और संस्कृति का कोई स्पष्ट और समान सूत्र खोजना और प्रकट व्यवहार में लाना चाहिए जिससे उनकी भारतीयता सिद्ध और सुनिश्चित हो।
अभी भारत से आई यह पहली या दूसरी पीढ़ी है, तब तक भारतीय संस्कृति, व्यवहार, खान-पान, सोच और मूल्य और उनके प्रति एक आग्रह दिखाई देता है, लेकिन तीसरी और चौथी पीढ़ी में यह कितना बचेगा, कहा नहीं जा सकता। जैसे यहाँ के तथाकथित प्रगति की दौड़ में शामिल लोगों और उनकी नक़ल करने वालों को अंग्रेजी और अंग्रेजियत में अपना उज्जवल भविष्य नज़र आता है तथा हिंदी या भारतीयता में उलझे रहना समय का अपव्यय और एक बाधा की तरह लगता है। वैसे ही शायद वहाँ अपने बच्चों के भारतीय भाषाओं, मूल्यों और संस्कृति के लिए समय निकालने में कोई भौतिक सार्थकता नज़र नहीं आती। और फिर बच्चे भी अमरीकी बच्चों की तरह जीवन के समस्त सुखों और स्वतंत्रता को युवावस्था से पहले ही हासिल कर लेना चाहते हैं। माता-पिता के न चाहने पर भी उस बेगानी हवा से बच्चों को बचा पाना संभव नहीं लगता। भारतीय बच्चों के लिए एक प्रकार से दोहरी ज़िन्दगी जीने में एक विशेष प्रकार का दबाव भी रहता है। इसलिए उनका व्यवहार अपने सहपाठियों के बीच कुछ और तथा परिवार और पारिवारिक मित्रों के बीच कुछ और होता है। बहुत बार तो इस कारण उनका विकास भी कुंठित हो जाता है। फिर भी इस कारण वे अमरीकी समाज की कई समस्याओं से बच जाते हैं। यहाँ कुछ बड़े और संयुक्त परिवार बड़े मेल-मिलाप से रहते हैं। उनके बच्चों के साथ यह समस्या कम आती है, क्योंकि उन्हें अपने समाजीकरण के लिए घर-परिवार में ही वातावरण मिल जाता है। इसी तरह उच्च शिक्षा के लिए बहुत कम अमरीकी माता-पिता ही बच्चों का खर्च वहां करते हैं। लगभग सभी बच्चे बैंकों से ऊँची दरों पर ऋण लेकर पढ़ाई करते हैं जिसे चुकाते-चुकाते ज़िन्दगी निकल जाती है। छात्रवृत्तियाँ हैं लेकिन नाम मात्र को। चूँकि भारतीय मूल के माता-पिता अपने बच्चों को अंत तक सहयोग देते हैं जो एक अच्छी बात है, लेकिन यह कितनी पीढ़ियों तक चलेगी कुछ नहीं कहा जा सकता।
एक और बड़ी समस्या है- भारतीयों का रंग और नस्ल। वे भले ही लुसियाना के गवर्नर बॉबी जिंदल और नार्थ कैरोलाइना की सिक्ख मूल की निक्की हैली ईसाई धर्म अपना लें और अपने को प्रवासी भारतीय की बजाय अमरीकी कहलाना पसंद करें, लेकिन उनकी शक्ल सूरत उन्हें पूरी तरह से अमरीकी बनने देने में बाधा है। किसी योरोपियन के लिए यह समस्या नहीं है। वे अमरीकी होते हुए भी गर्व से अपने योरोपियन मूल को स्वीकार करते हैं। यद्यपि अमरीका ने जो "मेÏल्टग पॉट' की अवधारणा दी थी वह आज दुनिया में ही नहीं अमरीका में भी असफल होती दिखाई दे रही है, जब आतंकवाद के चक्कर में विचारों की लड़ाई धर्म और नस्ल की लड़ाई बनती दिखाई दे रही है।
भारतीय राजनयिकों के साथ अपमानजनक व्यवहार, प्रवासी भारतीयों पर होने वाले धार्मिक, नस्लीय हमले भी कोई अच्छे संकेत नहीं है। किसी सिक्ख को मुसलमान समझ कर हमला कर देना, किसी भारतीय पर नौकरी छीनने वाला समझकर हमला कर देना, किसी अंग्रेजी न जानने वाले भारतीय को पुलिस द्वारा पीट देना, पूजा स्थलों पर धार्मिक घृणा के तहत हमले आदि चिंताजनक बातें हैं।
इस मामले में भारत की सरकारों का रुख भी कोई बहुत संवेदनशील नहीं रहा। अमरीका ही नहीं अन्य देशों में रहने वाले भारत मूल के लोगों के सम्मान और सुरक्षा के लिए सरकारों में बहुत चिंता नज़र नहीं आती। उन्हें प्रायः विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने वालों और कुछ वोट बैंक के अतिरिक्त कुछ बहुत अधिक नहीं माना जाता। दोहरी नागरिकता भी कहीं न कहीं सरकारों के अपने फायदे के लिए ही नज़र आती है। प्रवासी सम्मेलन में उनके स्वागत में शहरों के कुछ रास्तों का सौन्दर्यवद्र्धन कर देना या उनके लिए कुछ नाच-गाना करवा देना कोई खास महत्त्व नहीं रखता, क्योंकि वे इस प्रकार की लीपा-पोती और नाटकबाजी से अपरिचित नहीं है। वे सब यहाँ रहते हुए यह सब देखते रहे हैं। उनके लिए यह कोई विशेष महत्त्व नहीं रखती जब तक कि उनकी अस्मिता और चिंताओं को साझा नहीं किया जाता। एक छोटी सी लगने वाली बात से इसका पता चलता है- अमरीका में जन्मे बच्चों के माता-पिता जब भारत में आ जाते हैं और उनके बच्चे यहीं से दसवीं और बारहवीं की परीक्षा देते हैं तो भी उन्हें यहाँ की प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने का पात्र नहीं माना जाता जबकि उनके माता-पिता यहीं नौकरी करते हैं और यहीं की सरकार को टैक्स देते हैं तो फिर और किसी प्रकार की और बड़ी संवेदनाशीलता की आशा करना तो व्यर्थ है।
धर्म का अद्वैतवादी दर्शन सारी तार्किकता के बावजूद धर्म, नस्ल के नाम पर सहरुााब्दियों से जमाई जाती रही धारणाओं को उखाड़ नहीं पा रहा है।  शिक्षा, धर्म और सोच में ऐसा क्रान्तिकारी परिवर्तन, अमरीका ही क्या किसी भी देश की वोटों के लिए घटिया हथकंडे अपनाने वाली सरकारों के लिए संभव नहीं है।
अमरीकी प्रवासी भारतीयों को चाहिए कि वे अमरीका की मूल धारा गोरी ईसाई नस्ल को ही सब कुछ न मानते हुए, अमरीका की अन्य नस्लों में भी अपनी पहुँच बनाएं। उन्हें उद्योगों और सामाजिक कार्यों में अपनी उदार उपस्थिति बनानी चाहिए जिससे वे वहाँ के वंचितों और पिछड़ों में अपना एक आधार बना सकें और वहाँ की  ह्मदयहीन आर्थिक व्यवस्था में सामाजिकता का एक उदार चेहरा और चरित्र उदाहरण के रूप में पेश कर सकें। अपने भव्य धार्मिक स्थलों की प्रतिस्पद्र्धा से आगे जाकर भारतीय धर्म, संस्कृति और चिंतन को एक मानवीय करुणा का आधार दें। ज्ञान को पेटेंट करवा कर धन बटोरने के इस समय में समस्त मानवता की सेवा के लिए भारत के सलमान खान की "खान अकेडमी' जैसे  बहुत से समाजोपयोगी प्रयोग अमरीकी भारतीय कर सकते हैं।
इस समय में जब धर्म या तो आतंकवाद का पर्याय बनता जा रहा है या विगत में धर्म परिवर्तन करवाकर दुनिया के किसी भी भूभाग में औपनिवेशिक कूटनीतिक का इतिहास लिखा है। ऐसे में अमरीका के भारतवासी वहाँ धर्म की एक नई व्याख्या प्रस्तुत कर सकते हैं। शायद ऐसा करना उन्हें अमरीका में अन्य उपलब्धियों की बजाय अधिक जीवंत बना सकता है।

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