ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिज्ऱ की रातों में आया लुत्फ़ इक मुद्दत के बाद
01-Nov-2018 10:48 AM 143     

एक

हिज्ऱ की रातों में आया लुत्फ़ इक मुद्दत के बाद,
ज़ीस्त के लम्हों में आया लुत्फ़ इक मुद्दत के बाद।

याद में तेरी बहाकर अश्क़ मैं जीता रहा,
मुझको बरसातों में आया लुत्फ़ इक मुद्दत के बाद।

बचपने में दिल मेरा माएल हुआ कब उस तरफ,
रँग की बातों आया लुत्फ़ इक मुद्दत के बाद।

दास्ताने इश्क़ लिख़ने में गवाँ दी ज़िन्दगी,
एक-एक मिसरे में आया लुत्फ़ इक मुद्दत के बाद।

कहने को अशआर मैं कहता रहा मूसा तमाम,
पर मेरी ग़ज़लों में आया लुत्फ़ इक मुद्दत के बाद।


दो

कौन जाने फिर क़दम अपने किधर हो जाएंगे,
दर तिरा छोड़ा अगर तो दरबदर हो जाएंगे।

तुम करो कितनी भी कोशिश बस मिटाने को हमें,
तीर तो सारे तिरे खुद बेअसर हो जाएंगे।

आज क्यूँ हर आदमी में बस गई ऐंठन बहुत,
जानता जब खूब है ज़ेरो ज़बर हो जाएंगे।

सच है ये किरदार के पुख्ता अगर
तो निगाहे रब में वो मिस्ले गुहर हो जाएंगे।

जो किया करते थे क़त्ल खू औ रहजनी,
क्या खबर थी आज वो ही राहबर हो जाएंगे।

यूँ ही जो मूसा अदब की खुदमते करते रहे,
तो जहाने इल्म के तय है अमर हो जाएंगे।

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