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आसान नहीं है वापसी की राह
01-Jan-2017 12:10 AM 2668     

प्रवासी यानी वे लोग जो जन्मभूमि को छोड़ कर कहीं और जा बसते हैं। कुछ लोग गाँव से शहर, शहर से प्रान्त छोड़ते हैं और कुछ हमारे जैसे चाहे-अनचाहे सूदूर देशों में जा बसे हैं किन्तु फिर भी किसी न किसी माध्यम से मातृभाषा व जन्मभूमि से जुड़े हैं या जुड़ने की सदैव अपेक्षा रखते हैं। भारतीयों के विस्थापन के विविध कारण रहे हैं जिसमें पिछले पचास वर्षों में उच्च शिक्षा और जीविका के साधन मुख्य हैं।
(भारत में) प्रवास आधुनिक काल की उत्पत्ति नहीं हैं। कभी रामचन्द्र जी सीता एवं लक्ष्मण सहित चौदह वर्ष के प्रवास हेतु वन गए थे और इन चौदह वर्षों में सर्वविदित परिस्थितियोंवश अयोघ्या से श्रीलंका पहुँचे थे। महाभारत के पाण्डव भी वर्षों इधर-उधर भटकते रहे थे। महात्मा बुद्ध और जैन ऋषि-मुनियों ने भी पदयात्राएँ की थीं और बहुत से स्थानों में प्रवास किया था। इतिहास में ऐसे अनगिनत उदहारण मिल जायेंगे। मौर्यकाल में चाणक्य नीति चलाने वाले चाणक्य भी कोंकणी ब्राह्मण थे। सदियों से भारत मध्य एशिया में रहने वालों को आकर्षित करता रहा था। बहुत से लोग फिर यहीं आकर बस गए और कुछ एक ने राज्य भी स्थापित किये। छत्रपति शिवाजी ने सर्वप्रथम स्वराज्य का स्वप्न देखा था और कालांतर में मराठे सीमावर्ती प्रदेशों को सुरक्षित करने पश्चिमी भारत से आकर उत्तर में अफगानिस्तान की सीमा तक पहुँच गए थे। आक्रमणकारियों में नादिर शाह और अहमदशाह अब्दाली जैसे भी थे जो बार-बार भारत को लूटने के लिए ही आते थे। विदेशी भारतीय समाज में दूध में चीनी की तरह घुल-मिल गए और पीढ़ी दर पीढ़ी यहीं फलते-फूलते रहे। आज उन में से अधिकतर अपने को गर्व से भारतीय कहते हैं।
सोने की चिड़िया कहलाने वाले भारत ने कालांतर में डच, पुर्तगालियों व अंग्रेज़ों को आकर्षित किया और अंत में वह दो सौ वर्षों तक ब्रिटेन का एक उपनिवेश बन कर रह गया। इस परतंत्रता काल में विदेशी मूल के लोगों यानी प्रवासियों या उनके वंशजों ने स्थानीय लोगों के सहयोग से विभिन्न क्षेत्रों में ज्ञान संचय किया और भारत की संस्कृति, धर्म, दर्शन, विज्ञान, आधुनिक एवं पुरातन स्थापत्य कला, प्राकृतिक सम्पदा इत्यादि को पश्चिमी देशों में बाँटा। तदनन्तर कई यूरोपीय देशों व अमेरिका में ओरिएंटल स्टडीज प्रोग्राम खुले जिनके अन्तर्गत संस्कृत आदि भाषाएँ पढ़ाई जाने लगीं। हिंदी के सन्दर्भ में फादर बुल्के, जो मूलतः बेल्जियम से थे और बीसवीं शताब्दी में भारत आकर भारत के ही हो गए और उन्होंने यहाँ की नागरिकता भी धारण की, का नाम उल्लेखनीय हैं। वह पादरी होते हुए भी श्रीराम के अनन्य भक्त थे और उन्होंने राम कथा के विकास का वैज्ञानिक विधि से अध्ययन किया। उन्नीसवीं शताब्दी से ही कुछ भारतीयों ने भी उच्च शिक्षा हेतु ब्रिटेन इत्यादि पश्चिमी देशों में जाना शुरू किया। अधिकतर वापिस आये और उनमें से कुछ फिर स्वतन्त्रता संग्राम व राजनीति से जुड़े। महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल आदि उल्लेखनीय हैं जिनका नाम भारत का बच्चा-बच्चा जानता है।
भारत से दूर अनेक देशों में भारतीय मूल के लोग मिल जाएंगे जिनमें वे लोग भी सम्मिलित हैं जिनके पूर्वज भारत से अँग्रेज़ों द्वारा गिरमिटिया मज़दूर बना कर लाये गए थे। वे भारत लौटने का स्वप्न लेकर आये थे परंतु लौटकर जा न सके। अमेरिका ने भी भारतीयों को आकर्षित किया और अमेरिकनों को भारत ने। बीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्र्ध में प्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन, अर्नेस्ट हैमिंग्वे इत्यादि भारत आये। दूसरी ओर स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, लाला लाजपत राय आदि ने अमेरिका की यात्रायें की। यह वह समय था जब नस्लभेद प्रचलित था। शताब्दी के उतराद्र्ध में तो जैसे कपाट ही खुल गए। साठ-सत्तर के दशक में उच्च शिक्षा हेतु डॉक्टर, वैज्ञानिक, इंजीनियर आदि बहुत से व्यक्ति अमेरिका पहुँचे। पढ़ाई व रिसर्च कर कुछ वापिस चले गए कुछ यहीं बस गए। चूँकि तत्कालीन परिस्थितियों में जैसे-जैसे भारत में उच्च शिक्षित लोगों की संख्या बढ़ने लगी वैसे-वैसे पश्चिमी देशों में प्रशिक्षित लोगों को वहाँ स्थान मिलना कठिन होता गया। स्कालरशिप पर आये इन होनहार विद्यार्थियों ने अपने-अपने क्षेत्रों में बहुत प्रगति की व पहचान बनाई। प्रवासियों में से कुछ ऐसे भी थे जो विदेश में रहते हुए भी अपने परिवारों की आर्थिक सहायता करते रहे। अब स्थिति दूसरी है। अमेरिका में अपने पैसों से आने वाले विदेशी छात्रों में भारतीय दूसरे नंबर पर हैं। बहुत से व्यापारी, विशेष कर गुजरात से भी आये हैं व होटल या मोटेल इंडस्ट्री में विशेषतः संलग्न हैं। इक्कीसवीं सदी के आरम्भ में इन्फॉर्मेशनल टेक्नोलॉजी के बहुत से कन्सल्टेंट भारत से लाये गए जो यहीं बस गए हैं। भारतीय मूल के कुछ लोग ऐसे भी हैं जो भारत में अमरीकन कम्पनियों के लिए इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी या व्यापार संबंधित कार्य करवाते हैं।
बहुत से प्रवासी अपनी दूसरी पीढ़ी के पश्चिमी देशों में बसने के कारण पूर्व और पश्चिम दोनों के द्वार खुला रखना चाहते हैं। उन्हें अपने समाज को एवं देश को बाहर से बैठ कर देखने-सुनने का अनूठा अवसर मिलता है, दूसरी ओर इंटरनेट, नयी टेक्नोलॉजी एवं आवागमन के साधनों के विकास से बहुत से प्रवासी भारत से दूर होते हुए भी भारत से दूर नहीं हैं। प्रवासी केवल विदेशी मुद्रा के स्रोत भी नहीं रह गये हैं। फिर भी अवकाश प्राप्त सज्जनों के लिए भारत में स्थानांतरण के लिये विविध समस्याएँ हैं। वे भारत को विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी के विभिन्न क्षेत्रों में अपने विशिष्ट ज्ञान देने के साथ-साथ पश्चिमी समाज संबंधित अनुभवों का योगदान दे सकते हैं और दे रहे हैं। लेकिन क्या भारत के आम लोग अपने प्रवासियों का खुले हाथों स्वागत कर पाएंगे, विशेष कर वे लोग जिन्हें प्रवासियों की अनुपस्थिति की आदत पड़ चुकी है?

बहुत से प्रवासी अपनी
दूसरी पीढ़ी के पश्चिमी
देशों में बसने के कारण पूर्व
और पश्चिम दोनों के द्वार
खुला रखना चाहते हैं। उन्हें
अपने समाज को एवं देश को
बाहर से बैठ कर देखने-
सुनने से उसे जानने
समझने का अनूठा अवसर
मिलता है, दूसरी ओर
इंटरनेट, नयी टेक्नोलॉजी
एवं आवागमन के साधनों के
विकास से बहुत से प्रवासी
भारत से दूर होते हुए भी
भारत से दूर नहीं हैं।

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