ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
आर्थिक तरक्की के लिये व्यापार-मित्र बनना होगा - अजय भट्ट
01-Jan-2016 12:00 AM 1001     

लखनऊ में पैदा हुए अजय भट्ट ने अस्सी के दशक में भोपाल के मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की। विदेश व्यापार संस्थान, दिल्ली से एमबीए डिग्री करने के बाद उन्होंने थाईलैंड की कंपनी को ज्वाइन किया। यह कम्पनी एग्रीकल्चर बेस्ड मटेरियल को पुनर्नियोजन के काम से जुड़ी हुई थी। सन् दो हजार में वे एक ब्रिाटिश कम्पनी के साथ जुड़े गये और मार्केटिंग में एशिया क्षेत्र के सर्वेसर्वा हैं। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश : "वर्क कल्चर' के संदर्भ में भारत और दूसरे देशों में क्या फर्क महसूस करते हैं? देखिए! मेरा तो जहां तक एक्सपोजर है वो खाली थाईलैंड तक ही सीमित है। हालांकि हर देश में काम करने का एक अलग कल्चर होता है जो कि वहां के स्थानीय लोगों के एटीट्यूड, उनके काम करने के तौर-तरीके से ही बनता है। तो भी मैं थाईलैंड के बारे में बता सकता हूं। वहां और भारत में काम करने के तरीके में बड़ा फर्क है। वहां की सारी इकोनॉमी विदेशी ही चला रहे हैं। थाईलैंड में बड़ी मात्रा में जापानीज, यूरोपियन, अमेरिकन और बाकी देशों के मसलन भारत से भी काफी निवेश हुआ है। निवेश ज्यादातर मैन्युफेक्चरिंग क्षेत्र में है। इसकी एक बड़ी वजह वहां श्रम सस्ता होना भी है। दूसरे वहां श्रमिक बहुत ही अनुशासित हैं। हड़ताल जैसे शब्दों से किसी का परिचय तक नहीं है। वहां के कामगारों में लगन और मेहनत स्पष्ट दिखती है। अगर कामकाज के आठ घंटे नियत हैं तो वे ईमानदारी से उतने घंटे काम करेंगे। यही कारण है कि वहां की जीडीपी भारत से ज्यादा है। भारत और थाईलैंड के औद्योगिक वातावरण को आप कैसे देखते हैं। तरक्की के पैमाने पर देखें तो थाईलैंड में टोयेटा अपने मैन्युफैक्चरिंग के साठ साल पूरे कर रही है। दूसरी ओर अभी पच्चीस-तीस साल पहले तक भारत में दो ही तरह की गाड़ियां थीं एमबेस्डर और फियेट। स्कूटर तक खरीदने के लिये लोगों को सात-आठ सालों का इंतज़ार करना पड़ता था। भारत में यह वर्चस्व नब्बे के दशक में टूटना शुरू हुआ और अब धीरे-धीरे व्यापार-मित्र योजनाएँ बनना प्रारंभ हुई हैं। इसके परिणाम आने में अभी थोड़ा और समय लगेगा। प्रवासी भारतीय उद्योगपतियों को वहाँ किस तरह से देखते हैं। थाईलैंड और अन्य जगहों पर प्रवासी भारतीयों ने अपने मेहनत और काबिलियत से आर्थिक जगत में स्थान बनाया है। जिस कारण उन्हें बहुत सम्मान मिलता है। नज़रअंदाज और अवमानना जैसे शब्दों से वहाँ का समाज अनभिज्ञ है। कितनी भारतीय कंपनियाँ वहाँ हैं। जहाँ तक बड़ी कंपनियों का सवाल है तो टाटा स्टील में भी है, टाटा मोटर्स भी है। टाटा स्टील ने कुछ कंपनियों को अपग्रेड भी किया और कुछ का स्वामित्व ग्रहण कर लिया। बिड़ला तो वहाँ तीस-पैंतीस सालों से हैं। वे थाईलैंड में अपने कपड़े और भी दीगर चीजें बनाते हैं। इसके अलावा और भी इंडियन ग्रुप हैं, जो बहुत बड़े है और बहुत सारे छोटे-छोटे भी हैं। थाईलैंड व्यापार-मित्र राष्ट्र हैं। कैसे? थाईलैंड में उद्योगपति सामान तैयार करने के संयंत्र लगाते हैं। वहाँ कच्चा माल आयात होता है और फिर तैयार माल निर्यात कर दिया जाता है। तो थाईलैंड का प्रोडक्शन को सहायता करने का माहौल ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। "सिंगल विंडो' के उदाहरण वहाँ सैकड़ों मिल जायेंगा। आप कोई कंपनी शुरू करना चाहते हैं तो तमाम कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा करते हुए एक सप्ताह में यह प्रारंभ की जा सकती है। थाई श्रमिकों के मजदूरी बतायें। थाई सरकार ने बैंकॉक जैसे शहरों में श्रमिक की मजदूरी 67 डॉलर तय की हुई है। भारतीय रुपये में यह लगभग 500 होगी। लेकिन यूरोप और अमेरिका से तुलना करें तो यह राशि बहुत कम है। पश्चिम के विकसित देशों में श्रमिक एक घंटे का 14-15 डॉलर पाता है। इस हिसाब से आठ घंटे के 112 डॉलर होते हैं, जो भारतीय रुपये में आठ हजार के आसपास है। लेकिन थाईलैंड में जो मजदूरी की दर है वह भारत से ज्यादा है। दूसरी तरफ भारत में प्रोडक्टविटी कम है। श्रमिक आठ घंटे काम करके बमुश्किल चार घंटे का ही आउटपुट दे पाता है, जबकि थाईलैंड में ऐसा नहीं है।

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