ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अहमदाबाद इंटरनेशनल लिट्रेचर फेस्टिवल सम्पन्न
CATEGORY : रपट 01-Dec-2016 12:00 AM 1368
अहमदाबाद इंटरनेशनल लिट्रेचर फेस्टिवल सम्पन्न

विगत 12-13 नवम्बर को अहमदाबाद इंटरनेशनल लिट्रेचर फेस्टिवल का आयोजन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। उद्घाटन कार्यक्रम में सुविख्यात गुजराती साहित्यकार रघुवीर चौधरी, संगीत नाट्य अकादमी के चेयरमेन योगेश गढ़वी, बॉलीवुड से फिल्म निर्देशक मधुर भंडारकर, ब्रिटिश डेप्युटी हाई कमिश्नर जेफ़ वेन, कुमायूँ फेस्टिवल के निदेशक सुमन्त बत्रा एवं एआईएलएफ के निदेशक उमाशंकर यादव उपस्थित थे।
इस अवसर पर रघुवीर चौधरी ने कहा कि साहित्य और समाज का अटूट रिश्ता है, जिसे बनाये रखने के लिए इस तरह के साहित्य समारोह आयोजित किये जाने की बड़ी आवश्यकता है। मधुर भंडारकर ने भारत में विभिन्न भाषाओं में रचे जा रहे साहित्य के अनुवाद की जरूरत को महसूसते हुए उल्लेख किया कि फिल्मों ने भाषायी दूरियों को कम किया है और दुनियाभर के लोगों तक अपनी बात पहुंचायी है। कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए सुमंत बत्रा ने बताया कि आज दुनिया में सबसे अधिक जरूरत "सॉफ्ट स्किल्स" की है, जिसको हम साहित्य और कला के माध्यम से विकसित कर सकते हैं। उन्होंने जीवन में मूल्यों के हो रहे बड़ी तेजी से ह्रास पर चिंता जताई और कहा कि विश्व साहित्य को वर्तमान सन्दर्भों में जानना-समझना बहुत जरूरी है।
पहले दिन नौ सत्र परिसंवाद के लिए रखे गए। प्रथम परिसंवाद "कैप्टीवेटिंग स्टोरीलाइंस" में फ़िल्मी दुनिया के जाने-माने निर्माता-निर्देशक मधुर भंडारकर ने बताया कि अपने शुरुआती दौर में वह मुम्बई में वीडियो लाइब्रेरी चलाते थे। साईकिल से वीडियो घर-घर पहुँचाना, खासकर फ़िल्मी दुनिया के लोगों तक और उन फिल्मों पर विचार-विमर्श करने से उनमें फिल्म बनाने की इच्छा जागृत हुई और कालांतर में वह फिल्म निर्देशक बन गए।
"मीडिया-ड्रिवन स्टोरीज़" परिसंवाद में जर्नलिज़्म की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए वार्ताकारों ने बताया कि चूँकि जर्नलिज़्म इतिहास का प्रथम प्रारूप है इसलिए इस क्षेत्र के लोगों बहुत ही सावधानीपूर्वक कार्य करना चाहिए। "लुकिंग फॉर लिट्रेचर" परिसंवाद में कहा गया कि साहित्य को जीने वाले साहित्य को रचने में सफल तो हो सकते हैं, किन्तु सही मायनों में उन्हें सफल तभी कहा जा सकता है जब पाठक उनके विचारों को आत्मसात करें।
सत्र के दौरान साहित्य और समाज के विभिन्न पहलुओं पर व्यापक चर्चा हुई। श्रोताओं से खचाखच भरे सभागार में साहित्यकारों, विद्वतजनों द्वारा बेबाकी से जीवन में मूल्यों की महत्ता को साहित्य के माध्यम से पुनर्रेखांकित किया गया और उनके द्वारा बड़े मनोयोग से जिज्ञासुओं के प्रश्नोत्तर दिए गए।
आयोजन के दूसरे दिन का प्रथम सत्र "लिट्रेचर एंड सिनेमा" पर केंद्रित रहा। सिनेमा में साहित्य की भूमिका पर वार्ताकारों ने एक स्वर में उदघाटित किया कि साहित्य की सिनेमा में सदैव विशेष भूमिका रही है। इसलिए सिनेमा को साहित्य से अलग कर नहीं देखा जाना चाहिए।
इस दिन के अन्य सत्रों के वक्ताओं ने गहरी समझ एवं सूझ-बूझ का दिग्दर्शन कराया और श्रोताओं की शंकाओं का समाधान किया। कुल मिलाकर इस दो दिवसीय साहित्योत्सव के सभी सत्र भाषा एवं साहित्य के प्रेमियों के लिए हितकारी, उत्साहवर्धक एवं ज्ञानवर्धक रहे। साहित्योत्सव का विधिवत एवं सफलतापूर्वक आयोजन अहमदाबाद के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

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