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01-Mar-2018 03:45 PM 3125     

आज अल्पना बहुत खुश थी। उसकी छोटी-सी बेटी आदिका आज स्कूल से निकल कॉलेज में प्रवेश करने वाली थी। वह छोटी फुदकती चिरैया-सी कब उसकी हथेलियों से निकलकर खुले आसमान में कोमल पंख पसारे उड़ने लगी, उसे पता ही न चला। गोदी से निकल इतनी बड़ी हो गई कि माता-पिता से अलग रहकर पढ़ने की हिम्मत आ गई। अल्पना को खुशी के साथ-साथ चिंता भी थी कि अभी तक सब कामों के लिए माँ पर निर्भर सत्रह साल की आदिका कैसे अपने सब काम सँभालेगी। परीक्षाओं के दौरान जिस बेटी के सामने लगी खाने की थाली में रखी रोटी पापड़ बन जाती है, वह कैसे "मेस" में समय की पाबंदी से बँधकर खाना खाने जाएगी? अपने कमरे के "अटैच्ड बाथरूम" में बार-बार जाने वाली लड़की कब-कब छात्रावास से दूर बने हुए सार्वजनिक स्नानघर में जा पाएगी? आदि-आदि।
दुबई में पली-बढ़ी आदिका ने नर्सरी से बारहवीं तक की अपनी स्कूली शिक्षा दुबई के ही एक भारतीय स्कूल में अर्जित की थी। पापा आदित्य प्रकाश तो अपनी लाडली को दुबई के कॉलेज में ही पढ़ाने के पक्ष में थे। बेटी आँखों के सामने भी रहेगी और ज़रूरत पड़ने पर सहारा देने व प्रोत्साहित करने के लिए वे तो होंगे ही। लेकिन अल्पना, आदिका दोनों ही भारत के इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिले की पक्षधर थीं। माँ-बेटी ने भारत के कॉलेजों की खूब वकालत की। आदिका अपने बल पर पढ़ाई करना चाहती थी, उसे संघर्ष से परहेज न था और अल्पना भी बेटी को स्वाधीन बनाना चाहती थी कि घर के बाहर की दुनिया देखेगी तो बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। दोनों की मर्जी और दलीलों के आगे आदित्य को झुकना पड़ा। बहुमत की विजय हुई।
आज आदित्य, अल्पना और आदिका संयुक्त अरब अमीरात से भारत तक का सफर तय कर मुकद्दमपुर के होटल में बैठे थे। मुकद्दमपुर से पाँच किलोमीटर दूर ही था वह "राष्ट्रीय तकनीकी विज्ञान संस्थान", जिसमें कल सुबह जाकर प्रवेश से संबंधी सब कागज़ी कार्यवाही पूरी करनी थी। होटल के सभाकक्ष की षटभुजाकार मेज़ पर उन तीनों के साथ दो अन्य अल्प-परिचित बुज़ुर्ग पति-पत्नी भी थे, जो कि आदित्य के एक कार्यालयी सहयोगी के माता-पिता थे और मुकद्दमपुर में ही रहते थे। आदित्य के सहयोगी प्रद्योत ने जब मुकद्दमपुर में आदिका के दाखिले की बात सुनी तो सहर्ष अपने माता-पिता का पता दिया और कहा कि मुकद्दमपुर में उनसे ज़रूर मिलना और आदिका से भी मिलवा देना। ईश्वर न करे कि कोई विपदा आए! मगर किसी हारी-बीमारी या दु:ख-तकलीफ़ की स्थिति में आदिका को उनसे संपर्क कर कुछ राहत मिल पाएगी।
प्रद्योत के माता-पिता गायत्री और प्रद्युमन बहुत सज्जन व सरल हृदय मानुष थे। उन्होंने स्वयं ही आदिका के स्थानीय संरक्षक (लोकल गार्डियन) बनने का प्रस्ताव रख दिया। आदित्य और अल्पना ने उसे तुरंत स्वीकार कर लिया, उन्हें तो जैसे मुँह माँगी मुराद मिल गई थी। अंधे की दो आँखों की तरह गायत्री और प्रद्युमन उन्हें मिल गए थे। प्रद्युमन ने केवल "राष्ट्रीय तकनीकी विज्ञान संस्थान" की ही नहीं, मुकद्दमपुर की भी पूरी जानकारी आदिका को उस मुलाकात में दे दी। मुकद्दमपुर की आबो-हवा, दर्शनीय स्थान, समुद्र तट, बाग-बगीचे, संग्रहालय, सिनेमाघर, अस्पताल, खरीदारी के लिए पुराना बाज़ार व नए "शॉपिंग कॉम्प्लैक्स" आदि के बारे में एक शाम में इतना कुछ जान लिया था कि लग रहा था कि यह शहर नया व अजनबी नहीं है उनके लिए। मुकद्दमपुर से गुज़रने वाला "राष्ट्रीय महामार्ग" (नेशनल हाइवे), जिसपर 80 से 100 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से गाड़ियाँ दौड़ती रहती हैं, उसे केवल ज़ेबरा क्रॉसिंग, भूमिगत पैदल पारपथ या फुटब्रिज से ही पार करने की सलाह भी दी। इन सब बातों की जानकारी सुरक्षित रहने की कुंजी जैसी थी।
इसी मुलकात में गायत्री ने आदिका को कुछ ऐसी हिदायतें भी दीं जिन्हें अमल में लाकर कोई नया व्यक्ति अपनी सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकता है। गायत्री का मशवरा कुछ दबे ज़बान में निकला था- मुकद्दमपुर में सुरक्षित रहने के लिए किसी धार्मिक वाद-विवाद से बचकर रहना। किसी भी धर्म की प्रशंसा या निंदा मुसीबत में डाल सकती है। हिंदू त्योहारों पर किसी प्रकार के हुड़दंग या रैली आदि में भाग लेने से दूर रहना। ईद, गुरुपर्व या क्रिसमस में मिले अवकाश के दिन कॉलेज के छात्रावास में ही रहना। देवी-देवताओं की तसवीरों या झाँकियों से लैस जलसे-परेड आदि से कन्नी काट लेना आदि। सुनकर अल्पना और आदित्य अवाक् रह गए। उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। जैसे आसमान से धरती पर आ गिरे। वे पूछने को मजबूर हो गए कि ऐसा क्या इतिहास है इस शहर का जहाँ कि धार्मिक त्योहारों पर मनुष्य घर में कैद होकर रहे, वह भी सर्वधर्म समभाव नीति का पालन करने वाले धर्म-निरपेक्ष देश में।
यहाँ पर मुस्लिम समुदाय हिंदू त्योहारों के दिन हाथ में हथियार लेकर सड़क पर घूमते हैं तो हिंदू समुदाय के लोग मुस्लिम त्योहारों के दिन रैलियों और जलसों द्वारा एकमात्र मस्जिद तक जाने का रास्ता बंद कर देते हैं। घमासान युद्ध होता है। ऐसे में अलग-अलग शहरों से आए मासूम छात्र-छात्राएँ कभी अनजाने ही धार्मिक हिंसा का शिकार बन जाते हैं, गायत्री ने बताया। अल्पना और आदित्य तो जैसे जड़ हो गए। प्रत्युत्तर के शब्द हृदय में ही कहीं घुटकर कंठ में अवरुद्ध हो गए।
ऐसा तो अब तक कहीं न देखा न सुना। हमारे शहर समीराबाद में तो सभी बहुत मिल-जुलकर रहते हैं। वहाँ हिन्दू भी रमज़ान के पाक महीने में एक दिन रोज़ा रखकर मुसलमानों के इस कठोर व्रत का अनुभव करते हैं तो मुस्लिम भी दशहरे और दुर्गा पूजा का मेला देखने सबसे पहले जाते हैं। हिन्दू भी इफ़्तार की दावत में शरीक़ होते हैं तो मुस्लिम दीवाली की रंगीन आतिशबाज़ी में। और हिन्दू-मुस्लिम एकता का बेमिसाल पर्व "फूलवालों की सैर" में तो दोनों समुदाय कंधे से कंधा मिलाकर गौरव का अनुभव करते हैं। फिर यहाँ ऐसा क्यों संभव नहीं? मेरा जन्म स्थान समीराबाद भी तो भारत का ही अभिन्न अंग है। अगर वहाँ ऐसी एकात्मकता, सहिष्णुता और सामंजस्य देखा जा सकता है तो यहाँ क्यों नहीं?ं आदित्य के संस्कारों में कहीं गहरे पैठे हुए संगठत्व के भाव यकायक निर्बाध फूट पड़े।
"यहाँ के स्थानीय निवासी भी मेलमिलाप, बंधुत्व व भाईचारे में ही विश्वास करते हैं। ये दंगाई मुकद्दमपुर के नहीं बल्कि आस-पास के गाँवों से आने वाले कुछ गुंडे-बदमाश होते हैं जिनका मुख्य मकसद दहशत फैलाकर लूटपाट करना होता है। वास्तव में इसके पीछे कतिपय राजनीतिक दलों का हाथ होता है जो ऐसी चाल खेलकर धर्म की आड़ में अपनी-अपनी रोटियाँ सेंकते हैं। मुकद्दमपुर की साधारण जनता की इन दंगों में कोई भागीदारी होती ही नहीं है। अन्य दिनों में ऐसा कोई खतरा नहीं है। यह सब इसीलिए बताया क्योंकि सावधानी में ही सुरक्षा है।" प्रद्युमन ने आगे जोड़ा। इस वार्तालाप से आदिका का दिल काँप उठा।
"मगर आंटी किसी त्योहार की छुट्टी में मम्मी-पापा के पास दुबई भी जाना पड़ सकता है, मैं तो यहीं फँस जाऊँगी फिर। ऐसे तो मैं मम्मी-पापा से मिल भी नहीं पाऊँगी।" आदिका ने जायज़ सी चिंता ज़ाहिर की।
"हमने तो राष्ट्रीय तकनीकी विज्ञान संस्थान की बहुत प्रशंसा सुनी थी और उससे भी ज़्यादा इस शहर की। मगर ये आप क्या कह रहे हैं! यह तो बहुत चिंता का विषय है। ऐसा कैसे हो सकता है? पुलिस और प्रशासन कुछ नहीं करता क्या? सब हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं?" आदित्य एक साँस में बोलते गए। आदित्य के मन में अभी भी प्रशासन व कानून के सुचारु संचालन की आखिरी आस की किरण की फिकियाती सी झिलमिल बाकी थी।
"कुछ हद तक ऐसा ही है। पुलिस भी कभी-कभी त्योहारों के आगे-पीछे होटल, बार, क्लबों आदि में छापा मारती है और अनैतिकता की दुहाई देते हुए जन्मदिन पार्टी, हवा-पानी बदलाव के लिए हुए छात्र-छात्राओं के समूहों को तफ़रीह या मटरगश्ती के आरोप में गिरफ़्तार कर लेती है।" गायत्री ने बताया।
"क्या?" आदित्य के कानों में यह सुनकर जैसे बम फटने लगे। अल्पना की आँखों में ख़ौफ़ तैरने लगा। आदिका भी बुरी तरह डर गई।
"कानून नाम की भी कोई चीज़ होती है कि नहीं? क्या कहीं सुनवाई नहीं है इस वातावरण और अनाचार के खिलाफ़?" आदित्य का कलेजा कटकर बाहर आने को था।
"नहीं-नहीं! इतना मत घबराओ। हम हैं यहाँ। हम भी तो पिछले तीस सालों से यहाँ रह रहे हैं। यह सब इसलिए बताया ताकि किसी मुसीबत में न पड़ जाए बच्ची। मार पीछे पुकार है। अगर आदिका इन सब बातों का ध्यान रखेगी तो कोई दिक्कत नहीं आएगी। दरअसल यहाँ शहर की सबसे बड़ी मस्ज़िद और मंदिर ठीक आमने-सामने हैं। यही मुख्य टकराव की वजह है कि निकलते-बड़ते आमना-सामना हो जाता है दोनों धर्मों के अनुयायियों का। अगर मंदिर-मस्ज़िद दोनों शहर के अलग-अलग हिस्सों में होते तो ऐसी नौबत ही न आती। बस, इसी कारण अराजक तत्वों को मौका मिल जाता है।" प्रद्युमन ने उन लोगों के डर को कम करने की नाकाम कोशिश की। आदित्य अल्पना और आदिका के चेहरे सफेद पड़ चुके थे। रक्त संचार मानो रुक गया था।
अल्पना की रूह जैसे साथ छोड़ने लगी। पछताने लगी कि क्यों मुकद्दमपुर में दाखिला लेने का यह गलत फैसला कर लिया? भारत के और शहर भी तो हैं जहाँ सुख-शांति का वास होता है, कहीं और दाखिला क्यों नहीं करा लिया? स्वयं पर अत्यंत क्रोध आया कि सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय तकनीकी विज्ञान संस्थान सोचकर यहाँ दाखिला लेने का सोचा। अगर बच्ची को यहाँ छोड़ा तो हर समय की सुरक्षा की चिंता घेरे रहेगी। कैसे तिल-तिल बड़ा किया है इकलौती बेटी को। कहीं कुछ हो गया तो? उसका कलेजा रेल के इंजन सा धक-धक करने लगा। उसने आदित्य को तुरंत दाखिला रद्द कर दुबई में दाखिला दिलाने की गुज़ारिश की। साथ ही अगले ही दिन वहाँ से निकल चलने को भी कहा।
आदित्य ने ऐसे में धीरज और समझदारी से फैसला करने की सलाह दी। गायत्री और प्रद्युमन ने भी यही समझाया, "आगाह करना ज़रूरी था कि बच्ची के लिए कॉलेज का जीवन नया है, कॉलेज भी घर से सात समुंदर पार और शहर भी एकदम नया। कुछ भी जाना-पहचाना नहीं है। किसी हादसे का कॉलेज में पता चले, उससे बेहतर है कि पूर्व जानकारी सामने हो। ऐसे में सुरक्षित मार्ग अपनाने में मदद होगी। इतना ज़्यादा डरने की आवश्यकता नहीं है। हम भी तो यहाँ हैं, कहीं आने-जाने से पहले हम से सलाह कर ले। सलाह न भी करे तो सूचना देकर जाए। हम लोकल गार्डियन बनें हैं तो आदिका की देखभाल का पूरा जिम्मा लेंगे। आप तनिक भी फ़िक्र न करें। आदिका एकदम महफ़ूज़ रहेगी हमारे होते हुए।" फिर आदिका जो कि खुद अंदर से भयभीत थी पर अल्पना को हिम्मत बँधाने लगी कि वह अब बच्ची नहीं है, ऊँच-नीच जाँच-पड़ताल करके ही कोई काम करेगी।
उस समय सब के दबाव में आकर अल्पना चुप हो गई, पर अपने फैसले पर उसके जमे हुए पाँव उखड़ रहे थे। रातभर जाग कर काटी। उसे सत्रह साल पुराना वह दिन याद आया जब आदित्य की नयी नौकरी दुबई में लग चुकी थी, उसे और आदिका को भी आदित्य के पास रहने दुबई जाना था। सभी नाते-रिश्तेदार दुबई के बारे में जितना जानते थे, उससे बढ़-चढ़कर जानकारी दे रहे थे। वास्तव में खानदान में से पहली बार कोई विदेश जा रहा था। सबको एक अनजाना सा डर सताए जा रहा था। कारण था- दुबई का एक मुस्लिम देश का हिस्सा होना। मुस्लिम देश में हिंदुओं के साथ क्या बर्ताव होगा? वहाँ रहनेवाले हिंदुओं को किन-किन संकीर्णताओं का सामना करना होगा? यही सब शंका-आशंकाएँ सबको चिंतित और विचलित कर रही थीं।
एक तो पहली विमान यात्रा, वह भी विदेश की और तिस पर एक गैरहिंदू देश की ओर; अल्पना ने बहुतेरी हिम्मत जुटाई पर दिल के किसी कोने में बैठा डर बार-बार फन उठाकर उसके साहस को डस ले रहा था। दो साल की आदिका को सँभालते-सँभालते किसी तरह साढ़े तीन घंटे की हवाई यात्रा समाप्त हुई। चंचल-शरारती आदिका को हवाई जहाज़ की सीट पर इतने समय तक टिकाए रखना बड़ा ही लोहे के चने चबाना था। सहमी-सी वह दुबई के हवाई-अड्डे पर उतरी। नन्हीं आदिका को गोदी में लेकर, हाथों में एक छोटी अटैची और कंधे पर बैग। हर कदम फूँक-फूँक कर रखा था उसने। आदित्य तो लगभग एक माह पूर्व ही आ चुके थे।
दुबई के आलीशान हवाई-अड्डे की नायाब तसवीरों को अपनी रुद्राक्ष जैसी पुतलियों के कैमरे में कैद करती हुई अल्पना पासपोर्ट कंट्रोल नामक इमिग्रेशन की कतार में खड़ी थी। अल्पना की हिचक व डर तो उसे बाँधकर सीमित कदमों को नापने की अनुमति देते थे, पर नन्हीं आदिका का दिल किसी कानून का डर न मानता था। वह माँ की गोदी से खुद को छुड़ाकर कतारों को आपस में विभक्त करने वाली रस्सियों पर लटककर झूलती, कभी किसी अन्य मुसाफ़िर के पीछे छिपकर चिन्ना सा चेहरा बाहर निकालकर माँ को झाँँ बोल कर वापिस छुप जाती तो कभी रस्सी दर रस्सी उन्हें उठाकर उनके नीचे से निकल कर दौड़ लगाती। वे रस्सियाँ उसे अपने घर के झूले सी लग रहीं थीं। अल्पना हैंडबैग और ट्रॉली बैग को पटक बार-बार आदिका को खींच कर सीधा खड़ा करने का प्रयास करती।
बालक मन कोई शासन, कोई नियंत्रण नहीं जानता, सो आदिका भी यह सब न जानती थी। अल्पना जितना ही उसे शांत खड़ा करने की कोशिश करती आदिका उतना ही सारे बंधन तोड़ने को मचलती। इतनी बड़ी जगह देखकर वह भाग-दौड़कर खेलने को मचल रही थी। वह अल्पना की पकड़ से छूटकर निकल भागती और अल्पना उससे तेज़ दौड़कर उसे पकड़ लाती। कतारों में खड़े प्रतीक्षारत कुछ यात्री तो उसकी हरकतों से झल्ला रहे थे तो कुछ के लिए उसकी अराजकता मनोरंजन व सम्मोहन का केंद्र बन बैठी थी। माँ-बेटी में एक मोहक, आनंददायक शीतयुद्ध चल रहा था। तभी एक व्यक्ति श्वेत, स्वच्छ, निर्मल लम्बा चोगा (उसे कंदूरा कहते हैं, बाद में मालूम हुआ) पहने, सिर पर सफ़ेद स्कार्फ़नुमा साफ़ा ओढ़े, जिसे काले धागे से बुने दो रिंगों की सहायता से टिकाया गया था, अल्पना की तरफ़ बढ़ने लगा। अल्पना के साथ-साथ आस-पास के यत्रियों के भी हलक सूखने लगे। बच्ची की नादानियाँ कहीं स्थानीय अधिकारी को नागवार गुज़रीं हों, सोचकर कलेजा मुँह को आ गया। परंतु उस सभ्य पुरुष ने अल्पना को कतार से निकल काउंटर पर सबसे आगे खड़ा होने का संकेत किया तो सबने आश्चर्य और राहत के मिश्र भावों में प्रशासन की सराहना की। अल्पना के हृदय के आभारी भाव तो आँखों के रास्ते छलके पड़ रहे थे।
अल्पना के धड़कते दिल में दुबई से प्रेम का स्पन्दन प्रारंभ हो गया। सारे डर, सभी आशंकाएँ, सारी शंकाएँ कर्पूर की तरह अदृश्य रूप से उड़ गईं। पहले प्रभाव ने अंतहीन श्रद्धा के स्तर तक प्रभावित कर दिया। हवाई-अड्डे की सभी औपचारिकताएँ निभाकर अपना लगेज लेकर वह उल्लसित सी चहकती हुई आदिका के साथ बाहर आई, जहाँ आदित्य पहले से ही अपनी कार में बैठे उन दोनों की प्रतीक्षा कर रहे थे। अल्पना ने आदित्य को हवाई-अड्डे वाला पूरा किस्सा कह सुनाया। आदित्य को यह जानकर अत्यंत खुशी हुई। अल्पना के इस सफ़र को लेकर उसे भी बराबर चिंता थी। उसकी इच्छा तो यह थी कि वह स्वयं भारत जाकर अल्पना और आदिका को लिवा लाए, मगर एक माह पूर्व ही ज्वाइन की नौकरी से छुट्टी लेने की गुंजाइश न थी।
आदित्य ने भी अपने एक महीने के कई ऐसे किस्से अल्पना को सुनाए जिससे उसे यहाँ के लोगों की आतिथ्य सत्कार की परंपरा का पता चला। देशी-विदेशियों सबको समानाधिकार होना और इसके अतिरिक्त स्त्रियों का एक विशिष्ट मान-सम्मान स्थानीय निवासियों की संस्कृति में पाया जाना, इन बातों ने बहुत शीघ्र आदित्य को संयुक्त अरब अमीरात का प्रेमी बना दिया था। यहाँ के नागरिकों की उदारता का नमूना तो अल्पना को हवाई-अड्डे से घर तक की दूरी में ही दिख गया कि सड़क पर पैदल चलने वालों को रास्ता देने के लिए कॉलोनी में आती-जाती गाड़ियाँ रुक जाती हैं और वाहन चालक हाथ के इशारे से पैदल यात्री को सड़क पार करने का नम्र निवेदन करते हैं ताकि उन्हें इस कड़ी धूप को अधिक न झेलना पड़े।
अगले दिन आदित्य अल्पना व आदिका को दुबई की हवेली नामक जगह में स्थित एकमात्र मंदिर ले गए। पति-पत्नी अपनी कुशल यात्रा का ईश्वर को धन्यवाद करना चाहते थे। मंदिर पहुँच अल्पना ने पाया कि मंदिर तो ठीक मस्ज़िद के बाजू में बना हुआ है। यहाँ तक कि मध्य के पत्थर से जड़े दालान में मंदिर का दायाँ दरवाज़ा मस्ज़िद के पिछले हिस्से में रहने वाले इमाम के दरवाज़े के ठीक सामने खुलता है। मंदिर से लोग आराम से निकल रहे हैं। मस्ज़िद में आने-जाने की सुविधा में भी कोई रुकावट नहीं है। मंदिर से निकलने वाले मस्ज़िद से निकलने वाले जानकारों को सलाम-आलेकुम कर रहे हैं तो मस्ज़िद से निकलने वाले हाथ मिलाकर अपने हिंदू परिचितों को गले लगा रहे हैं। यह जानकर अल्पना के हर्ष और आश्चर्य की सीमा न रही कि यहाँ के शासक ने 110 वर्ष पूर्व ज़मीन का यह टुकड़ा स्वयं यहाँ के भारतीय हिंदू व्यापारी समुदाय को मंदिर बनाने के लिए दान दिया था ताकि विदेशी धरा पर वे अपने धर्म का बेख़ौफ़ पालन कर सकें और अपने देश जैसा वातावरण महसूस कर सकें। यह भी पता चला कि इन सौ वर्षों के दौरान यहाँ दंगे तो क्या कभी आपसी झड़प या तू-तू-मैं-मैं भी नहीं हुई है।
सुबह मंदिर में आरती की घंटियाँ वातावरण में गूँज उठती हैं। उसी समय मुएज़्ज़िन की अज़ान और मग़रिब की नमाज़ से नतमस्तक श्रद्धालु युवकों का हुज़ुम उमड़ता है। सूक अल बनिया कहलाने वाल यह व्यावसायिक इलाका पूरी तरह से आस्थामय और श्रद्धायुक्त हो जाता है। पूजा और नमाज़ यथावत अपने-अपने रीति-रिवाज़ों और विश्वासों के अनुसार शांतिपूर्ण विधि से पिछले सौ से भी अधिक वर्षों से चलती आ रही है। धर्मांधता और ख़लल का नामोनिशान तक नहीं। दख़लंदाज़ी न यहाँ है, न वहाँ है। तीज-त्योहार, ईद-मुहर्रम पूरी आत्मीयता और एकात्मकता से मनाए जाते हैं। ऐसे पाक-पवित्र अवसरों पर लोग एक-दूसरे को मुबारकबाद-शुभकामनाएँ देते हुए नज़र आते हैं। यह अचल निरुपद्रव आदर्शात्मक सह-अस्तित्व सहिष्णुता का प्रतिदर्श संसार भर के लिए अनूठा दृष्टांत है।
अल्पना सोचने लगी थी कि दुबई आने से पहले किसी ने भारत में बताया था कि वहाँ यानि संयुक्त अरब अमीरात में सब वस्तुओं का आकार बहुत बड़ा होता है। वहाँ की बिÏल्डग में यहाँ की बिÏल्डग पूरी तरह अंदर समा जाए, सड़क में यहाँ की सड़क, ट्रक में यहाँ का ट्रक समा जाए, कार में कार, घर में घर; और हँसते हुए कहा था- कूड़ेदान में कूड़ेदान। परंतु यह बताना भूल गया शायद कि यहाँ के लोगों के दिल भी बहुत बड़े होते हैं जिनमें हर दूसरे इंसान का दिल समा जाए।
सुबह तक अल्पना सामान्य हो चुकी थी। मन में विश्वास था कि परदेश भले ही स्वप्न जैसा सुहाना हो परंतु यथार्थ तो देश में ही बसता है। भारतीय होने के नाते यह अनुभव भी व्यक्तित्व के विकास का अनिवार्य हिस्सा है। यही उसकी मानसिक तथा विचारात्मक गुणवत्ता को आकार देगा।

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