ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
आश्विन का प्रभात और शिउली फूल
CATEGORY : शब्द 01-Oct-2018 08:46 PM 96
आश्विन का प्रभात और शिउली फूल

आश्विन के शारदीय प्रभात में बज उठे आलोक मंजीरे
लुप्त हो चलीं पावस की मेघमालाएँ
धरती के बाह्याकाश में
प्रकृति के अंतराकाश में जाग उठी
ज्योतिर्मयी जगन्माता के आगमन की गाथाएँ

बचपन से ही आकाशवाणी केंद्रों से हर वर्ष पितृपक्ष (आश्विन कृष्णपक्ष) के समापन और देवीपक्ष (आश्विन शुक्लपक्ष) के आगमन की पूर्व तिथि महालया अमावस्या के ब्रह्ममुहूत्र्त में स्वर्गीय वीरेंद्र कृष्ण भद्र के भावमय स्वर में प्रसारित होने वाले मूल बाँग्ला कार्यक्रम "महिषासुरमर्दिनी" को सुनते आया हूँ। अतएव आश्विन माह (सितम्बर-अक्टूबर) के करीब आते ही अपने इलाके के अन्य प्रवासी लोगों की तरह मन अतीत और गाँव-घर की मधुर स्मृतियों में खो जाता है। समय बदल गया। अब इस वैश्वीकरण के युग में लोग रोजी-रोजगार की तलाश में अपनों से दूर हो गए हैं। सोशल मीडिया और मोबाइल जैसे संचार साधनों से जो दुनिया अन्य समय सिमटती लगती है, वह आश्विन के दस्तक देते ही घर से दूरी का अहसास कराने लगती है। विकास (विकस्, प्रस्फुटन) तोड़ता है, संस्कृति जोड़ती है। यह सांस्कृतिक परम्पराओं का मानस पर स्पष्ट असर है।
एकबार फिर आश्विन का पवित्र माह आ पहुँचा। शिउली के फूलों की महक और खेतों में लहराते कास (विकस्, विस्तृत, चमकदार और खिले हुए) संकेत कर रहे हैं कि भारत में त्यौहारों का मौसम आ गया। आश्विन भारतवर्ष, खासकर बंगाल और उससे जुड़े राज्यों में दुर्गा पूजा (बाँग्ला में, पूजो) और शेष उत्तर भारत में दशहरे का। गुजरात और उससे सटे सीमावर्ती क्षेत्रों में में यह गरबा नृत्य का समय है। वहीं दक्षिण भारत में सरस्वती पूजन का; हालाँकि मैसूर (कर्नाटक) का दशहरा भी खास महत्त्व रखता है। गरबा शब्द मूलतः मंदिरों के गर्भगृहों में दीप प्रज्ज्वलति करते समय किए जाने वाले नृत्य का द्योतक है और इसे "दीपगर्भ" र्स व्युत्पन्न समझा जाता है। कहते हैं कि इसकी शुरुआत देवी के निकट सछिद्र घटदीप ले जाने के क्रम में लड़कियों और स्त्रियों के द्वारा किए जाने वाले नृत्य से हुई - "पाँखिड़ा ओ पाँखिड़ा! तु उड़ ने जाना पावागढ़ रे, महाकाली से मिलके कहना गरबा खेलेंगे ...। गरबा वस्तुतः नवरात्र के समय देवी से सौभाग्य की कामना में किया जाने वाला लोकनृत्य है।
आश्विन देवताओं के वैद्यद्वय अश्विनीकुमारों का माह है। अश्विनीकुमार द्वय को सूर्य और उनकी पत्नी संज्ञा के पुत्रों के रूप में जाना जाता है। कथा है कि सूर्य से छुपने के लिए संज्ञा ने अश्विनी (घोड़ी) का रूप धर लिया, तो सूर्य भी अश्व बनकर उसके पीछे हो लिए। कथा चाहे जो भी हो अश्व (अश, व्याप्त होना और क्वन प्रत्यय) वास्तव में सूर्य की रश्मियों (अश, व्याप्त होना और मि प्रत्यय; रश से मूल प्रतिस्थापित) को कहा गया है और सूर्य को सप्ताश्व कहना यह बताता है कि प्राचीन भारत में भी सूर्य की किरणों में सात रंगों के होने का ज्ञान रहा होगा। भारतीय ज्योतिष के अनुसार आश्विन पूर्णिमा के समय चन्द्रमा अश्विनी नक्षत्र में रहता है, इसलिए यह माह आश्विन कहा जाता है। अश्विनी को सत्ताईस नक्षत्रों (अभिजित् सहित अट्ठाईस) में प्रथम माना गया है। भारतीय पर्व-त्यौहार ग्रह-नक्षत्रों की गणना पर आधारित होते हैं। आश्विन की शारदीय दुर्गा पूजा से ठीक छह मास पहले जब सूर्य मेष राशि के अंतर्गत अश्विनी नक्षत्र में होता है, तब भी सौर-चांद्र कैलेंडर आधारित चैत्र माह में वासन्ती दुर्गा पूजा होती है और अब जब सूर्य कन्या राशि के अंतर्गत चित्रा नक्षत्र में आता है, तब सौर-चांद्र कैलेंडर आधारित आश्विन माह में शारदीय दुर्गा पूजा होती है। यह वसंत से शरद तक की समय यात्रा का भी द्योतक है। वसंत में सूर्य उत्तरायण और उत्तरी गोलाद्र्ध में स्थित रहता है और शरद में दक्षिणायन और दक्षिणी गोलाद्र्ध में।
वर्षा ऋतु का समापन होना और सूर्य का कन्या राशि में संक्रमण होना एक विशेष अर्थ रखता है। भगवती दुर्गा को ही कन्या (ज्त्द्धढ़दृ, द्यण्ड्ढ ध्त्द्धढ़त्द) कहा गया। कन्या राशि के अंतर्गत चित्रा नक्षत्र आता है और दुर्गा का एक नाम चित्रा (चित्त को आकर्षित करने वाली माया) भी है। वह बड़े-बड़े ज्ञानियों के चित्त को बलात् आकर्षित कर उन्हें माया-मोह में डाल देती हैं, ऐसा दुर्गा सप्तशती में कहा गया है। वैसे व्युत्पत्ति शास्त्र के अनुसार "कन्या" और "कनक" शब्दों का एक ही मूल है - कन, चमकना। वर्षा ऋतु के समापन के बाद एकबार फिर अबतक मेघाच्छादित सूर्य पुनः कनक (सोना) जैसा चमकने लगता है। आश्विन का कृष्णपक्ष पितृ श्रद्धा को समर्पित होता है और शुक्लपक्ष मातृ पूजा को अर्पित।
असल में त्यौहार क्लेशों के त्याग और आनन्द के आहरण का समय है। उत्सव, उद्भव, उद्धव, उद्धर्ष, क्षण और अभ्युदय भी त्यौहार के पर्यायवाची शब्द हैं। मनुष्य मूलतः सामाजिक प्राणी है। वह अकेले में आनंद ज़रूर पा सकता है, किन्तु उत्सव मनाने के लिए समाज का साथ ज़रूरी है। उत्सव (उत्, ज़्यादा; षू, जन्म देना और अच् प्रत्यय) के मूल में सामूहिक आनंद के जन्म का भाव निहित है। उद्भव भावात्मक एकता का प्रस्फुटन है। उद्धव (उद्, ज्यादा; धु, प्रकम्पित होना और घञ प्रत्यय) हर्षातिरेक में उत्पन्न होने वाले रोमांच को बताता है। पर्व-त्यौहार वास्तव में जीवन की हर भौतिक खुशियों की क्षणभंगुरता से उपजे विषाद से क्षणभर के लिए दूर ले जाते हुए मनुष्य को अपनी दंतकथाओं से सीख देते हुए अभ्युदय और निःश्रेयस के रास्ते पर ले जाते हैं - (यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धि: स धर्म:; वैशेषिक सूत्र 1।1।2)। अभ्युदय का असली अर्थ है - तारों -नक्षत्रों का उदय, पर यह मनुष्य जीवन में पुरुषार्थ चतुष्टय से अर्जित समृद्धि का द्योतक है। इस कारण अभ्युदय का अर्थ उत्सव भी है। विदित है कि मात्र भौतिक समृद्धि से ही संसार के त्रिविध दुःखों से निजात पाना सम्भव नहीं है, अतएव अभ्युदय के बाद नःिश्रेयस (निः, पूर्ण और श्रेयस, शिव तत्त्व, आनंद तत्त्व) काम्य है और धर्म इसी सिद्धि को सुनिश्चित करने का मार्ग है। धर्म के इसी मार्ग को श्रीमद्भवद्गीता में प्रवृत्ति और निवृत्ति का मार्ग कहा गया। यह जीवन का नैसर्गिक रास्ता है - पहले उचित साधनों के सहारे भौतकि उन्नति में प्रवृत्त होना, फिर उनसे निवृत्त होकर मुक्तिपथ पर बढ़ जाना।
जबतक जीवन है, तबतक सुख-दुःख की पुनरावृत्ति होते रहनी है। सुख-दुःख चक्रवत है, ऋतु परिवत्र्तन चक्रवत है; अतएव पर्व-त्यौहार भी चक्रवत हैं। भारतीय मनीषा ने इसी कारण समय को चक्रवत (च क्रमेण, क्रम के अनुसार कहा, जबकि वैज्ञानिक धारणा है कि जो समय बीत गया, वह फिर कभी नहीं लौटता। भौतिक धरातल पर यह बिल्कुल सही है, पर भाव धरातल पर कहीं नहीं ठहरता।
हम जीवन को एक खण्डित इकाई के रूप में ग्रहण नहीं करते हैं, बल्कि हम अपने अतीत और अपने पुरखों से जुड़ाव महसूस करते हैं। आज हमारे पास जो ज्ञान-विज्ञान और सुख-सुविधा है, वह हमारे पूर्वजों के सतत् श्रम का प्रतिफल है। यही कृतज्ञता का भाव हमें आत्मा (अत्, चलते रहना और मनिन् प्रत्यय) की अवधारणा को स्वीकार करने की ओर ले जाता है। आश्विन माह का कृष्णपक्ष पितृपक्ष कहलाता है। यह पितरों अर्थात् पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का समय है। बिहार में गया में फल्गु नदी के तट पर और कतिपय अन्य तीर्थों में इस समय पितरों के श्राद्ध-तर्पण (श्रद्धा और तृप्ति) का मेला लगता है। हम पूर्वजों को अपने अच्छे कर्मों से तृप्त करते हुए उनके प्रति श्रद्धा का प्रदर्शन करते हैं। संसार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान-विज्ञान का क्रम चलता रहे और आगत गत को कृतज्ञता ज्ञापित करता रहे, यही पितृऋण चुकाना है।
आश्विन कृष्ण पक्ष के उपरांत आश्विन शुक्लपक्ष उत्तर भारत, खासकर बंगाल और उसके सीमावर्ती इलाकों में देवीपक्ष या मातृपक्ष के नाम से जाना जाता है। देवी पक्ष भगवती दुर्गा के नैहर लौटने का समय है। यह दुर्गा पूजा का सामाजिक और भावात्मक पक्ष है। इस समय विवाहित बेटियाँ अपने-अपने नैहर (मायका) लौटती हैं। यह बहुत भावुक क्षण है।
विजयादशमी अर्थात् दशहरे के दिन उन्हें वापस लौटना होता है। इसी दिन देवी की प्रतिमाओं का नदी-तालाबों में विसर्जन होता है, जिसे बंगाल में "भसान" कहा जाता है। स्त्रियाँ देवी दुर्गा से अखण्ड सौभाग्य की कामना करते हुए आपस में "सिन्दुर-खेला" करती हैं। आबालवृद्ध माँ से कहते हैं - माँ! तूमि आबार ऐशो (माँ, तुम फिर आना)।
सचमुच, आश्विन का शारदीय प्रभात सबके लिए आशा और उमंग की नई सुबह लेकर आता है।

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