ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
आज मैं जब भी
01-Jan-2019 02:10 PM 1050     

आज मैं

ये देशों की दुनिया, ये विदेशों का युग है
यूँ ही सब ये दिन-रात इक हो चले हैं
यहाँ चाँद छुपता है या अब सहर देखें
क्यूँ मेरे ये दिन-रात एक हो चले हैं

वो छत पे सुबह चिड़ियों का डेरा
वो सवेरे की ठंडक में नींदों का फेरा
शिवालय से आते भजनों का मेला
रेडियो पे अनसुने किस्सों का बसेरा
अब एसी यहाँ है और है फोन का अलारम
क्यूँ मेरे ये दिन-रात एक हो चले हैं

वो छोटी उमर में, कई घरों में खाना
वो पींगों के झूले वो तीज मनाना
वो खीर, पुडों, दूध और लस्सी का होना
बारिश की ठंडक में लड्डू बनाना
न नीम है, न वो पींगों की रस्सी
क्यूँ मेरे ये दिन-रात एक हो चले हैं

वो शहरों की रौनक़, वो हर घर का कोना
नए कपड़ों की दुनिया, पर खिलौनों पे रोना
वो साइकिल की रफ्तार और गिर के उठना
छुप-छुप के कुओं पे दोपहरी में भटकना
अब कारों से गिरते नहीं हैं, न टपकते हैं हवाई सफर से
फिर क्यूँ मेरे ये दिन-रात एक हो चले हैं

चाहतें तो ताउम्र बन्दगी करेंगी
फरेबों में भी अपनी सादगी भरेंगी
धड़कने हैं कि अपनी ही किश्त में हैं
इन मासूमों के ख्वाब भी तो मेरी ज़ीस्त में हैं
शायद तभी ये दिन-रात एक हो चले हैं
हाँ तभी मेरे ये दिन-रात एक हो चले हैं।

जब भी


जब शब्द भारी लगें और चुप्पी कोई ज़बां तलाशती हो
जब तस्वीरें झूठी लगें और नज़र चेहरे टटोलती हो
जब सहमी खामोशियाँ सिर्फ और सिर्फ ख़ुद को सुनाई दें
तब पकड़ अपना ही हाथ हाथों में, ख़ुद में खो जाना तुम
तब जकड़ अपने ही जज़्बात सारे, ख़ुद में खो जाना तुम

जब वो देख के अनदेखा करें और तुम आईना ढूँढने लगो
जब वो सुन के अनसुना करें और तुम मूक रहने लगो
जब सब हों आस-पास और तुम दुआ में हाथ उठाने लगो
तब पकड़ अपना ही हाथ हाथों में, ख़ुद में खो जाना तुम
तब जकड़ अपने ही जज़्बात सारे, ख़ुद में खो जाना तुम

जब आँख भर आए और अनदेखे को देखने चले
जब हाथ अपने ही हाथों की हवा को थामने चले
जब साँसें चलने की ज़िद्द करे और दिल अटकने लगे
तब पकड़ अपना ही हाथ हाथों में, ख़ुद में खो जाना तुम
तब जकड़ अपने ही जज़्बात सारे, ख़ुद में खो जाना तुम।

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