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अच्छे दिनों की आस में दीवारो-दर हैं चुप
01-Feb-2016 12:00 AM 4529     

ऐसे अशआर पढ़कर अचानक मुंह से कोई बोल नहीं फूटते। ऐसे कुंदन से अशआर यूँही कागज़ पर नहीं उतरते, इसके लिए शायर को उम्र भर सोने की तरह तपना पड़ता है। इस तपे हुए सोने जैसे शायर का नाम है- निश्तर खानकाही। उनकी किताब "मेरे लहू की आग' से हिंदी के पाठक बहुत अधिक परिचित न होंगे, क्यूँ की निश्तर साहब उन शायरों की श्रेणी में आते हैं जो अपना ढोल पीटे बिना शायरी किया करते थे।
सारे जग की प्यास बुझाना, इतना आसाँ काम है क्या?
पानी को भी भाप में ढलकर बादल बनना पड़ता है
जलते दिए की लौ ही जाने उसकी आँखें जानें क्या?
कैसी कैसी झेल के बिपता, काजल बनना पड़ता है
घायल मन की पीड़ समझकर उसे अपने अशआरों में ढालने वाले इस शायर ने अपने जन्म के बारे में एक जगह लिखा है : "कोई रिकार्ड नहीं है, लेकिन मौखिक रूप में जो कुछ मुझे बताया गया है, उसके अनुसार 1930 के निकलते जाड़ों में किसी दिन मेरा जन्म हुआ था, जहानाबाद नाम के गाँव में, जहाँ मेरे वालिद सैयद मौहम्मद हुसैन की छोटी-सी जमींदारी थी।' जहानाबाद उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद का एक गाँव है। बिजनौर में जीवन के अधिकांश वर्ष गुज़ारने के बाद 7 मार्च 2006 को खानकाही साहब ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
ज़िन्दगी का रूप यकसां, तजरुबे सबके अलग
इस समर का भूल कर भी जायका मत पूछिए
क्या खबर है कौन किस अंदाज़, किस आलम में हो
दोस्तों से उनके मस्कन का पता मत पूछिए
खानकाही साहब के वालिद बहुत सख्त मिजाज़ इंसान थे। इस कारण उनका लगाव माँ से अधिक था। उनकी माँ फ़ारसी ज़बान में शायरी करने वाली एक विदुषी महिला थीं। उन्होंने बचपन में ही आपको फारसी के महान शायरों- हाफ़िज शीराजी, सादी और नज़ीरा का काव्य कंठस्थ करा दिया था। शायद बचपन में अपनी अम्मी से मिले ये संस्कार ही थे कि वे एक सफल शायर बन सके। निश्तर साहब बहुत संवेदनशील व्यक्ति थे।
मेरे लहू की आग ही झुलसा गयी मुझे
देखा जो आईना तो हंसी आ गयी मुझे
मैं जैसे एक सबक था कभी का पढ़ा हुआ
उठ्ठी जो वो निगाह तो दोहरा गयी मुझे
निश्तर साहब ने लगभग दस वर्ष की उम्र से ही लेखन आरम्भ कर दिया था। इतनी छोटी उम्र में लेखन शुरू करने के हिसाब से हमारे पास उनके द्वारा रचे साहित्य का बहुत बड़ा ज़खीरा होना चाहिए था, लेकिन नहीं है। उन्होंने अपनी रचनाओं की कोई प्रति अपने पास नहीं रखी।

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