ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अगर ऐसा होता
01-Feb-2018 10:30 AM 1354     

अगर ऐसा होता
पवन पे सवार हम
गगन को चीरते
सरहदों के परे हम
उस मिट्टी पे उतरते

झिलमिल सितारों तले
प्यारा-सा आँगन होता
इंद्रधनुष के रंगों में धुले
प्यार ही प्यार होता

सूर्य की किरणें जहाँ
छूकर हमें जगातीं
रेत की गर्मी हमें
ठंडक पहुंचाती

पर्वतों के शिखर पे
नीलिमा का बसेरा होता
घनेरे बादलों का जहाँ
नामों निशा न होता

तराई की आगॉग में
ये चांदनी यों छिटकती
प्रीतम की बाहों में
वो दुल्हन यों सिमटती

सूर्य ढल जाता मगर
साँझ से ये कह के
उजाला करूंगा सदा
राह ये जीवन के

आशा की किरणें जहाँ
सदा मुस्कुरातीं
आत्मा की ज्योति
जीवन को जगमगाती।
सहेलियाँ
ये मेरी सहेलियाँ,
कितनी प्यारी सहेलियाँ।

जब मैं हँसू
ये खिलखिलाएँ
मैं जब रोऊँ
ये आँसू बहाएँ
जब भी बैठूँ अकेली
किसी के इंतज़ार में
हमें गुदगुदी कर
ये मज़ा लें इठलाएँ।

जब भी कहूँ ये घूप की जलन
सही जाती नहीं मुझसे
वो कहें सावन की घटा
रुला जाती उन्हें
समुद्र की व्यग्र लहरें जब भी
बिखरा जातीं मोतियों की लड़ी
वो कहें ये मोती सपने तो नहीं
जो पिरोए जा नहीं सकते।

ये सहेलियाँ या के पहेलियाँ
कितनी प्यारी ये मेरी सहेलियाँ ।

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