ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
आशिक़ी.कॉम
01-Feb-2019 03:06 PM 1857     

जी हाँ ये बात सौ फ़ीसदी सही है। जिस किसी को प्रेम का रोग लग जाता है उसका इलाज हक़ीम लुकमान भी नहीं कर सकते। इस बीमारी के बारे में सिर्फ़ शायरों ने ही नहीं बल्कि विशुद्ध पंडित कवियों ने भी लिखा है -
कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय
व खाये बौराये जग, या देखे बौराये
जी जनाब! जैसे सोना देखकर ही आदमी पगला जाता है (बिना खाये) उसी प्रकार इश्क़ भी बड़ी जानलेवा बीमारी है। मलेरिया भी मच्छर के काटे से होता है परन्तु लवेरिया महबूब के देखे से ही हो जाता है; काटना तो दूर की बात। लवेरिया के लक्षण भी विचित्र सत्य होते हैं। नींद नहीं आती, भूख नहीं लगती, हाँ प्यास ज़रूर लगती है (पीने वालों को पीने का बहाना चाहिये) देवदास का नाम तो सुना होगा - "जीना छोड़ दूंगा मगर पीना नहीं छोड़ सकता।" ये देवदास बहुतायत में पाए जाते हैं। पी के इनको होश नहीं रहता कि ये कहाँ और किस हालत में हैं। कहीं ग़लती से किसी होटल में पहुँच गये और हंगामा कर दिया तो वेटर भी भन्ना कर बोलेगा "मालिक देवदास हैं, खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोड़ा बारह आना।" आना पाई के ज़माने की ही चीज़ हैं। आजकल endangered species में शामिल हो गये हैं। सरकार कहती है चीता बचाओ, हम कहते हैं आशिक़ बचाओ। ये हमारी संस्कृति की धरोहर हैं। आप ही बताइये अगर रोमियो-जूलियट या ओथेलो-डेसडिमोना न होते तो शेक्शपीयर को कोई पूछता? हमारे हिंदुस्तान में तो भंडार है आशिक़ों का। हीर-रांझा, लैला-मजनू, शीरीं-फरहाद, सलीम-अनारकली, शाहजहाँ-मुमताज़, बाजबहादुर-रानी रूपमती वगैहरा बहुत सारे इश्क़ के मारे, बेचारे प्रेमी भारत में पाये जाते हैं। दरअसल कहना चाहिये कि पाये जाते थे। बात ये है कि आशिक़ किसी भी देश की क़ीमती धरोहर होते हैं। जिस प्रकार पुरातत्व विभाग द्वारा खोजी गयी वस्तुयें जर्जर अवस्था में भी बहुमूल्य होती हैं; उसी प्रकार हमारे ऐतिहासिक प्रेमी भी मूल्यवान थे। जिस प्रकार आजकल चित्र भी कम्प्यूटर द्वारा बना दिए जाते हैं। साहित्य के नाम पर अनाड़ी लेखक मुख पुस्तक (फेस बुक) पर अनाप शनाप लिख देते हैं। उसी भांति आशिक़ भी सोशल मीडिया पर कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे हैं। ये फेसबुकिया प्रेमी पहले किसी भी महिला को दोस्ती का प्रस्ताव (Friend request) भेजते हैं फिर आनन-फानन में रोमांटिक बातें शुरू कर देते हैं; बिना इस बात का अहसास किये कि अमुक महिला को उनमें रुचि है भी या नहीं। औरतों के पास बस एक ही विकल्प रह जाता है कि उस नामुराद को ब्लॉक कर दे। हालाँकि इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। ये आशिक़ महोदय कोई बीमार-वीमार नहीं होते। ये तो दर्जनभर औरतों से प्रेम निवेदन कर चुके होते हैं - जाने कौन पट जाये। जैसे कभी बिल्ली के भाग्य से छींका टूट जाता है वैसे ही कभी-कभी कोई नादान लड़की/महिला पट भी जाती है। परेशानी की बात ये है कि ये तथाकथित आशिक़ असली न होकर नकली होते हैं। असली हो ही नहीं सकते। न जान, न पहचान, न कभी मिले और इश्क़ हो गया। ये भी कोई बात हुई। हाँ पुराने ज़माने में अक्सर ऐसा हो जाता था। कॉलेज में लड़का लड़की टकराये, लड़की की किताबें गिरीं; दोनों ने झुककर उन्हें उठाने की कोशिश की। किताबें उठीं या नहीं लेकिन दोनों के हाथ ज़रूर एक दूजे के हाथ में आ गये और लीजिये हो गया इश्क़।
आजकल तो साहब कुछ प्रेमीजीव पहले आकर्षक कन्या को पटाने की चेष्टा करते हैं; कुछ ये अंदाज़ा लगा कर कि अमुक महिला अमीर लगती है, उसके बैंक बैलेंस पर नज़र रखते हैं। तरह-तरह से धनवान शिकार को पटाने की कोशिश करते हैं। ख़ुदा न ख़ास्ता अगर वो पट गयी तो कुछ न कुछ बहाना बना कर उससे पैसे ऐंठ लेते हैं। इसके लिये उन्हें अपने शिकार से मिलने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती। या तो वे अपना नकली फोटो और प्रोफ़ाइल भेजकर महिला को मोहित (सम्मोहित) कर देते हैं; या फिर आकर्षक तोहफ़ा देने का प्रस्ताव रखकर अपने बस में कर लेते हैं। हमारा भी सामना हो चुका है कुछ ऐसे ही नकली आशिक़ों से।
मुलाहिज़ा हो - एक सज्जन ने हमें मुख-पुस्तक पर दोस्ती की अर्ज़ी भेजी। चौखटा तथा वर्णन ठीक ठाक था। हमने हामी भर दी। आनन-फ़ानन में महोदय सन्देश बक्से (chat box) में आ गये। बिना देर किये हमारा व्हाट्सएप नंबर मांगने लगे। वाह! बहुत तेज़ दौड़ रहे हो बबुआ - हमने सोचा और कहा कि हमारे पास तो सिर्फ़ लैंड लाइन है। उन्होंने तुरंत पैंतरा बदला "अरे तुम्हारे पास स्मार्ट फ़ोन नहीं है? मैं गिफ़्ट कर देता हूँ।" "क्यों भाई इतनी मेहरबानी क्यों" हमने पूछा। "क्योंकि मुझे प्यार हो गया है।" वाह, क्या बात है! इसे कहते हैं इंस्टेंट लव।
ये तो पहली नज़र में हुई मोहब्बत भी नहीं क्योंकि अभी तक तो साक्षात्कार भी नहीं हुआ और नज़र तो मिली ही नहीं। ख़ैर हमने कहा "भेज दो।" दो दिन बाद एक फोन आया कि कोई कूरियर कम्पनी से बोल रहा है और हमारा पता चाहिये, पार्सल आया है। अरे बिना पते के पार्सल आया है? "नहीं जी पता है, ज़रा चैक कर रहे थे। चलो बता दिया पता। वो फिर बोली "जी पार्सल छुड़ाने के लिये 15 हज़ार रुपय देने पड़ेंगे।" क्यों जी हमने पूछा। जवाब मिला "जी इसमें सोने की माला, हीरे की अंगूठी, और एक लाख रुपये हैं।" "तो? और तुम्हे कैसे पता? पार्सल खुला है क्या?" उसने घबरा कर कहा "जी नहीं, घोषित किया हुआ है।" हमने मना कर दिया। आशिक़ जी ने पूछा तो हमने बता दिया कि 15 हज़ार नहीं हैं। "तो किसी से उधार ले लो।" "ठीक, तुम ही दे दो।" आशिक़ गधे के सर से सींग की मानिंद ग़ायब।
दूसरे जाँबाज़ आशिक़ बोले की वो हमारे देश आ रहे हैं हमसे मिलने। आओ! दो दिन बाद फ़ोन आया कि महाशय दिल्ली हवाई अड्डे से बोल रहे हैं, उन्हें कस्टम वालों ने पकड़ रखा है। हमने कहा कि दुःख की बात है मगर हम क्या करें? बोले कि कस्टम वालों को एक लाख रुपया देना है जो हम एक अकाउंट में जमा कर दें तो काम हो जायेगा। हमने कहा भैया पैसे तो हमारे पास नहीं हैं लेकिन हमारा भाई पुलिस में है उसे भेज देते हैं मदद के लिये। फोन कट गया और आज तक कटा हुआ है। हमारा आशिक़ बैताल की तरह किसी पेड़ की डाल पर जा बैठा कोई और शिकार फांसने के लिये।
ये एक बानगी थी उन आशिक़ों की जो या तो औरतों को बेवक़ूफ़ समझते हैं या ख़ुद को ज़रूरत से ज़्यादा स्मार्ट। एक और श्रेणी है जहाँ शिकारी थोड़ी ज़्यादा चालाकी दिखाते हैं। हमने अपनी एक पेंटिंग मुख-पुस्तक पर पोस्ट कर दी। काफी लोगों ने उसकी क़ीमत पूछी। हमने बता दी। कुछ नहीं हुआ। होना भी नहीं था क्योंकि तस्वीर मंहगी थी। अचानक एक सज्जन ने क़ीमत स्वीकार कर ली। शर्त ये थी कि तस्वीर के साथ-साथ मुसव्विर भी उन्हें हासिल हो। हमने कहा भाईजान, बिकाऊ सिर्फ़ पेंटिंग है पेंटर नहीं। भाईजान सुनते ही खरीदार ग़ायब। चलिये ये तो वो लोग हैं जो खुलेआम वार करते हैं। एक और मुख़्तलिक क़िस्म है जो परदे के पीछे से खेल खेलते हैं। जी हाँ! कुछ लोग लड़की बनकर महिलाओं से दोस्ती करते हैं। धीरे-धीरे वे आपत्तिजनक वार्तालाप पर उतर आते हैं। होता कुछ नहीं लेकिन बेवजह की बदमज़गी हो जाती है। आखिर विकृत मानसिकता वाले लोगों से, कम वक़्त को ही सही, दोस्ती करना आसान तो नहीं। मख़्मूर देहलवी का एक शेर याद आ गया -
मुहब्बत के लिये कुछ ख़ास दिल मख़्सूस होते हैं
ये वो नग़्मा है जो हर साज़ पे गाया नहीं जाता
वो ज़माने और थे जब इश्क़ एक पाक जज़्बा हुआ करता था। हाँ यह बात भी सही है कि प्रेम को भले ही सदा पवित्र माना गया हो, मगर प्रेमी या आशिक़ को गंभीरता से कम लिया गया है। अक्सर यह पता लगते ही कि अमुक व्यक्ति को प्रेम रोग लग गया है तो यार दोस्त तुरंत उसे लवेरिया-ग्रस्त एलान कर देते हैं। साथ ही ये फतवा भी सुना दिया जाता है -
चल साथ कि हसरत दिले मरहूम से निकले
आशिक़ का जनाज़ा है ज़रा धूम से निकले
ये मुख-पुस्तक वाले यानि ऑन लाइन आशिक़ों का वो हश्र होने वाला है कि तमाम ट्विटर तथा फेसबुक के बेचेहरा (ढठ्ठड़ड्ढथ्ड्ढद्मद्म) दोस्त कह उठेंगे - जिन-जिन को था ये अज़ार मर गये, अक्सर हमारे साथ के बीमार मर गये।

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