ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
प्रशासक और नेता 30 वर्षोंकी बात
01-Mar-2019 03:19 PM 916     

वर्ष 1978। एक नया नया आईएएस अधिकारी। असिस्टंट कलेक्टरकी पोÏस्टग, उत्साही युवा मन। अच्छा काम करनेको उत्सुक। कोई गलत काम नही करूँगा, चाहे जितना भी दबाव हो, वगैरह विचारोंसे उत्साहित। एक दिन एक एमएलए से झड़प हो गई। एमएलए ने कहा यह काम मेरे आदमियोंको लाभ देगा, इसे करो। अफसरने कहा यह नियमके विरुद्ध है, नही करूँगा। एमएलए ने फिर कहा नियममें किसी प्रकार बैठाओ, थोड़ा नियमके अर्थको बदलो - कुछ भी करो, पर काम होना चाहिये। अफसरने फिर कहा यह नियम विरुद्ध है और न्यायभावनाके भी विरुद्ध है, इसलिये नही करूँगा। एमएलए ने कहा -- अपनी बदलीके लिये तैयार रहना, मैं मुख्यमंत्रीतक पहुँच रखता हूँ। अफसर चुप रहा।
10 दिन भी नहीं बीते कि अफसरकी बदलीका आदेश आ गया। राज्यके मुख्यालय शहरमें, मंत्रालयमें अंडर सेक्रेटरीका पद, जो किसी युवा आईएएस अफसरके लिये एक सजासे कम नहीं। इतने ज्यूनियर अफसरको राज्य मुख्यालयके शहरमें कई असुविधाएँ झेलनी पड़ती हैं।
अफसर बेचारा क्या करता। पहुँच गया मंत्रालय। पहला सलाम ठोंका मुख्य सचिवको। एमएलए से झगड़ेकी घटनापर चर्चा हुई। मुख्य सचिवने हँसकर कहा चार दिन पहले मंत्रीमंडलमें फेरबदल हुए हैं और तुम्हारा वही एमएलए मंत्री बना है। और हाँ, तुम्हें उसीके विभागमें पोÏस्टग मिली है। अफसरने कहा सर, कमसे कम मेरा विभाग तो बदल दीजिये। मुख्य सचिवने कहा अरे, उसने खुद तुम्हें वहाँ पोस्ट करनेको कहा है। तुम्हारा विभाग भी बदलना हो तो भी पहले एक बार तुम्हारा मंत्रीसे मिलना आवश्यक है। इसलिये जाओ, उनसे मिलकर फिर मेरे पास आना। बेचारा अफसर। मंत्री महोदय के पास पहुँचा। मंत्रीजीने तपाकसे स्वागत किया, आइये आइये। कब ज्वाईन किया? अफसरने कहा - नहीं अभी नही किया और करना भी नहीं चाहता क्योंकि यहाँ भी आपसे झगड़ा ही होता रहेगा।
मंत्रीने कहा, अरे नहीं नहीं। कोई झगड़ा नही होगा। आप आरामसे अपना काम करिये। कोई चिन्ता नहीं। अफसरने कहा सर, मैं फाइलपर कोई निर्णय लिखूँगा जो नियमानुसार होगा, फिर आप कहेंगे निर्णय बदलो, नियमके बाहर हो तो भी बदलो, वरना तुम्हारी बदली करवा दूँगा।
मंत्री अर्थात् वह पुराना एमएलए हँसा। बोला सर, मैंने आपकी बदली करवाई, लेकिन आपके अच्छे कामकी जानकारी भी रखता हूँ। आप यहाँ भी वैसा ही करिये। नेता तो कई बार नियमविरुद्ध काम करवाता है, लेकिन उसे अच्छे काम करनेवाले अफसर भी चाहिये ताकि लोगोंको बता सके कि देखो मैंने ये अच्छे काम करवाये। इसलिये आप अपना काम ईमानदारीसे नियमपूर्वक करिये। मेरे लिये पैसे कमानेका काम करनेवाले दूसरे लोग हैं, आप तो मेरे लिये यश कमाइये।
इसीके आसपासकी दूसरी घटना। एक अफसर। थोड़ा सीनीयर। पोÏस्टगके नये जिलेमें जिला परिषदका प्रमुख अधिकारी बना। चुनावसे जीतकर आनेवाला अध्यक्ष पुराना नेता था। सारे ठेके इत्यादिमें उसीकी चलती थी। एक नई सड़कका ठेका निकला हुआ था। सबसे कम रकमवाला ठेका मंजूर किया जाता है, लेकिन अफसरको बताया गया कि यह ठेकेदार अध्यक्षके चहेते ठेकेदारोंमेंसे नहीं है। अफसरने अपने पीएसे पूछा जो वयसमें प्रौढ, अनुभवी, और निहायत सज्जन थे। पीएने कहा, आप नियमानुसार सबसे कम रकमवाला ठेकाही मान्य करें, अध्यक्ष आपके निर्णयमें बाधा नही डालेंगे। इनका तरीका अलग है। इनका चहेता ठेकेदार मान्यताप्राप्त ठेकेदारको थोड़ीसी रकम देकर ठेका खरीदेगा -- थोड़ा पैसा अध्यक्षको दिया जायगा और काम वही चहेता आदमी करेगा। हर कोई खुश। अफसरने पूछा तो फिर अध्यक्षको कम ही पैसे मिलेंगे। पीएने कहा - हाँ इनका प्रतिशत काफी कम होता है। अफसरको फिर भी शंका थी। और काम अच्छा न होनेकी स्थितीमें दण्डवसूली तो मान्यताप्राप्त ठेकेदारसे ही होगी -- उसकी क्या? पीएने कहा -- नहीं, इनकावाला ठेकेदार काममें गड़बड़ नहीं करता है। लेकिन अच्छा काम करनेके बाद भी सरकारी काम मिलनेकी गॅरंटी नहीं होती -- तो ये हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। सर, आप देखना हमारे देशमें ईमानदारी धीरेधीरे लक्झरी बनती जा रही है -- आगे तो कोई जीवटवालाही इसे अफोर्ड कर सकेगा।
अफसरने सोचा -- चलो, इससे इतना तो दिखता है कि राजनेताओंमें अभी भी कुछ अच्छे मूल्य विद्यमान हैं। यहाँ काम करना सरल रहेगा।
30 वर्ष बाद। दूसरा राज्य, दूसरा अफसर। अति वरिष्ठ तथा अनुभवसे समृद्ध। एक विभागका पिं्रसिपल सेक्रेटरी नियुक्त हुआ।
एक दिन हायकोर्टसे पत्र आया। अमुक अमुक केसमें आपके विभागने अफेडेविट फाइल नहीं किया है। अब अगले 8 दिनोंमें करिये वरना आपसे वैयक्तिक रूपसे रू. 5000 दण्ड वसूल किया जायगा।
अफसरने केस पेपर मँगवाये। एक पीआईएल थी, जिसमें विभागके मंत्रीके भ्रष्टाचारको उजागर करते हुए उसपर वैयक्तिक रूपसे कारवाईकी माँग की गई थी। अफसरने उस कामकी फाइल मँगवाई तो पता चला कि फाइल तो एक सालसे मंत्रीके पास है, लेकिन हाँ, विभागके पास उसकी झेरॉक्स है। मंत्री तब लखनऊमें पार्टीके लिये इलेक्शन प्रचारमें 8-10 दिनके निकल पड़े थे। उनके पीएसे फाइल माँगी तो लिखित उत्तर मिला - "आपके फाइल इश्यू रजिस्टरसे यह दिखाई पड़ता है कि फाइल मंत्रीजीके पास हो ऐसा कोई ठोस प्रमाण आपके फाइल इश्यू रजिस्टर में नहीं है।" अफसरने फाइल इश्यू रजिस्टर देखा तो वाकई उसमें मंत्रीके पास फाइल भिजवानेकी कोई एण्ट्री नहीं थी लेकिन अंडर सेक्रट शपथसे कह रहा था कि फाइल मंत्रीके पास है और जब दी थी तब मंत्रीके पीएके रोबमें आकर उसने रजिस्टरमें एण्ट्री नहीं करवाई थी। बादमें उसने स्वयं बताया कि अपने बचावके लिये उसने फाइल इश्यू रजिस्टरके अन्तिम पन्नेपर इसे दर्ज करते हुए पीएके हस्ताक्षर ले लिये थे जिसे पीए अब भूल चुका था।
तो फिर अफसरने पीएको बिना छेड़े इस घटनाको भी दर्ज कराते हुए झेरॉक्सके आधारपर एक प्रतिज्ञापत्र हाईकोर्टके लिये बनवाया। उसमें घटनाका विवरण था कि मंत्रीकी शिफारिशपर दो अलग-अलग फील्ड अफसरोंने असहमति दर्शाई थी और विभागीय सेक्रेंटरीने फाइल देखी ही नहीं थी। डिप्टी सेक्रेटरीसे सीधे मंत्रीके पास गई और मंत्रीने फील्ड अफसरकी असहमतिको धता बताकर आखिरकर जो निर्णय लिया था, उसके कारण ठेकेदारका गैर तरीकोंसे ग्यारह करोड़का लाभ हुआ था। वह ठेकेदार भी इस मंत्रीका साथी तथा इसी विभागका इस मंत्रीसे पहले वाला मंत्री था और दोनोंकी मिलीभगत स्पष्ट दीखती थी, इत्यादि।
अब यद्यपि इस पीआईएल में मंत्रीके विरूद्ध वैयक्तिक आरोप थे और हायकोर्टसे आदेश माँगे थे कि मंत्रीके विरुद्ध भ्रष्टाचार केसका एफआईआर दर्ज हो, फिर भी विभागीय सेक्रेटरी यदि कोई प्रतिज्ञापत्र दाखिल कर रहा हो तो नियमकी माँग है कि वह टिप्पणी और प्रतिज्ञापत्र मंत्रीको दिखाकर उसकी सहमति ली जाये। मंत्री उपलब्ध न होनेकी स्थितीमें मुख्यमंत्रीसे सहमति ली जाये।
संयोगसे इस मंत्रीकी मुख्यमंत्रीसे बारबार ठनती थी और मंत्री धमकियाँ देता था कि मैं तो पार्टी के मुखिया का बहुत करीबी हूँ, तो मुख्यमंत्रीको ये करूँगा, वो करूँगा, इत्यादि। मुख्यमंत्री भी इस ताकमें रहते थे कि कैसे इस मंत्रीका घमंड तोड़ा जाय।
तो अफसरने फाइल मुख्य सचिवको दिखाई और दोनों फाईल लेकर मुख्यमंत्रीके पास पहुँचे। मुख्यमंत्रीकी बांछे खिल गईं यह स्पष्ट दीखता था। फिर भी अफसरसे कहा, एकबार लॉ डिपार्टमेंटको दिखाकर उनकी सहमति लेकर मुझे कल सुबह फाईल दीजिये और कलही दोपहर सबसे पहले हायकोर्टमें प्रतिज्ञापत्र दाखिल करा दीजिये वरना हायकोर्टमें दण्ड भी भरना पड़ेगा और स्ट्रिक्चर अर्थात कड़ी फटकार भी आ जायेगी।
अफसरको अपनी मेहनत रंग लाती दिखाई पड़ी। फटाफट लॉ सेक्रेटरीसे भेंट की, सारी बात समझाई, प्रतिज्ञापत्र भी दिखाया जो स्पष्टतः मंत्रीके विरुद्ध तथ्योंको प्रकट कर रहा था। लॉ सचिवने भी हायकोर्टकी समयसीमा और पीआईएल में दर्ज आरोपकी गंभीरता भाँपते हुए सहमति दे दी। अफसरने उसी शाम फाइल मुख्यमंत्रीके पास भेज दी। उनके सचिवसे भी बोल दिया अर्जण्ट है, हायकोर्टका मामला है इत्यादि।
दूसरे दिन फाइल जल्दी ही वापस आ गई। मुख्यमंत्रीने लिखा था "फाइलको नियमानुसार विभागके मंत्रीको दिखाकर हायकोर्टमें प्रतिज्ञापत्र भेजा जाये।"
मंत्री तो लखनऊमें इलेक्शन दौरे पर कहीं अंदरूनी इलाकेमें था जहाँ मोबाइल नेटवर्क भी नहीं था। इस बातका पत्र मंत्रीके पीएसे लेकर अफसरने अपना प्रतिज्ञापत्र हायकोर्टमें दाखिल कर दिया और फाइलको पश्चात्-अवलोकनके लिये मंत्रीके कार्यालय भिजवा दिया।
तीन दिन बाद मंत्री लौटे। इस बीच उस महिनेकी एकतीस तारीख आ चुकी थी जिस दिन मुख्य सचिवको निवृत्त होना था और दूसरे नव नियुक्त मुख्य सचिवको पदभार ग्रहण करना था।
मंत्री आये तो दो बातें स्पष्ट रूपसे घटी। वे मुख्यमंत्रीके जवर्दस्त प्रशंसक बन चुके थे और दोनो गलबइयाँ डाले फोटो खिंचवा रहे थे। दूसरी ओर हायकोर्टमें जो सुनवाई हुई तो हायकोर्टके जजने स्वयं ही मंत्रीपर नाराजी घोषित की थी। अगली सुनवाईमें मंत्रीके विरुद्ध आदेश आयेंगे ऐसा अनुमान था। लेकिन वह भी हुआ जो नहीं होना चाहिये था। मंत्री महोदय नये मुख्य सचिवसे उनके कमरेमें मिले और धमकाया कि तबतक नहीं उठूँगा जबतक इस अफसरको किसी नाकारा पोस्टपर भेजनेके आदेशपर तुम्हारे हस्ताक्षर नहीं होते। मुख्य सचिव अब बदल चुके थे। तत्काल आदेश निकालकर मंत्रीके साथ अपनी गुडविल बना ली, यह सोचते हुए कि अफसरका क्या सोचना, उसे बादमें समझा दूँगा। मंत्री और मुख्य सचिव खुशी खुशी घर गये।
ये ईमानदार अफसर - इस विश्वासपर अडिग कि हम अपने जानते कुछ गलत नहीं होने देंगे। काम करते रहे बेचारे इसी विश्वासपर। लेकिन स्मार्टनेसमें उनसे सौ कदम आगे रहनेवाले नेता उनकी अच्छाई और मेहनतको भी अपना मतलब साधनेका साधन बना ही लेता है।
और दो विराधी घटनाएँ उत्तरप्रदेशसे सभीने देखी-पढ़ी हैं। अवैध बालू खननमें दबंग राजनेताओंका विरोध करते हुए दुर्गाशक्ति नागपालने तत्काल ट्रान्सफरसे लेकर छुट्टीपर भेजे जाने जैसी कठिनाइयाँ भी झेलीं। दूसरी ओर ऐसेही राजनेताओंसे मेलजोल रखकर अपनी रोटी सेंकते हुए बी. शशिकला जैसी अफसरने करोड़ोंकी कमाई की। तो लोगोंके मनमें यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आईएएस अफसर ईमानदार होंगे या बेईमान यह कैसे तय होता है। उनकी परीक्षा लेनेवाली यूपीएससीके पास ऐसे कौनसे निकष होने चाहिये।
कुछ ऐसीही कहानी मेरी भी है जो 1974 के जुलाईमें आरंभ हुई। उसमें आशा-निराशा, यश-अपयश आदि तो थे ही, साथसाथ कईबार राजनेताओंका दबाव, अफसरशाहीमेंभी भाई-भतीजावाद, अकारण ट्रान्सफर, कभी अचानक कर्तव्यपूर्तिका आनन्द, तो कभी प्रशासनतंत्रकी जड़ता और मूढ़ता इत्यादि सारे रंग देखनेको मिले। जड़ता तो बहुत है, लेकिन साथमें कुछ आशाके चित्र भी हैं। किसी समाजविज्ञानके विद्वानने कहा है कि किसीभी समाजमें अडिग विश्वासपर सही काम करनेवाले 8 से 10 प्रतिशत ही होते हैं। लेकिन उन्हींके बलपर समाज आगे जाता है। समाजको बस ये ध्यान रखना पड़ेगा कि अच्छाईको बढ़ावा मिलता रहे ताकि यह प्रतिशत 8 से कम न हो, वरना समाज बिखर जायेगा। तो आजभी ऐसे अडिग अफसरोंकी संख्या उस 8 प्रतिशतकी लक्ष्मणरेखासे ऊपर देखती हूँ और आशान्वित रहती हूँ कि यह प्रतिशत बढ़ेगा और हमारा देश व समाज उन्नतिकी राहमें तेजीसे आगे बढ़ेगा।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 15.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^