ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अभी तो अपना मुझे घर तलाश करना है
01-Mar-2016 12:00 AM 4939     

शायर जनाब कुँवर "कुसुमेश' की लाजवाब ग़ज़लों की किताब "कुछ न हासिल हुआ' पढ़कर ऐसा महसूस होता है, जैसे कुछ नायाब हासिल हुआ है।
जो बड़े प्यार से मिलता है लपककर तुझसे
आदमी दिल का भी अच्छा हो वो ऐसा न समझ
आज के बच्चों पे है पश्चिमी जादू का असर
अब तो दस साल के बच्चे को भी बच्चा न समझ
ये कहावत है पुरानी सी मगर सच्ची है
तू चमकती हुई हर चीज़ को सोना न समझ
चमकती हुई हर चीज़ भले ही सोना न हो लेकिन चमकती हुई शायरी लिए हुए उनकी ये किताब किसी खजाने से कम नहीं। बेहतरीन कागज़ पर निहायत खूबसूरत ढंग से प्रकाशित ये किताब शायरी की अधिकांश किताबों से कुछ अलग ही है। भारतीय जीवन बीमा निगम से सेवानिवृत्त हुए कुँवर जी का जन्म तीन फरवरी सन उन्नीस सौ पचास में हुआ। गणित जैसे शुष्क विषय में पोस्ट ग्रेजुएशन करने में बाद उनका पिछले तीस वर्षों से शायरी जैसी सरस विधा से जुड़ना किसी चमत्कार से कम नहीं।
आज के अखबार की सुर्खी हमेशा की तरह
फिर वही दंगा, वही गोली हमेशा की तरह
धर्म के मसले पे संसद में छिड़ी लम्बी बहस
मज़हबों की आग फिर भड़की हमेशा की तरह
आप थाने में रपट किसकी करेंगे दोस्तों
चोर जब पहने मिले वर्दी हमेशा की तरह
कुँवर जी अपनी लेखनी सामाजिक मूल्यों के गिरते स्तर पर खूब चलाई है। दोहों और ग़ज़लों के माध्यम से उन्होंने समाज के अनेक अच्छे-बुरे पहलुओं को करीब से देख अपने पाठकों तक पहुँचाया है। पारंपरिक अंदाज़ से हटकर इनकी अधिकतर ग़ज़लें रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से जुडी हैं।
सांप सड़कों पे नज़र आयेंगे
और बांबी में सपेरा होगा
वक्त दोहरा रहा है अपने को
फिर सलीबों पे मसीहा होगा
आदमियत से जिसको मतलब है
देख लेना वो अकेला होगा
कुँवर जी की शायरी की सबसे बड़ी खासियत है उसकी भाषा। हिंदी-उर्दू ज़बान का अद्भुत संगम उनकी शायरी में झलकता है। सरल शब्दों के प्रयोग से वो अपने अशआर में आम इंसान की परेशानियों और खुशियों को बहुत खूबी से दर्शाते हैं। उनकी शायरी आमजन की शायरी है। पढ़ते वक्त लगता है जैसे वो हमारी ही बात कर रहे हों, यही कारण है कि पढ़ते वक्त उनके अशआर अनायास ही ज़बान पर चढ़ जाते हैं और हम उन्हें गुनगुनाने लगते हैं। यही एक शायर की कामयाबी भी है।
कुंवर जी की रचनाएँ आकाशवाणी लखनऊ से प्रसारित होती रहती हैं।
बुरा न देखते, सुनते, न बोलते जो कभी
कहाँ हैं तीन वो बन्दर तलाश करना है
कयाम दिल में किसी के करूँगा मैं लेकिन
अभी तो अपना मुझे घर तलाश करना है
शायरी की इस बेजोड़ किताब को उत्तरायण प्रकाशन, लखनऊ ने प्रकाशित किया है। किताब प्राप्ति के लिए आप प्रकाशक को उत्तरायण प्रकाशन, एम्-168, आशियाना, लखनऊ-22602 पर लिख सकते हैं।

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