ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
आज़ादी की कीमत
01-Aug-2016 12:00 AM 1465     

देश केवल लोगों के रहने की जगह का नाम नहीं है, वह तो सहकार भावना से जीवन को आपस में सँवारने की जगह है। किसी भी देश के लोग कभी भी अकेले-अकेले जीवन नहीं जी सकते, उन्हें तो साथ रहकर ही जीवन की सुन्दर कल्पना करना पड़ती है। इस कल्पना के न होने से किसी भी देश का कोई भी सपना साकार नहीं हो पाता है। फिर मन ही मन लगता है कि हमारा देश हमारे ही हाथों से छूट गया है और शायद देश को भी लगता हो कि उसके लोग उससे दूर जाते हुए दिखाई दे रहे हैं।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम की रचना करते हुए महात्मा गांधी और उनके तमाम श्रेष्ठ सहयोगियों ने इस देश के स्वराज्य की परिकल्पना प्रस्तावित की थी, जिसका अर्थ है कि सब अपने-अपने हुनर और कारीगरी को बचाकर अपने पांव पर खड़े रह सकें। वे अपनी भाषा बोल सकें। वे अपना भजन कर सकें। वे अपना भोजन जुटा सकें और अपनी भूषा के लिये अपने कपड़े खुद बुन सकें। वे बाजारों से भरी दुनिया में कहीं खो न जायें, उन्हें तो अपने घर और गांव के करीब रहकर ही अपने देश को सजाना-संवारना पड़ेगा। ऐसा करने से वे अपने आसपास के प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा कर पायेंगे और पूरी दुनिया के हो सकेंगे। क्योंकि जब प्रकृति उजड़ती है तो किसी एक की नहीं सबकी सांसें घुटने लगती हैं। इसी कारण हमारे महापुरुषों ने यह जरूरी समझा कि मनुष्य को अपने स्वराज्य को बचाये रखने के लिये अपने देश की प्रकृति और परम्परा के करीब बना रहना चाहिये। जो देश अपनी संस्कृति भूल जाते हैं वे कभी सार्वभौम भी नहीं हो सकते।
आमतौर पर यह अनुभव में आता है कि लोग आज़ादी का मतलब सिर्फ अपने अधिकारों की मांग तक सीमित करते दिखाई देते हैं। यह देखकर गांधी जी कहते थे कि जब सब मांग रहे हों तो कौन किसको देगा। पर साथ ही वे यह भी कहते थे कि जब सब अपने-अपने कर्तव्य निभा रहे हों तो सब मिल कर सबको कुछ न कुछ तो दे ही सकते हैं। गांधी जी ने इसी आपसी सहकार को भारत के स्वराज्य की कुंजी माना था। स्वतंत्रता का अर्थ यह तो बिलकुल नहीं है कि हमारा राज्य कायम हो गया, हमने अपना एक प्रजातंत्र गढ़ लिया, उसकी एक सरकार बना ली, उसके कुछ कर्मचारी नियुक्त कर दिये और बाकी लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया। स्वतंत्रता का अर्थ तो यह है कि सब लोग स्वतंत्र अनुभव भी करें। इस अनुभव के बिना आज़ादी लोगों का रोज दम घोंटती रहती है। बाहर से आये लोग तो चले गये पर अपने ही लोग उनके जैसी बातों को दोहरा कर वही के वही बने रहते हैं।
कोई किसी को गुलाम नहीं बना सकता। गुलाम वही हो सकते हैं जिन्हें अपने स्वराज्य पर भरोसा नहीं होता। जब भारत में फिरंगी व्यापार के लिये आये थे तब हमारे ही राजे-रजवाड़े और नबावों ने फिरंगियों के लालचों में फंसकर धीरे-धीरे अपने स्वराज्य को ही खो दिया और वे उनके पराधीन होते गये। यह हालत लोगों को पराधीनता में ले गयी, उनके सहारे छूटते गये और वे ब्रिाटिश हुकूमत की लूट और अत्याचार के ¶िाकार होने लगे, क्योंकि उनकी तरफ से बोलने वाला कोई नहीं था। गांधी जी के आने के बाद पहली बार भारत में ऐसा हुआ कि भारत के लोगों की तरफ से कोई बोलने वाला सामने आया। सैकड़ों वर्षों का इतिहास गवाह है  कि गाँधी जी ही ऐसे थे जिन्होंने भारत की उखड़ती जड़ों पर फिर से मिट्टी डालने का काम शुरू किया और ग्राम स्वराज्य की परिकल्पना को साकार करने के लिये भारत के समाज को राजी किया। यह पहली बार था जब सैकड़ों बर्षों बाद भारत के लोगों ने एक ऐसी आवाज़ सुनी जिस पर भरोसा किया जा सकता था।
कुछ लोग भारत से दूर देशों में बस कर अप्रवासी हो गये हैं। उनके मन में अपने देश के प्रति जो व्याकुलता है वह पूजा-पाठ की सतह पर ही ठहर गयी है। जाहिर है जो लोग अपने देश से बहुत दिनों के लिये दूर चले जाते हैं वे उसकी गहरायी से भी दूर चले जाते हैं। कहीं दूर देश से देखा जाता अपना देश अभी भी पुराना-सा लगता है और उस पुरानेपन की यादों में खोकर लोग अपनी स्मृतियों में अपने देश को हमेशा पिछड़ा बनाये रखते हैं, जबकि देश बहुत आगे बढ़ गया होता है। वैसे तो हमारे अप्रवासी खुद को ही आगे बढ़ा हुआ मानते होंगे पर वे जहां हैं वहां रह कर उनके मन में देश हमेशा पिछड़ा ही बना रहता है। देश से बाहर चले गये लोग अक्सर कुछ सुविधाएँ पाकर अपने आपको स्वतंत्र मानकर जीने भी लगते हैं। पर अगर वो गहरायी से सोचें तो वे अपने आप को परदेश की परतंत्रता में ही जीता हुआ पायेंगे। सुविधा अक्सर विचार से दूर बनाये रखती है। वह फुरसत ही नहीं देती कि ठिठककर अपने स्व-राज्य के बारे सोचा जा सके।
किसी भी देश की आजादी लोगों के आपसी भरोसे पर ही टिकी रहती है। एक दूसरे का भरोसा खोते लोग अपनी आज़ादी को बचाने में असमर्थ होते जाते हैं। आज़ादी का अर्थ किसी देश में कुछ समय के लिये टिक कर रहना भर नहीं है, बल्कि उसके पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, हवा-पानी, पर्वत-नदियाँ और दूसरे प्राणियों को भी साथ लेकर चलना है। अस्तित्व के मूल स्वभाव में ही सहकार की भावना बसी हुई है - धरती सूरज के बिना, सूरज पानी के बिना, पानी हवा के बिना, हवा शब्द के बिना और शब्द आकाश के बिना रह ही नहीं सकते और इन्हीं से तो हम बनते हैं। जब ये नहीं रह सकते तो हम एक-दूसरे से दूर कैसे रह सकते हैं। हमें अपनी उस गुम हुई आज़ादी की कीमत को बार-बार पहचानना पड़ेगा जिसे हमने खो जाने पर पाया था।

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