ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
आजादी
01-Mar-2018 03:49 PM 1589     

हर बार की तरह
अनदेखा आसमान देखने के लिए
लगाती हैं वे उम्मीदें फिर अपनों से
हाँ हाँ वे ही जो अपनी ही
भावनाओं की गुलाम हैं।

वे ही जो गुलामी और मुक्ति की
कशमकश में, स्वयं से स्वयं तक
संघर्षरत अपने घर संसार को
बचाये रखने की जद्दोजहद में हैं।

अपनी भावनाओं, आकांक्षाओं को
दबाये हुए वे मान बैठी हैं
कि वे महिला हैं
तो कमतर हैं ।

स्वयं को कमतर मानना
कमजोर की निशानी है
सिमोन द बरूआ ने कहा-
औरत पैदा नहीं होती बनाई जाती है।

वे स्वयं ही पहले से बने बनाये
महिलावादी खांचे में फिट हो जाती हैं
अन्जाने भय, आशंका से आतुर
वे थाम लेती हैं अपने भरण-पोषण के एवज में
उम्रभर खामोश रहने का समझौता-पत्र।

क्यों नहीं मानती वे कि एक अन्जाना भय
जो अंदर ही अंदर उन्हें दीमक की तरह
खाये जाता है
करते रहता है निरन्तर खोखला
उनके वजूद को
उस भय से मुक्ति का मार्ग
उन्हें ही तय करना होगा
पैदा करनी होगी ताकत।

इस भय का काम तमाम करने के लिए
मानसिक गुलामी से उबरने के लिए
महिला होने के पुछल्ले से उबरना होगा
आजादी के लिए।

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