btn_subscribeCC_LG.gif
आध्यात्म इस लोक का
01-Feb-2018 10:08 AM 2954     

आमतौर पर जब भी आध्यात्म की बात चलती है तो उसे वैराग्य, धर्म और परलोक से जोड़कर देखा जाता है। अलग-अलग विद्वान इस शब्द का अपने-अपने सन्दर्भ के हिसाब से व्याख्यान करते है और वह आम लोगों की समझ से परे होता है। इस भौतिक जगत में रहते हुये अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुये आध्यात्म के सिद्धांत का व्यवहारिक जीवन में अमल करना शायद कठिन होगा, तभी तो उसे केवल धार्मिक व्याख्यानों के लिए ही सुरक्षित समझा जाने लगा है। क्या आज हमारा समाज भौतिकता में इतना धँस गया है कि उसे आध्यात्म शब्द पराया-सा लगने लगा है और उसे वैरागी, साधु, संत या चौथेपन के लोगों के लिए ही छोड़ दिया गया?
कुछ पश्चिमी विद्वानों ने हमारे समाज के आधार "रामायण" और "महाभारत" जैसे ग्रंथों को काल्पनिक बताकर समाज की आधारशिला को हिलाने की कोशिश की और उसी का परिणाम है कि आज अधिकाँश पढ़े-लिखे लोग आध्यात्मिकता के सिद्धांत को समझने में कठिनाई महसूस करते हैं। शायद उसका एक कारण यह भी है कि बनावटी धर्माचार्यों और भाड़े के प्रवचन कर्ताओं ने भी आध्यात्म शब्द का अत्याधिक प्रयोग कर इसे आम लोगों के व्यवहारिक जीवन से दूर कर दिया है और शायद इसी कारण ही आध्यात्म इस लोक के बजाय परलोक के सन्दर्भ में ज्यादा उपयुक्त समझा जाने लगा। क्या हमने धनोपार्जन और अपना प्रभुत्व स्थापित करना ही जीवन का लक्ष्य मान लिया है, और उसकी प्राप्ति के लिए आध्यात्मिक गुरुओं की शरण में जाने से भी नहीं हिचकिचाते? क्या हम जीवन के साधन और लक्ष्य में फर्क नहीं कर पा रहे हैं और लक्ष्यहीन होकर भटक रहे हैं?
आइये कहानी को यथार्थ के धरातल पर ले चलते हैं। अन्य हजारों-लाखों प्रवासी भारतीयों की तरह मैं भी अपने परिवार के साथ पिछले बीस से अधिक वर्षों से अमेरिका के बोस्टन शहर क्षेत्र में रह रहा हूँ। लगभग हर एक-दो वर्ष में भारत जाने का मौका मिलता है और यात्रा के दौरान अधिकांश समय अपने गृहनगर भिंड मध्य प्रदेश में गुजरता है, और इसी दौरान भिंड के पास अपने पैतृक गाँव पीपरी भी जाने का अवसर मिल जाता है। पिछले बीस पच्चीस वर्षों में, अन्य लोगों की तरह मैंने भी वैश्वीकरण और अन्य परिवर्तनों का भारत पर असर होते हुए दूर रहकर देखा है और उसका असर महानगरों, नगरों, कस्बों और दूरदराज के गाँवों में जाकर नजदीक से महसूस किया है। मँहगाई को सातवें आसमान पर चढ़ते हुए देखा है। चाहे वह रोजमर्रा की चीज़ों की बात हो, जमीन की कीमतें हों या फिर भ्रष्टाचार या दहेज़ के लेन-देन की बात हो। हर बार गया तो सरकारी तंत्र और सेवाओं की हालत पहले से खस्ता मिली। फिर चाहे वह सरकारी चिकित्सालय हो, विद्यालय हो या फिर कोई अन्य विभाग। हालाँकि बुनियादी ढाँचे में बढ़ोत्तरी दिखी, चाहे वह गाँव की सड़क, विद्यालय, चिकित्सालय या फिर आंगनवाड़ी भवनों की बात हो, पर सेवा की गुणवत्ता में लगातार गिरावट दिखी। विद्यालय का भवन है पर अध्यापक नहीं है, चिकित्सालय का भवन है पर चिकित्सक नहीं, कार्यालय में कुर्सी पर कर्मचारी नहीं, नहर है पर उसमें पानी नहीं। परीक्षा में सामूहिक नक़ल तो जैसे अध्यापकों को अपनी नौकरी बचाने और अभिभावकों को अपने बच्चों का भविष्य बनाने का मानो एक बहुत आसान-सा तरीका हो? निकम्मे सरकारी तंत्र के कारण ही दूरदराज के गाँवों में भी बगैर योग्य शिक्षकों और चिकित्सकों के भी निजी विद्यालय और चिकित्सालय फलते-फूलते दिख रहे हैं। दहेज़ तो मानो दिन-ब-दिन समाज में अपनी प्रतिष्ठा जाँचने का एक पैमाना बनता जा रहा हो?
यह सब मंजर देखकर जब समाज के प्रबुद्ध व्यक्तियों से बात करने की कोशिश की तो बड़ा ही निराशाजनक जबाब मिला कि, भिण्ड का कुछ नहीं हो सकता है। सोचकर बहुत निराशा होती थी और मन में यह प्रश्न उठता था कि भिण्डी ऋषि की इस तपोभूमि पर परिवर्तन कब आयेगा? क्या भारत अभी केवल राजनैतिक रूप से स्वतन्त्र हुआ है पर बौद्धिक स्वतंत्रता अभी बाकी है? जगह-जगह धार्मिक अनुष्ठान होते हुये नजर आते हैं पर उनका धरातल पर ज्यादा असर नहीं दिखता। क्या आध्यात्म की चर्चा केवल परलोक के लिए ही होती है? मानव मूल्यों का दिन-ब-दिन अवमूल्यन होना तो जैसे समाज ने स्वीकार ही कर लिया हो और निजी स्वार्थसिद्धि के लिए तो मानो सभी तरीके मान्य हो गये हों? वर्ष 2015 में 476 शहरों के स्वच्छता के एक सर्वे में अपने गृहनगर भिंड को नीचे से दूसरे स्थान पर होने की खबर सुनकर बहुत दुःख हुआ और हर बार की तरह इस बार भी एक असहाय की तरह मन ही मन में कुंठित होकर कर रह गया।
आइये अब कहानी को और आगे बढ़ाते हैं। पिछले वर्ष मुझे अपने परिवार के साथ पुनः भारत जाने का अवसर मिला। हर बार की तरह इस बार भी मैं दिल्ली से सीधे अपने गृहनगर भिण्ड गया तो इस बार नगर में घुसते ही स्वच्छता की झलक अनजाने में दिखने लगी। दूसरे दिन घर के बाहर कूड़ेवाली गाड़ी दिखाई दी, जो लोगों से संगीत स्वर के साथ कूड़ा डालने का आग्रह कर रही थी। मैंने सहज ही अपने बड़े भाई साहब से पूछ लिया कि इस बार मुझे भिण्ड में कुछ बदलाव नजर आ रहा है, तो उन्होंने तुरंत जबाब दिया कि यह परिवर्तन जिलाधीश डॉ. इलैया राजा टी. के अथक एवं असाधारण प्रयासों का परिणाम है। साथ ही साथ उन्होंने उल्लेख किया कि भिंड का जिला चिकित्सालय पूरे प्रदेश में स्वच्छता और अन्य मापदंडों के आधार पर प्रथम स्थान पर आया है। पहले तो इस बात पर यकीन ही नहीं हुआ।
मैंने उनसे फिर पूछा कि क्या वही बूचड़नुमा जिला चिकित्सालय प्रथम आया है? उन्होंने बताया कि अब उसका कायाकल्प हो गया है। भिंड के लिए यह सम्मान सुनकर मन में सहज ही एक गर्व का भाव उभर आया। लेकिन अगले पल ही मन में विचार आया कि इस उपलब्धि में मेरा तो कोई योगदान नहीं है। क्यों न उस अधिकारी से मिलकर उसका आभार व्यक्त किया जाए जिसके कारण मुझे भिंड का निवासी होने पर गर्व की अनुभूति हो रही है।
मेरे एक निकट संबंधी के सहयोग से मिलने का समय निश्चित हो गया। दूसरे दिन ही अपने अनुज के साथ जिलाधीश महोदय से मुलाकात के लिए पहुँच गया। परिचय के बाद हम लोगों ने उनका आभार व्यक्त किया और इच्छा जाहिर की कि हम लोग भी अपने पैतृक गाँव में धार्मिक कार्यक्रम के साथ कुछ सामाजिक कार्यक्रम का आयोजन करना चाहते हैं। उन्होंने तुरंत ही किशोरियों और महिलाओं के रक्त में हीमोग्लोबिन का स्तर जाँच करने संबंधी "लालिमा" कार्यक्रम का जिक्र किया और चंद मिनटों में ही भिंड जिले में "लालिमा" कार्यक्रम के शुभारम्भ का प्रारूप बन गया। जिलाध्यक्ष जी से पहली मुलाकात के बाद मन में ऐसा प्रश्न आया कि काश हमारे प्रशासन का यही रवैया बाकी जगहों पर भी होता तो आज देश की तस्वीर कुछ अलग ही होती?
कुछ ही दिनों बाद पीपरी गाँव से भिंड जिले में लालिमा कार्यक्रम का सफल शुभारम्भ हुआ। लगभग पांच सौ किशोरियों और महिलाओं के रक्त में हीमोग्लोबिन की जांच हुई और आवश्यकता अनुसार सहभागियों को उचित दवाई वितरित की गयी। जिलाधीश महोदय ने स्वयं आकर सहभागियों को प्रमाण-पत्र और कुछ विशिष्ट सहभागियों को पारितोषक भी दिये। इस कार्यक्रम के द्वारा कई किशोरियों और महिलाओं को बीमारी से बचा लिया गया और साथ ही साथ हीमोग्लोबिन के महत्व के बारे में लोगों को जानकारी भी मिली। इस अवसर पर जिलाधीश महोदय ने गाँव के नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता के बारे में जागरूक करने के लिए उद्घोषित किया। मानो गाँव वाले इस अवसर का इन्तजार ही कर रहे हो। कार्यक्रम के अगले दिन ही गाँव के बच्चे, युवा और बुजुर्गों ने मिलकर स्वच्छता अभियान का शुभारम्भ कर दिया, जो अभी तक सफलतापूर्वक चल रहा है। गाँव की महिलायें भी इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं। इस दल ने गाँव में शराब बंदी की दिशा में भी सफल प्रयास किये हैं और अन्य क्षेत्रों में भी प्रयासों को आगे बढ़ाने की रूपरेखा बनाई जा रही है। गाँव के लगभग 75 लोग अब तक इस कार्यक्रम से जुड़ चुके हैं।
तीन सप्ताह के व्यस्त कार्यक्रम के बाद हम लोग वापस बोस्टन पहुँच गये और कुछ समय बाद सूचना मिली कि भिंड जिले में उपचुनाव के दौरान कुछ विसंगत तथ्यों के आधार पर चुनाव आयोग के निर्देश पर भिंड के जिलाधीश सहित अन्य अधिकारिओं का स्थानांतरण कर दिया गया है। सूचना मिलते ही जिले की जनता जिलाधीश के समर्थन में सड़कों पर आ गयी। लोगों ने आलेख और कवितायें लिखीं, बच्चों ने बेहद मार्मिक चित्र बनाए और गाने गाये। जनता की भावनाओं का आदर करते हुए प्रशासन ने चुनाव के तुरंत बाद ही जिलाधीश को भिंड जिले में पुनः नियुक्त कर दिया।
इस कहानी के आध्यात्मिक पक्ष पर विचार करें तो भिंड शहर का स्वच्छता सर्वे में नीचे आना और बाद में जिलाधीश महोदय के असाधारण प्रयासों के कारण जिला चिकित्सालय का प्रदेश में प्रथम स्थान पर आना, यथार्थ रूप से सभी नागरिकों को किसी प्रकार से आर्थिक रूप से प्रभावित तो नहीं करता है, वह तो केवल यश और अपयश की एक अनुभूति है।
हमारे सभी कर्म अन्ततः किसी न किसी प्रकार की अनुभूति में ही परिणित होते हैं और यह अनुभूति अगर सुखद है और दूसरे लोग को आनंदित करने वाली हो तो, शायद यही "इस लोक का आध्यात्म" है। आज हम जीवन में भौतिक वस्तुओं के पीछे तो भागते चले जा रहे हैं और शायद इन अनमोल अनुभूतियों को छोड़ते चले जा रहे हैं। हमें जीवन के उस वृहद लक्ष्य को समझना होगा और अपनी दी हुई जिम्मेदारियों का पूरी लगन से निर्वहन करना होगा और शायद यही असल व्यवहारिक जीवन का आध्यात्म है।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^