ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
आलाप नैना रे
02-Jul-2019 11:26 AM 1182     

आलाप

शृंगार रस सभी गाते हैं
विरह किसी को नहीं भाता है
इस जहाँ में मैं ही एक पगली हूँ
जिसे दर्द में ही मजा आता है।

लोग फूलों की बाते करते हैं
हम सिर्फ कांटों पे चला करते हैं
मिलन के गीत कैसे गाऊँ
जब बिछोह से मेरा नाता है।

रंगों से रंगा हैं सबका जीवन
रंगमयी ये दुनिया धरती और गगन
पर अछूती रह गई मैं रंगों से
चाहे जिस रंग में भी रंगू
मैं खुद को उतर ही जाता है।

रंगरेलियां, जवानी की मस्तियां
अछूती रह गई मैं इन सबसे
संग रहती हैं मेरी तन्हाईयाँ
किस स्याही से लिखा है भाग्य मेरा
कुछ समझ नहीं आता है।

 


नैना रे

नैना रे तू इतनी ख़ामोश क्यों हैं?
न हँसती हैं न रोती हैं
बस चुपचाप नीले अंबर को तकती हैं
कल तक कितनी सारी खारी लहरें
मचलती थी तेरी पलकों की ओट पे
आज तू इतनी खुश्क क्यों हैं?

पहले तेरी गोद में जाने कितने ख़्वाब थे पलते
चैन की नींद आती थी
रतिया को सौ अरमां थे मचलते
निशा आई है पर तू जगी-जगी क्यों हैं?

ना तुझमें अब किसी की चाहत दिखती
ना किसी को देखने की आरज़ू है
क्या तूने खो दिया है बता ऐ बावरी
हरपल तू इतनी खोई-खोई क्यों हैं?

ग़म हो या खुशी अब तू झलकती नहीं
इश्क़ की ख़ुशबू से तू महकती नहीं
कल तलक प्यार वफ़ा से थी तू लबरेज़
आज तू इतनी बेजार क्यों हैं?

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