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अमरीका में हिंदी का दीपक
01-Jun-2016 12:00 AM 4222     

न्यूयॉर्क में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी का तीन दिवसीय आयोजन 29 अप्रैल से 1 मई 2016 तक सम्पन्न हुआ। भारत के जनरल कांसुलेट के हॉल में सम्पन्न समारोह में ¶ाामिल होने दे¶ा-विदे¶ा से और भारत के विभिन्न प्रदे¶ाों से हिंदी के वि¶ोषज्ञ और हिंदी के प्रेमी आए। यह आयोजन अमेरिका में रहने वाले भारतीय समुदाय के प्रतिनिधियों के अलावा वहां के कॉलेज और वि·ाविद्यालयों के हिंदी के अध्ययन-अध्यापन से जुड़े लोगों और राजदूत रीवा गंगुली दास और राजदूतावास के अधिकारियों को आपस में मिलने का अवसर देता है।
घोषणा और प्रबंध का श्रेय खासकर "हिंदी संगम' और अ¶ाोक ओझा को जाता है जो तीन साल से अपना समय और अपनी ¶ाक्ति इसमें लगाता रहा है। न्यूयॉर्क की हिंदी संगोष्ठी की वेबसाइट (ध्र्ध्र्ध्र्.ण्त्दड्डत्ड़दृदढड्ढद्धड्ढदड़ड्ढठ्ठथ्र्ड्ढद्धत्ड़ठ्ठद्म.ड़दृथ्र्) पर समारोहों के चित्र, वीडियोस और अब्स्ट्रैट्स उपलब्ध हैं।
संगोष्ठी की ओर से कहा गया कि "हिंदी ¶िाक्षा केंद्र' यानी च्र्ण्ड्ढ क्तत्दड्डत् क्ड्ढदद्यड्ढद्ध दृढ ॠथ्र्ड्ढद्धत्ड़ठ्ठ के नाम से एक संस्थान स्थापित किया जाए जो अमरीका में हिंदी सीखने के इच्छुकों के लिए और प्रवासी समुदाय के लिए हो। यह प्रस्ताव नया नहीं है। मॉरी¶ास में 2014 के वि·ा हिंदी सम्मलेन पर इस तरह का प्रस्ताव किया गया था। न्यूयॉर्क की संगोष्ठी की तरफ से इस सुझाव पर एक बार फिर ज़ोर दिया गया है। अकादमिक समिति की प्रमुख प्रो. गैब्रिाएला निक इलवा ने अपने वक्तव्य में इस पर खासकर ज़ोर डाला कि ऐसे बहुत से दे¶ा हैं जिनके भाषा ¶िाक्षण प्र¶िाक्षण के आधार के साथ सांस्कृतिक केंद्र पूरी दुनिया में मिलते हैं। जिस तरह से फ्रांस का अल्लिअन्सेस फ्रांसेस, रूस का पु¶िकन इंस्टिट्यूट, जर्मनी का गेटे इंस्टिट्यूट (भारत में इनके लिए "मैक्स मूलर भवन' का नाम रखा गया है) और चीन का कोंफुसउस इंस्टिट्यूट है।  
भारत अभी तक इसका मुकाबला नहीं करता। इसका एक प्रमुख कारण यह कि हिंदुस्तान में 22 राष्ट्रीय भाषाएं हैं। सरकार की तरफ से जब विदे¶ा में सांस्कृतिक राजनीति में हिंदी पर बल दिया जाता है तो दूसरी राष्ट्रीय भाषाओं के नाम से विरोध उठने की संभावना बनती है।
दूसरी यह बात है कि भारत में जो मान्यता अंग्रेजी को है वैसी न हिंदी और न किसी दूसरी भारतीय भाषा को प्राप्त है। भारत में अच्छी नौकरी के लिए अच्छी अंग्रेजी अनिवार्य लगती है। हिंदी ¶ाायद अपने घर की बोली तो ज़रूर है, पर अपने को और अपने बच्चों को समाज में आगे बढ़ाने के लिए हिंदी का कोई खास महत्त्व तो नहीं है।
और जो भी प्रवास के तौर पर भारत से अमरीका आता है वह अपनी और अपने बच्चों की अंग्रेजी आगे बढ़ाने के लिए को¶िा¶ों करता है। हिंदी, बंगाली, गुजराती या जो भी मातृभाषा है, उसे अपनी पहचान के प्रतीक में मान्यता ज़रूर मिलती है। असली बात यह है कि हिंदी अपने आप से आगे नहीं बढ़ेगी। हिंदी तभी आगे बढ़ेगी जब लोग इसे अपने हाथ में लें, इस्तेमाल करें, साहित्य पढ़ें, बहस और बातचीत का एक उपयुक्त माध्यम समझें।
न्यूयॉर्क की म¶ाहूर हिंदी की लेखिका सुषम बेदी ने स्पष्ट रूप से कहा कि आजकल ¶ाहर में स्पेनि¶ा बहुत महत्त्वपूर्ण है। ऐसे बहुत सारे रेस्टोरेंट्स हैं जिनके मेनू कार्ड अंग्रेजी के साथ स्पेनि¶ा में हैं।  इधर-उधर चीनी में भी मिलते हैं, पर हिंदी में कोई मेनू कार्ड कहीं नहीं मिलेगा क्योंकि हिंदी भाषी समुदाय इसको निरर्थक समझता है। यह समस्या तो नयी नहीं है, इसे हर कोई जानता है।  
संगोष्ठी में उपस्थित भारतीय प्रवासी समुदाय के सदस्यों को मालूम है कि हम हिंदी की मामूली हालात आसानी से बदल नहीं सकते। भारत के प्रधानमंत्री अमरीका में भाषण तो ज़रूर हिंदी में देंगे, पर प्रवासियों की नई पीढ़ी की जागरूकता बहुत कम हिंदी की ओर जाती है। वैसे यह मामूली बात है और ¶ाायद अनिवार्य भी है कि ज़्यादातर अमरीका में प्रवासी दो-तीन पीढ़ियों में अपने पूर्वजों की भाषा भूल जाते हैं। चीनियों के साथ भी यही नियम लागू होता है। ग़्ठ्ठद्यत्दृदठ्ठथ् क्तड्ढद्धत्द्यठ्ठढ़ड्ढ ख्र्ठ्ठदढ़द्वठ्ठढ़ड्ढ ङड्ढद्मदृद्वद्धड़ड्ढ क्ड्ढदद्यड्ढ की डायरेक्टर ग्र्थ्ढ़ठ्ठ ख़्ठ्ठढ़ठ्ठद ने अपने भाषण में इस नियम को समझाया। पर इसके साथ ही उन्होंने अमरीका की बदलती हुई भाषा राजनीति पर भी रौ¶ानी डाली।
9/11 के बाद अमेरिका में सांस्कृतिक विभिन्नताओं पर नए ढंग की सोच ¶ाुरू हुई। इसका भाषा नीति पर भी गहरा असर पड़ता रहा। इन दिनों 11 भाषाएं ड़द्धत्द्यत्ड़ठ्ठथ्थ्न्र् दड्ढड्ढड्डड्ढड्ड भाषाएं मानी जाती हैं, जिसमें हिंदी-उर्दू ¶ाामिल हैं। हिंदी-उर्दू फ्लैग¶िाप प्रोग्राम्स कई साल से ऑनलाइन सामग्री इकट्ठा करते रहे हैं जो पूरी दुनिया में हिंदी के अध्यापन में इस्तेमाल किए जाते हैं। 2006 से अमरीका में "च्द्यठ्ठद्धद्यठ्ठथ्त्त्" के नाम से (द्मद्यठ्ठद्धद्यठ्ठथ्त्त्.द्वथ्र्ड्ड.ड्ढड्डद्व) नया प्रोग्राम ¶ाुरू हुआ। इस प्रोग्राम का केंद्रबिंदु 16 साल की उम्र से नीचे के ऐसे बच्चे हैं जिनके माता-पिता हिंदुस्तान से आकर अमेरिका में बसे हैं और जिनके परिवारों में कहीं हिंदी कुछ हद तक बोली जाती है।
स्टॉरटॉक का मुख्यालय मैरीलैंड वि·ाविद्यालय के साथ है, उसमें हिंदी का अध्ययन-अध्यापन कई साल से स्कूलों, कालेजों और समर कैम्प में होता है। इसके लिए परीक्षाओं का पूरा एक ढांचा भी है और इसके साथ अध्यापकों का प्र¶िाक्षण नियमित रूप से चलता है। साथ में कई वि·ा विद्यालय ऑनलाइन पढ़ाई की सामग्री उपलब्ध करते हैं।  
प्रो. राके¶ा रंजन ने ऑनलाइन संचालित कोलम्बिया वि·ाविद्यालय की स्टॉरटॉक सामग्री संगोष्ठी में दिखायी कि सारा प्रोग्राम सरकारी पैसे के आधार पर चलाया जाता है। गैब्रिाएला निक इलवा और अ¶ाोक ओझा इस प्रोग्राम को जारी रखने में सक्रिय तौर पर जुड़े हैं।
"पेन वि·ाविद्यालय' के भूतपूर्व हिंदी के प्राचार्य सुरेन्द्र गम्भीर ने अपने भाषण में कहा कि अमेरिका में हिंदी का कोई खास भविष्य नहीं है जब तक भारतीय प्रवासी समुदाय का सोचने का ढंग नहीं बदलेगा। हालाँकि सुरेंद्र गम्भीर और इनकी पत्नी भाषाविद् डॉ. विजय गम्भीर दोनों स्टॉरटॉक के अकादमिक कमेटी में सक्रिय रहे हैं।
पद्मभूषण डॉ. लक्ष्मी प्रसाद यरलगड्डा ने सही कहा कि हमको देखना है कि हिंदी के साथ अमरीका में बहुत कुछ बदल रहा है पर भारत के सरकार का कोई असर और कोई खास आदान-प्रदान इस उन्नति के साथ नहीं है।
हिंदी "वि·ाभाषा' है, इसके कई तरह से उदाहरण दिये जाते हैं, पर भाषा के तौर पर विदे¶ाों में इसके अध्ययन-अध्यापन की स्पष्ट परिभाषा और रूपरेखा नहीं है।
जिस तरह से चीनी सीखने के लिए पूरी दुनिया में छात्र आते हैं और कोंफुसिउस इंस्टिट्यूट में ¶िाक्षण और प्र¶िाक्षण प्राप्त कर सकते हैं, वैसी स्थिति हिंदी की नहीं है। विचारणीय है कि प्रवासी भारतीय अमेरिका में दुनिया का सबसे भव्य मंदिर निर्माण करने के लिये अरबों डॉलर जुटा सकते हैं, लेकिन भाषा के विकास और प्रसार के लिये वे चुप्पी साध जाते हैं।
उम्मीद है कि तृतीय अंतर्राष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी - जिसका नाम पहले "हिंदी क्षेत्रीय संगोष्ठी' रखा गया था, के ¶ाुभारम्भ के अवसर पर जलाया गया दीपक हिंदी के विकास की राह को रौ¶ान करने और "हिंदी ¶िाक्षा केंद्र' के रूप में महत्त्वपूर्ण कदम साबित होगा

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