ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अखाड़ों में छलकती कुम्भ कथा
01-Apr-2016 12:00 AM 1071     

कुम्भ और कलश भारतीय संस्कृति के शुभ प्रतीक हैं। संभव है कि कुम्भ मेलों की शुरुआत इन्हीं शुभंकरों के साथ हुई हो। इसीलिए इन्हें कुम्भ कहा जाने लगा हो। इस मेले लगने के स्थान का निर्धारण राशियों की स्थिति पर निर्भर होता है।
कुम्भ मेला भी है और पर्व भी। एक ऐसा पर्व जो "वसुधैव कुटुंबकम्' की भावना के साथ मनाया जाता है। जहाँ सारे पर्व केवल परिवारी जनों के बीच मनाए जाते हैं, यह पर्व सारी दुनिया के लोगों के बीच उल्लासपूर्वक मनाए जाता है। भारत को छोड़कर दुनिया के किसी भी देश का प्राचीन इतिहास यह नहीं बताता कि उनके यहाँ भी कभी ऐसे मेले लगते थे। भारत इस दृष्टि से दूरदृष्टा देश रहा है। अपनी वैज्ञानिक खोजों को जनता तक पहुंचाने के साधन ऐसे मेलों से सुंदर और कौन हो सकते थे। सारी जनता को ग्रह नक्षत्रों के प्रभाव को बताने, सभी को मूल्यों की शिक्षा देने का यही सबसे बड़ा संचार माध्यम थे।
कुम्भ मेले की अमृत कथा बड़ी विचित्र है। सिंधु मंथन में चौदह रत्न मिले थे। इनमें सबसे कीमती बल्कि अमूल्य चीज़   अमृत था। इसे पीने वाला अमर हो जाता है। यह रहस्य पता चलते ही अमृत कलश के लिए देव-दानव आपस में भिड़ गए। अमृत की खींचातानी के समय चन्द्रमा ने अमृत को बहने से बचाया। गुरू ने कलश को छुपा कर रखा। सूर्य देव ने कलश को फूटने से बचाया और शनि ने इन्द्र के कोप से रक्षा की। इसलिए जब इन ग्रहों का संयोग एक राशि में होता है तब कुम्भ का आयोजन होता है। क्योंकि इन चार ग्रहों के सहयोग से ही अमृत की रक्षा हुई थी। अमृत को प्राय& अमरता से जोड़ कर (मृत्युहीन जीवन के रूप में) देखा जाता है पर यह न मरने यानी जीवन का भाव या जीवन्तता को भी इंगित करता है। जीना तो देश और काल में अवस्थित संवेदना से ही संभव हो पाता है। उसके लिए अपने देश काल से जुड़ना जरूरी है। कुम्भ का पर्व उसमें सम्मिलित होने वाले तीर्थयात्रियों के लिए जीवन का उत्सव हो जाता है। देश और दुनिया के कोने-कोने से जवान, प्रौढ़ और बूढ़े सब परिजनों समेत अपनी-अपनी चाह के साथ यहाँ पहुँचते हैं। यहाँ आस्था और वि?ाास के साथ आने वालों की यात्रा की मुश्किल राह भी आसानी से कट जाती है। यहाँ आने वाले यात्रियों को एक-दूसरे का सहारा भी बना रहता है। अजनबी भी अपने हो जाते हैं। कोई किसी की बची हुई लकड़ी ले लेता है तो कोई राशन। यहाँ "संघे शक्ति:कलौ युगे' को अर्थ पाते देखा-महसूसा जा सकता है। अनजानी जगह में ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था भी समूह में रह कर आसानी से संभव हो पाती है। हजारों वर्षाें से कुम्भ की यह यात्रा श्रद्धालु लोगों के जीने की कहानी बनती आ रही है। संसाधनों के बावजूद आज भी इस भावना को सामाजिक स्मृतियों को रचते और उन्हें रूप पाते देखा जा सकता है। इन स्मृति कथाओं, जिनमें कैमरों और मोबाइल के सेलफ़ी भी शामिल हैं से यात्रा के कष्ट और तनाव आज भी कम होते हैं तो क्या इनकी यह उपलब्धि कुछ कम है। कोई भी जाकर तो देखे। कयामत की भीड़ में अकेले होने का एहसास यहाँ कदापि नहीं होता। नाना प्रकार के अनुभव मिल कर एक अद्भुत जीवन रस का सृशती करते हैं। कुम्भ मेले में आकर सबको जिस अमृतानुभाव की प्राप्ति होती है उससे पुष्ट होता है कि वास्तव में इन स्थलों पर अमृत गिरा ही नहीं होगा, कभी प्रवाहित भी रहा होगा, जिसका स्रोत अभी सूखा नहीं है।
कुम्भ मेले का सबसे बड़ा आकर्षण शाही स्नान होता है। देश-दुनिया के कोने-कोने के लोगों को यह आकर्षण मेले तक खींच लाता है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने बाद से तो इस स्नान का महत्त्व और बढ़ गया है। जो मेला देखने नहीं जा पाते हैं, वे टीवी में आँखें गड़ाए शाही स्नान के दर्शन का पुण्य लूटे बिना नहीं रहते। शाब्दिक व्युत्पत्ति की दृष्टि से देखें तो शाही स्नान मेले जितना पुराना शब्द नहीं है। यह फ़ारसी का शब्द है। ऐसा लगता है कि शाही स्नान शब्द मेलों के आरंभ के बजाय संघर्ष के आरंभकाल यानि मुगल शासन काल से प्रचलन में आया होगा। कभी-कभी शाही स्नान जल से देह शुद्धि के बजाय रक्त स्नान बन जाता रहा है। इसलिए इसे वर्चस्व की लड़ाई का स्नान भी कहा जाता है। इस शाही स्नान का सबसे बड़ा आकर्षण नागा साधु होते हैं।
नागा साधु इस पंथ में शामिल होने के लिए जब आते हैं तो उनके शरीर पर कोपीन के अलावा पास में कुछ नहीं होता। नागा बनने की प्रक्रिया में लगभग छह साल लग जाते हैं। इस दौरान नए सदस्य एक लंगोट के अलावा कुछ नहीं पहनते। कुम्भ मेले में अंतिम प्रण लेने के बाद वे लंगोट भी त्याग देते हैं और जीवन भर दिगंबर रहते हैं। इनके अपने अखाड़े होते हैं जिन्हें सुविधा की दृष्टि से मोटे तौर पर शैव और वैष्णव अखाड़ों मे बांट सकते हैं। इनमें से कोई भी अखाड़ा किसी को ऐसे ही नहीं अपना लेता है। अच्छी तरह जाँच-पड़ताल कर योग्य व्यक्ति को ही प्रवेश दिया जाता  है। नागाओं मे ब्रह्मचारी, महापुरुष और अवधूत की तीन कोटियाँ होती हैं। नागा बनने की प्रक्रिया के दौरान पहले उसे लम्बे समय तक ब्रह्मचारी के रूप में रहना होता है, फिर उसे महापुरुष तथा खूब तपने-तपाने के बाद अवधूत बनाया जाता है।
नागा साधुओं का संप्रदाय ही एक ऐसा संप्रदाय है जो जीवन के बाद संपन्न होने वाले संस्कार भी जीवन काल में ही स्वयं ही अपने हाथों संपन्न कर लेता है। अन्तिम प्रक्रिया महाकुम्भ के दौरान होती है जिसमें उसका स्वयं का पिण्डदान तथा दण्डी संस्कार आदि शामिल होता है। नागा साधु अपना मुंडन और पिंडदान करते हैं उसके बाद ही गुरु मंत्र लेकर संन्यास धर्म मे दीक्षित होते है इसके बाद इनका जीवन अखाड़ों, संत परम्पराओं और समाज के लिए समर्पित हो जाता है। अपना श्राद्ध कर देने का मतलब होता है सांसरिक जीवन से पूरी तरह विरक्त हो जाना। इसका अभिधार्थ यह होता है कि अब सांसारिक व्यक्ति के रूप में नहीं रहेंगे। माया-मोह का उनके जीवन में लेश नहीं रह जाएगा। नागाओं के बाद विरक्ति की यह स्थिति योगियों में देखी जा सकती है। वहाँ योगी अपना भेष छिपाकर बिना किसी मोह ममता के अपने ही परिवार से भिक्षा माँगकर लाता है तब जाके वह अपनी परीक्षा में उत्तीर्ण हो पाता है। योगी को अपनी माँ से  भिक्षा ग्रहण करते समय बिलकुल मोह ग्रस्त नहीं होना चाहिए। यह उसके साथ गया परीक्षक निश्चित करता है कि परीक्षित योगी मोहग्रस्त हुआ कि नहीं। यह सब मैंने बचपन में माँ से सुना था। "माँ यह भी कहती थी कि ये लोग बचपन में ही बच्चे को उठा ले जाते हैं।' इसलिए डरवश कभी उनके निकट नहीं जाता था। यदि डर न होता तो उनके निकट जाकर और रहस्य प्राप्त किए जा सकते थे। लेकिन नागा साधु तो गाँव के भीतर ही प्रवेश नहीं करते तो उनके बारे में क्या जानकारी हासिल हो सकती थी। इनके समृद्ध होने के बारे में बहुत सारी किंबदंतियाँ मैंने बचपन में भी सुनी हैं। लेकिन इनके संन्यास की परंपरा जैसी तब गूढ थी आज भी बनी हुई है। ये सांसारिक जीवन के कहीं भी निकट नहीं आते। समाज में  इनकी उपस्थिति पितरों की तरह सांकेतिक ही मानी जाएगी। वास्तविक कदापि नहीं। इंद्रियों पर काबू पाना नागा की सबसे कठिन परीक्षा होती है। इसमें उसकी कामेंद्रियाँ तक तोड़ दी जाती है, नियंत्रण करना और हर प्रकार की कामना का अंत कर देना होता है।

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