ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ऐ कवि सूरज उदास है
01-Apr-2019 09:55 PM 661     

ऐ कवि

ऐ कवि
तुम्हारी कविताओं में
लड़कियां सिर्फ
श्रृंगार में क्यों डूबी होती हैं
तुम गुलाबी गाल
नागन-सी जुल्फ
और गोरे रंग पर लिखते हो
क्यों तुम्हे कंडे पाथती
पपड़ी पड़े होठों
और रूखे बालों वाली लड़की नहीं दिखती
क्यों नहीं लिखते कविता
उसकी अंदर धँसी
बेनूर आँखों पर
क्यों तुम्हारे शब्द खामोश हो जाते हैं
जब उसके पैरों की बिवाइयां
कुछ बोलना चाहती हैं
और क्यों तुम्हारे कलम की स्याही
वहां जाकर
ख़त्म हो जाती है
जहाँ से उनकी हद शुरू होती है
तुम क्यों नहीं लिखते
उनके अरमानों के बारे में
जो बर्तन मांजते मांजते
न जाने कब के घिस चुके हैं
तुम झाँक के देखो तो
इस चटके हुए कृषकाय शरीर में
कहीं छुपी है
तुम्हारी कविता की नायिका-सी
एक कोमल खूबसूरत-सी लड़की।


सूरज उदास है

ठंड से ठिठुरता सूरज
उतरना चाहता है
धरती पर
ओढ़ाना चाहता है
अपनी किरणें
बिना लिहाफ
फुटपाथ पर सोये
लोगों पर
वह स्वेटर बन
उन अधनंगे शरीर पर उतर जाना चाहता है
जो उठा रहे हैं बोझ
अपना चूल्हा गर्म करने के लिए
पर कोहरे के नुकीले हाथ
उसकी किरणों को
बाँध लेते हैं
सूरज उदास है
क्योंकि
धुंध की चादर
से हार गया वह।

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