ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अब फिर एक नवजागरण हा
01-Feb-2016 12:00 AM 1003     

उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ से भारत के नवशिक्षित बौद्धिकों में एक नई चेतना का उदय हुआ जिसके अग्रदूत राजा राममोहन राय माने जाते हैं। इस चेतना को यूरोप के रिनेसाँस के वजन पर अपने देश में ही पुनर्जागरण और कहीं नवजागरण कहा जाता है। चेतना की यह लहर देर-सबेर कमोबेश भारत के सभी प्रदेशों में फैली। किन्तु अधिक चर्चा बंगाल नवजागण और महाराष्ट्र प्रबोधन की ही होती है। अन्य प्रदेश की तरह हिंदी प्रदेश में भी नवजागण की यह लहर उठी, किन्तु जरा देर से--उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तराद्र्ध में, 1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्राता संग्राम की पराजय के लगभग एक दशक बाद और उसका प्रसार भी बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दो दशकों तक बना रहा। प्रो. नामवर सिंह की इसी उक्ति से यदि बात शुरू की जाए तो आज के भारत और खास कर हिंदी क्षेत्र की स्थितियों पर बहुत बेचैन-सा नजरिया बनता है। निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति कौ मूल, हिंदी नए चाल में चली और अंगरेज राज सुख साज सजै सब भारी/पै धन बिदेस चलि जात अहौ यह ख्वारी जैसी घोषणाएँ और व्यथाएँ व्यक्त करते हुए जिस भारतेन्दु ने हिंदी नवजागण की अगुआई की थी, उन्हें गुजरे लगभग एक सौ सोलह वर्ष गुजर गए। भारतेन्दु काल से शुरू हुआ जो नवजागरण बीसवीं शताब्दी के दो दशकों तक फैला और आगे के दशकों में जिस तरह से हिंदी भाषा-साहित्य और हिंदी क्षेत्र में उन्नति-उपलब्धि का तांता लगा, वह आज की स्थिति के मद्देनजर भारतीय जनता को पुनर्विचार के लिए बाधित करता है। आज हम जिस बाजार में जीवन यापन कर रहे हैं, इसमें फिर से एक नवजागरण की घोषणा की आवश्यकता हो गई है। भारतेन्दु का जन्म अंग्रेजों के पिट्ठू परिवार में हुआ था, दुर्गंधयुक्त कीचड़ में कमल की तरह। घर-परिवार में सारी सुविधाएँ थीं और उन सुविधाओं और जनपद की दुर्दशाओं को साथ-साथ रखने वाले भारतेन्दु किस दुविधा में थे, कितने तनाव में थे कि एक ही पद के आधे-आधे हिस्से उसे स्वर दे रहे हैं--अंगरेज राज के कारण, एक तरफ उनके घर परिवार में सारी सुख-सुविधाएँ मौजूद हैं और दूसरी तरफ उनके लिए दुख-दुविधा और शर्म की बात है कि धन बिदेस चलि जात। आज हमारे देश के नागरिक और भाग्य-विधाता को न तो निज भाषा से कोई मतलब है और न ही अपनी निरीहता पर कोई शर्म है। भारत के नागरिकों की स्थिति अभी छाती पीटने की हो गई है, रोने और कलपने की हो गई है, कुछ करने की नहीं रह गई। जिस भारतेन्दु ने निज भाषा की उन्नति की बात की थी, वह आज भी उसी तरह प्रभावी है। भाषा, आज केवल अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं रह गई है, यह मनुष्य के सोच-विचार का साधन भी है। बिना भाषा को सुदृढ़ किए कोई भी व्यक्ति सोच ही नहीं सकता। यदि कोई मनुष्य अपने जीवन की अगली साँस में कुछ करने को सोचे, तो किसी खास भाषा में ही सोचेगा। और यदि यह सोच अपनी भाषा में हुआ है, तो स्पष्टत: उसके साथ उस भाषा की पूरी सांस्कृतिक गरिमा उसके साथ होगी। यदि कोई व्यक्ति (भारतीय) सोचता है कि मुझे भोजन करना है, तो उसके सामने उपस्थित हुआ भोजन का टेक्स्ट वही नहीं होगा, जो एक अमेरीकी के सामने होगा। निश्चित रूप से कोई मैथिल या बंगाली मछली-भात के बारे में, कोई मलयाली इडली-उपमा और अमेरिकी टोस्ट-बटर आदि के बारे में सोचेगा। और यह सोच यदि अनुवाद के जरिए होने लगे तो विकराल विपर्यय की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तराद्र्ध में जब चन्दा झा ने विद्यापति की श्रेष्ठ कृति पुरुष परीक्षा का मैथिली में अनुवाद किया था, तो उसकी भूमिका हिंदी में लिखी थी। यह काल उसी नवजागरण का काल था, जहाँ निज भाषा उन्नति अहै’की आवश्यकता थी और उस काल के तमाम बुद्धिजीवियों के समक्ष देश दशा उपस्थित थी और अपनी भाषा, अपनी संस्कृति के प्रति समकालीन शिक्षित जनपद को अनुराग था। देश की एकता अखण्डता और नवजागरण से निज भाषा को स्थायी स्वरूप देना बुद्धिजीवियों का कर्तव्य था। उन्हें अपनी संस्कृति को मजबूती देनी थी। इस कर्म में उन दिनों सब सबको समर्थन देते थे। तीन तिरहुतिया तेरह पाक की स्थिति नहीं थी। आज स्थिति एकदम उलट है। भाषा प्रेम, संस्कृति प्रेम, देश प्रेम... सिरे से गायब होता जा रहा है। गरदन भर पानी में भी जीभ से चाटकर प्यास बुझाने वाले स्वान की स्थिति हमारे यहाँ पूरी तरह उपस्थित है। अत्यन्त सुखकर स्थिति है कि आज हिंदी भाषा (यहाँ तक कि अपनी मातृभाषा भी) पढ़ने-लिखनेवालों के सामने नौकरी-चाकरी और अन्य अर्थप्राप्ति के साधन हिंदी के जरिए मौजूद हैं। फिर भी धरातल की बात यह है कि हिंदी की कमाई खाने वाले व्यक्ति तक को हिंदी के कारण हीनताबोध है और वह लगातार अंग्रेजी की तरफ अग्रसर होना चाहते हैं। बहुभाषाविद् होना बुरी बात नहीं है, निज भाषा विहीन होना बुरी बात है। टूअर बच्चों को पड़ोस और दूर-दराज के रिश्तेदार अथवा यतीमखाना की औरतें बहुत प्यार दे सकती हैं, पर एक टूअर बालक के रूप में प्राप्त प्यार उस बालक के लिए कितना दुखदायी हो सकता है, वह कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है। जिस बच्चे की माँ जीवित होती है, उसे प्यार करने के लिए पड़ोस की औरतें लालायित रहती हैं पर बिन माँ के बच्चे को प्यार करने के लिए मजबूर। लालसा और मजबूरी में जो फर्क है, उसे कौन नहीं जानता। पर, अपने भारतवासी के सामने आज एक ही लक्ष्य है कि

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