ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अमेरिका, बच्चे और हिंदी
01-Jan-2018 02:06 PM 2778     

मैं जब आज सुबह सोफ़े पर बैठ कर अपनी चाय के मज़े ले रहा था कि मेरी छह वर्ष की बेटी आई और कौतूहल से पूछने लगी, "पा, रंजना तो हम लोगों के बाद इण्डिया से अमेरिका आई थी, फिर उसे मुझसे अच्छी हिन्दी क्यूँ नहीं आती?"
मासूम सवाल था, तो मैंने यह कहके टाल दिया कि वो इण्डिया में भी इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ रही थी, तो वो हिन्दी ज्यादा नहीं सीख पाई।
लेकिन इस बारे में थोड़ा सोचना शुरू किया। मैंने अक्सर दो तरह के प्रवासी माता-पिता देखे हैं और दोनों एक दूसरे से लगभग विपरीत हैं।
एक पक्ष का मानना है कि विदेश में रहने से संस्कृति से दूरी बढ़ेगी और यह भविष्य में अपनी जड़ों से अगली पीढ़ी को हमेशा के लिए काट देगा। यह पक्ष इस बारे में खासा चिंतामग्न है और इसके लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम, देसी गीत-संगीत-नृत्य में बच्चों की शिक्षा और तीज-त्योहार पर विशेष आयोजन इत्यादि करता रहता है।
वहीं जो दूसरा पक्ष है, उनका मानना है कि जिस देश में रहते हो उसी के जैसा खाओ, खेलो और बोलो, नहीं तो हमेशा कटा महसूस करते रहोगे और कभी भी मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाओगे। इस पक्ष के लोग विदेशी भाषा और रहन-सहन को अपनाने से परहेज नहीं करते। अपने लिए न सही लेकिन अपने बच्चों को प्रोत्साहित करते हैं। ऐसे माँ-बाप आपको अक्सर मिल जाएँगे जो अपने बच्चों से सिर्फ अंग्रेजी में बात करते हैं, भले ही उनकी अपनी अंग्रेजी मशाल्लाह हो।
लेकिन इन दोनों पक्षों में एक समानता है - एक को संस्कृति की तालीम की चिंता है दूसरे को नहीं, लेकिन दोनों में से किसी को भी भाषा की चिंता नहीं है। ये बात ख़ास तौर पर हिन्दी भाषी क्षेत्रों से आए लोगों पर लागू होती है। पहले पक्ष के लोग हिन्दी में बच्चों से बात करते हैं लेकिन उनके अंग्रेजी के प्रत्युत्तर से परेशान नहीं होते। दूसरे पक्ष के लोग तो भले ही अपने परिवार और दोस्तों से हिन्दी में बातचीत करें लेकिन बच्चों से सिर्फ अंग्रेजी में ही बात होती है।
वैसे मैं इस बात को मानता हूँ कि भाषा वही है जो अपनी बात कहने में सक्षम हो और बैठ कर सिर्फ भाषा का परचम लहराना भाषा को और कमजोर करता है। एक बार हिन्दी दिवस पर मैंने दो पंक्तियाँ ट्विटर पर लिखी थी -
जो ग्रन्थों से गुजरते हुए,
मोहल्लों में मिले, भाषा वही है आबाद
हिन्दी दिवस के ठ्ठद्वद्मद्रत्ड़त्दृद्वद्म अवसर पर
सभी को दिली मुबारकबाद
हिंदी-उर्दू और कदढ़थ्त्द्मण् की इस मिलीजुली बधाई का अर्थ यह कि जो जनमानस बोलता है वही भाषा है। लेकिन हमेशा ये बात कचोटती है कि वो प्रवासी जिनकी पहली पीढ़ी ही यहाँ पर विस्थापित हुई है उन्हे अपने बच्चों से अपने संचार के माध्यम वही रखने चाहिए जो वो अपने परिवार और क़रीबी मित्रों के साथ रखते हैं, यही प्राकृतिक लगता है। सिर्फ इतना ही नहीं, वैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि बहु-भाषा वातावरण में बढ़ने वाले बच्चों का दिमागी विकास बहुत अच्छा होता है। रहा सवाल देवनागरी लिपि का तो उसकी हालत तो बहुत ही दयनीय है। भारत में ही बहुत से हिन्दी जानने वाले लोग और खासकर वो लोग जो बचपन से देवनागरी में पढ़ाई-लिखाई करते थे, उन्हें भी देवनागरी पढ़ने-लिखने के नाम से पसीने छूट जाते हैं। कहते हैं कि बहुत साल हो गए, अब नहीं पढ़ा-लिखा जाता।
इस बारे में मेरा मत ये है कि हिन्दी में जो साहित्य का खज़ाना है उसे अगर पाना है तो देवनागरी सीखने का इससे अच्छा क्या बहाना हो सकता है। मसलन, बच्चों को अकबर-बीरबल की कहानियाँ अच्छी लगती थीं तो मैंने कहा तुम खुद पढ़ना सीखो और फिर यह अच्छी किताबें पढ़ सकते हो। यह तकनीक बहुत कारगर रही।
सिर्फ बच्चे ही नहीं बड़े भी रोमन में हिन्दी लिख कर अपने परिवार-दोस्तों के बीच मैसेज का आदान-प्रदान करके संतुष्ट हैं लेकिन अगर उन्हें अगर अपने पसंदीदा लेखक-कवि को और जानना है तो देवनागरी में पढ़े और लिखें। हिन्दी की बात देवनागरी में लिखी हुई बहुत सुंदर और सटीक लगती है, दठ्ठ त्त्त् द्धदृथ्र्ठ्ठद थ्र्ड्ढत्द (शायद आप समझ गए होंगे)।
इस बात पर फिर से एक बार ज़ोर देना चाहूँगा कि भाषा वही है जो अपनी बात कहने में सक्षम हो। ज़रूरी नहीं कि हिन्दी बोलना है तो ट्रेन को लौह-पथ-गामिनी कहें, बल्कि अगर यह हठ बना रहा तो हिन्दी के लिए बहुत ही घातक साबित होगा।
एक बार किसी को राजभाषा दिवस के दिन कहते हुए सुना, "अगर छिन्न-भिन्न और मरणासन्न होती जा रही भाषा का जीर्णोद्धार करना है, तो न केवल उसे संप्रेषणीय और सुगम बनाना होगा अपितु अन्य भाषाओं और उपभाषाओं के लोकप्रिय शब्दों और वाक्यांशों को सहर्ष अपनाने कि तीव्र आवश्यकता है, अन्यथा हिन्दी का परिमार्जन का स्वप्न रसातल कि ओर चला जाएगा।" सुनकर बहुत ज़ोरों कि हंसी आई। यह साहब जिस बात को कह रहे हैं, वो खुद अपनी भाषा में नहीं अपना पा रहे। यही हिन्दी कि विडम्बना है आजकल। भाषा वही बोलें जो बात कह जाये और अगर हिन्दी भाषी लोगों से बात की जा रही है तो हिन्दी से अच्छा और क्या माध्यम हो सकता है बात को कहने का। अमेरिका और दूसरे देशों में बसे भारतीय मूल के लोग ज़रूर वही भाषा सीखें और बोलें जिससे उनके कार्यक्षेत्र और समाज में उनका बसर अच्छे से हो, लेकिन साथ ही हिन्दी को भी उसी तरह से समझ कर उसका इस्तेमाल अपने लोगों के साथ करें तो हिन्दी यूं ही जीवित और प्रगतिशील रहेगी।
अंत में मेरी एक कविता के कुछ अंश -
मैं गूंगा हो जाता अगर हिन्दी न होती
यूं तो इंग्लिश में सीखा सारा ज्ञान-विज्ञान
कमाये जीविका के सिक्के, सामाजिकता का सामान
चुकाए रिश्तों के ऋण, किया सपनों का भुगतान
मगर,
दोस्त को दिया दिलासा भरा आलिंगन
प्यार की पाती, स्नेह का चुंबन
क़रारी हार के बाद का आत्ममंथन
या सर्वशक्तिमान से कभी कोप, कभी समर्पण
यह सब कैसे हो पाता अगर हिन्दी न होती
मैं गूंगा हो जाता अगर हिन्दी न होती।

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