ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
आदमी का विकल्प नहीं हो सकता
01-Sep-2016 12:00 AM 4637     

जीवित होने का प्रमाण-पत्र जमा करवाने लगभग नौ महीने बाद बैंक गया। कारण एक तो पास बुक भरने वाली थी दूसरे कई महीने की प्रविष्टियाँ बाकी थीं। देखा, बैंक में कई परिवर्तन हो गए हैं। नौ महीने कम नहीं होते। इतने अंतराल में एक नए सिस्टम ने जन्म ले लिया था। संबंधित बाबू को पासबुक दी तो हमारी पासबुक को पलटकर देखने के बाद उसके पीछे एक स्टीकर चिपका दिया और बोला- बाहर मशीन लगी है उससे प्रविष्टियाँ करवा लें। मशीन इस स्टीकर को पहचान कर सक्रिय हो जाएगी और आपकी पासबुक में प्रविष्टियाँ हो जाएँगी।
आश्चर्य, ख़ुशी और दुःख- कई तरह के भाव मन में एक साथ ही आए। और पुराना समय भी याद आया जब पासबुक कम्प्लीट करवाने के लिए घंटों प्रतीक्षा करनी पड़ती थी और तब दया करके कोई बाबू कह देता था- आप जाइए, मैं आपकी पासबुक पूरी करके सँभाल कर रख लूँगा, जब समय मिले ले जाइएगा। अस्सी के दशक की बात है। बैंक से कुछ रुपए निकलवाने के लिए गए। लाइन बहुत लम्बी थी तो सोचा जब तक नंबर आए अपने के मित्र से ही मिल आएँ। मित्र के पास जाकर सब भूल गए। शाम को घर लौटे। कुछ देर बाद एक बाबू जो हमें जानता था रुपए और पासबुक लेकर आया और हमसे टोकन ले गया। बोला- क्या करें बैंक छोड़ने से पहले हिसाब मिलाना ज़रूरी होता, नहीं तो कल भी देख लेते। मन खुश हो गया। यह था ग्राहक और बैंक का रिश्ता।
उन दिनों हम घर पर पिताजी को भी रुपए बिना किसी शुल्क के भेज देते थे। गाँव में भी उसी बैंक का खाता खुलवा रखा था। बैंक उसमें मुफ्त में "मेल ट्रांसफर" कर देता था और पिताजी हमारे पहले से हस्ताक्षर किए हुए चेक से रुपए निकाल लेते थे और आज हालत यह है कि बैंक जिस-तिस काम के नाम से चार्ज तो लेते ही हैं ऊपर से यह भी चाहते हैं कि ग्राहक बैंक में अपनी शक्ल ही न दिखाए। इसीलिए छह-सात वर्ष पहले हमारे बहुत पीछे पड़े कि एटीएम कार्ड ले लो लेकिन हमने मना कर दिया। किस-किस के नंबर याद रखें? कहीं कार्ड खो गया तो मुश्किल, नंबर भूल गए तो नई आफत। महीने में एक बार ही तो पेंशन निकलवानी होती है सो चले जाया करेंगे बैंक। लेकिन बैंक वाले हमें एक अजूबे की तरह देखते और हमें देखते ही उनका माथा ठनकता है।
अमरीका में जब आप किसी भी दुकान में घुसेंगे और निकल कर वापिस जाएँगे तब तक आपकी हर गतिविधि की फोटो खिंचती रहेंगी। कई बार तो काउंटर पर कोई नहीं होता तो भी आप चीजें उठाएँ, स्केन करें, कार्ड से बिल चुकाएँ और सामान ले आएँ। पहले सुनते थे कि विदेशों में अखबार रखे रहते हैं और पास में कोई दुकानदार नहीं, बस एक गुल्लक रहता है। अखबार लो, गुल्लक में पैसे डालो। कितनी ईमानदारी।
अब तो हालत यह है दुकान में किसी के रहने की ज़रूरत ही नहीं है। हर सामान पर एक स्टीकर लगा रहता है। यदि आप बिना स्केन किए और भुगतान किए बाहर निकलते हैं तो खतरे का साइरन बज जाएगा कि कोई बिना प्रक्रिया पूरी किए स्टोर से सामान ले जा रहा है।
फिर भी छोटे-बड़े स्टोरों में लोग रखे जाते हैं विशेष रूप से बुज़ुर्ग ग्राहकों के लिए। वे स्टोर में केवल समान खरीदने ही नहीं आते। वे अपने अकेले जीवन से ऊब कर बाहर इसलिए निकलते हैं कि किसी से कुछ भी बात करने का मौका मिले। उन्हें दुकान में बुलाने के लिए काउंटर पर कर्मचारी का होना एक अतिरिक्त आकर्षण होता है। कर्मचारी भी इसे जानते हैं और वे उनसे कुछ अतिरिक्त बातें भी करते हैं।
आज रोबोटिक्स एक सबसे नया और अधिक वेतन का काम है। हर काम के लिए रोबोट बनाए जा रहे हैं। बाज़ार तो यहाँ तक कल्पना करने और योजनाएँ बनाने लग गया है कि शायद विवाह जैसी संस्था का विकल्प भी रोबोट उपलब्ध करवा सकें। सोचिए, बिना संवेदनाओं का मानव जीवन कैसा होगा?
बाज़ार और बाज़ार के मालिक तो यही चाहते हैं कि मनुष्य के बिना ही काम चला लिया जाए क्योंकि काम न होने पर भी मनुष्य को भोजन चाहिए, बीमार होने पर दवा चाहिए, बुढ़ापे में पेंशन चाहिए और कुछ नहीं तो बोर होने पर कोई बतियाने के लिए चाहिए, लेकिन रोबोट को जब ज़रूरत हो तेल-पानी देकर तैयार करो और जब ज़रूरत न हो तो गोदाम में बंद कर दो।
बाज़ार क्यों भूल जाता है कि रोबोट सस्ते कामगार तो हैं लेकिन वे ग्राहक नहीं होते। ग्राहक के बिना बाज़ार जिएगा कैसे? इसलिए कितना ही बेईमान हो लेकिन आदमी का विकल्प तो आदमी ही रहेगा। अभी हमें जन्नत का यह तमाशा बहुत भा रहा है। काश, हम जन्नत की हकीकत की कुछ पूर्व-कल्पना कर पाते।

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