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आचरण और दिखावे का द्वंद्व
01-Nov-2017 03:05 PM 2691     

भारत के एक क्रांतिकारी साहित्यकार ने कहा था : "सभी धर्म असत्य हैं, मिथ्या हैं, आदिम दिनों के कुसंस्कार हैं; विश्व-मानवता के इतने बड़े शत्रु और कोई नहीं।" तो अवश्य इसका कारण था। कड़वे शब्द होने के बावजूद भारत में पाखंडपूर्ण धार्मिकता को देख कर बड़ी दृढ़ता से इसे दोहराने को जी चाहता है। कहाँ गया वह धर्म जो आध्यात्मिकता से संबंधित था; जो मनुष्य की अंतर्यात्रा का पथप्रदर्शक था? जिस धर्म का रूप हम देख रहे हैं इस बवाल को किसलिये कांधे पर उठाये जा रहे है? राम-रहीम जैसे ढोंगी संतो के लिये? या इनके द्वारा शोषित होते भक्तों के लिये? धर्म ने मानवता पर ऐसा जघन्य आक्रमण किया है कि इससे छुटकारा पाने के कोई आसार नज़र नहीं आते। बट्र्रेन्ड रसल ने मजाक में लिखा है- "मानवता का क्या नुकसान होता अगर ईसा न होते? कम से कम उनके नाम पर इतना खून खराबा न होता।" यह बात केवल एक धर्म के लिये सीमित नहीं है। आज सभी धर्मो में उनके जैसे बुद्धिजीवियों की आवश्यकता है जो जनता का मार्गदर्शन कर सके। दुर्भाग्य से हमें कुछ वामपंथियों जैसे बुद्धिजीवी मिले हैं जिनसे धर्म पर मूलभूत प्रहार करने की उम्मीद रखी जाती है किंतु वे भी स्वार्थ के लिये धार्मिक कट्टरता से हाथ मिलाने में नहीं चूकते।
इस समस्या के लिये केवल बाबाओं की निंदा कर देने से कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती। हमें उन कारणों की जांच करनी होगी जो इन ढोंगी साधुओं को पनपने के लिये भूमि को उपजाऊ बनाते हैं। कारण समझ लेने पर निदान आसपास पड़े हुये मिलते हैं। सबसे पहला और मूलभूत कारण : भय। प्राचीनकाल से धर्म-प्रवर्तकों ने सोचा कि नरक का भय, देवी देवताओं का भय, किसी भी भय के द्वारा लोगों को सन्मार्ग पर लाया जा सकता है। "भय बिन होई न प्रीति" और यही भय का शॉर्ट-कट आज मानवता के लिये बड़ा मँहगा पड़ रहा है। मैं अपनी आस्था पर भय के कारण जुड़ गया हूँ तो निश्चित है कि अन्य आस्था वाले लोगों से भय लगेगा, घृणा होगी; वे सत्यमार्ग पर हो ही कैसे सकते है? फिर आपस में मार-काट की शृंखला बढ़ती जायेगी। आप सिखा दीजिये कि हिंसा पाप है पर नास्तिकों या काफ़िरों की हिंसा अच्छी बात है फिर खून की नदियाँ बह निकलेंगी। अगर मैं सहिष्णु मित्र को कहता हूँ कि मैं इस पेड़ को भगवान मानता हूँ जबकि वह पत्थर को भगवान मानता है। हम दोनों में कोई टकराहट नहीं होगी पर जैसे ही ठूँठ होते मेरे पेड़ को काटने की नौबत आयेगी तो मेरा खून खौलने लगेगा। जब तक तार्किक रूप से सोचा न जायेगा, असहिष्णुता बढ़ती जायगी। "सभी धर्मों का सार एक है।" ऐसा कह देने से कुछ फर्क पड़ता है क्या? फिर क्यों मुहर्रम और दुर्गा-मूर्ति के विसर्जन में "सार की एकता" नजर नहीं आती? स्वामी दयानंद ने बचपन में ही शिवलिंग पर चूहे को देख कर तर्क से कुछ सोचा और मूर्तिपूजा पर प्रश्न उठाने के बहाने हिन्दू समाज को एक नई दिशा दी। मेरी दृष्टि में दयानंद का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने हिंदू धर्म के एक बड़े वर्ग को धर्म के मामले में तर्क करना सिखला दिया। "यह हमारे धर्म का मामला है इसे छुआ तो तलवारें उठ जायँगी" कहने वालों को स्वामी दयानंद से सीख लेनी चाहिये। फिर तर्क में छिपे पूर्वाग्रह को दूसरा कोई क्या हटायेगा? हमें खुद विवेचन के द्वारा उन्हे हटाना होगा। "पूर्वाग्रह हर व्यक्ति में होते हैं।" जैसा सैद्धांतिक बहाना भी काम न आयेगा। हमारे व्यवहार में पूर्वाग्रह न उतरें और हम निष्पक्ष रूप से कार्य करें इसको अच्छी तरह समझ कर हमेशा ध्यान रखना होगा।
दूसरा कारण है : अज्ञान। आजादी के बाद भी लोगों में वैज्ञानिक चेतना कहाँ जगी है? हम मोबाइल का उपयोग करना सीख गये हैं, यह केवल टेक्नोलोजी है इसमें क्या बड़ी बात है? धर्मांध और आतंकवादी भी यह सब सीख जाते है- वायुयान चलाना, बम का उपयोग करना आदि। पर हिंदू-मुस्लिम के खून में कोई फर्क नहीं है; दोनो का दिमाग, हृदय एक जैसा है, यह वैज्ञानिक सत्य कहाँ समझ पाते हैं? बाबा भी कोई देवता नहीं, हमारी तरह हाड़-मांस का पुतला हैं या फिर तंत्र-मंत्र, फलित-ज्योतिष की बातें केवल मन को प्रभावित करती हैं; जन्म के समय आकाश के ग्रहों से हमारे भविष्य का कोई लेना-देना नहीं है यह हम कहाँ समझ पाते हैं? इक्कीसवीं सदी में भी लोग सोचते हैं कि अमुक साधू चमत्कारी है। उसकी कृपा से मेरा रोग ठीक हो जायेगा, मेरे धन-धान्य में वृद्धि होगी, मैं जो कुछ भी हूँ इन साधू महाराज की वजह से हूँ आदि आदि। फिर वे महाराज अंधे विश्वास का लाभ क्यों न उठायेंगे? मेरे एक मित्र आसाराम के शिष्य हैं। उनकी अंधभक्ति से मैं हैरान हूँ; अनाप-शनाप पैसा लुटाते हैं उन पर। ऑफिस में या पत्नी को भी बिना कहे उनका भाषण सुनने के लिये किसी भी शहर में भाग कर चले जाना उनकी लत में शामिल था; पर मैं क्या कर सकता हूँ? उनके विश्वास के वे मालिक हैं चाहें तो कुएँ में गिरें। पर जब मीडिया में आसाराम की कलई खुल गई तो मेरी उम्मीद थी कि वे कुछ सोचने के लिये विवश हुये होंगे।
मैंने उनसे बात की तो कहने लगे- "सर, आप जो पढ़ते हैं यह मीडिया का किया कराया है।" मैं हैरान हुआ मैंने कहा- "मैं भी मीडिया को आँख मूँद कर नहीं मानता पर मीडिया एक समूह है; कोई संस्था तो है नहीं। शंका होने पर इसका कोई एक हिस्सा तो आवाज उठायेगा।" "नहीं सर, यह तो पूरी मीडिया की मिलीभगत है।" "तो फिर अदालत ने उनके घिनौने अपराध के लिये दोषी कैसे पाया है?"
"माई डियर सर, यह तो न्यायालय, पुलिस और वकील सबने मिल कर उन पर सामूहिक आक्रमण किया है। वे अकेले अपने को बचा नहीं पा रहे हैं।" "तो फिर सच क्या है? तुम्हे कैसे पता चलता है।" "बस, मैं तो जानता हूँ।" यह उनका संक्षिप्त उत्तर था।
राम-रहीम के या किसी भी बाबा के भक्तों का हाल इससे कुछ अलग नहीं है। अज्ञान में अहंकार और भी बढ़ जाता है। लोग अपने देवता (या अपने पैगंबर) को अंतिम सत्य समझने लगते हैं। बाकी सब ईश्वर झूठे हैं। यदि दूसरा कोई ईश्वर सच निकला तो मेरा ईश्वर झूठा साबित हो जायेगा यह भय उन्हे सताता है।
तीसरा कारण है स्वार्थ। बाबा अपने स्वार्थ में भक्तों के भय और अज्ञान का लाभ उठाते हैं। राजनैतिक नेता अपना वोट-बैंक सुरक्षित रखने के लिये मुस्लिम-वर्ग को अनुचित लाभ देते हैं, यह देख कर हिन्दू भड़क जाता है। उसे खुश करने के लिये वह दूसरी तरकीब लगाता है। याने सिद्धांत का जनाजा निकाल कर वे अपना मतलब साधते हैं। ऑस्ट्रेलिया में चर्च को ऐतिहासिक कारणों से बहुत कुछ सुविधायें मिली हुई हैं। अब जब नये मंदिर और मस्जिद का निर्माण हुआ है तो वही सुविधा उन्हें भी मिल गई। धर्म-निरपेक्ष राज्य में यह सिद्धांत का सवाल है। पर यह भी क्या बात हुई कि तलाकशुदा औरत को उसके अधिकार से वंचित करके मुस्लिम कट्टरवादियों को खुश किया तो हिन्दुओं को खुश करने के लिये राममंदिर खोल कर समस्याओं का पूरा एक साँप बिच्छुओं से भरा पिटारा भारत की जनता के ऊपर छोड़ दिया। राजनीतिज्ञ धर्मांध नहीं होता, धार्मिक संस्कृति को ठेंगा दिखाने में संकोच नहीं करता; वह तो सिर्फ अपने स्वार्थ की पूर्ति करता है। न केवल वोट-बैंक, उसके साथ देश-हित को भी दाँव पर लगा देता है। अच्छा है, कट्टर धर्मांधों को छोड़ कर मुसलमान समझने लगे हैं कि उनका हित धार्मिक लॉलीपॉप चाटने में नहीं अशिक्षा, बेरोजगारी आदि समस्याओं से जूझने में है, जिस प्रकार गरीब हिंदू जूझ रहा है। "तीन तलाक" का विरोध मुस्लिम नारियों ने किया तब जाकर बात बनी। शरिया के जिन नियमों का इस्लामिक देशों ने त्याग कर दिया है उन नियमों को भारत के स्वार्थी नेता मुस्लिम जनता को उपहार के रूप में देकर उनकी समस्याओं से मुँह मोड़ लेते हैं। जब इस्लामिक देशों में अल्पसंख्यकों के पर्सनल लॉ नहीं, पश्चिमी देशों में नहीं तो भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड में क्या आपत्ति है?
हिन्दू धर्म जितना नहीं पर चमत्कार का आकर्षण सभी धर्मों में व्याप्त है। कैथोलिक धर्म में किसी को "संत" घोषित करने के लिये उसके नाम पर दो चमत्कार गढ़ना आवश्यक है; उसके किये हुये कार्य काफी नहीं। दुनिया में भयंकर व्याधि से पीड़ित कोई न कोई व्यक्ति ठीक हो ही जाता है उसे चमत्कार के जरिये ठीक करवाना आसान रहता है। स्वार्थ और अहंकार का आलम यह है कि जो चर्च पश्चिम में भी ईसाइयों को आकृष्ट नहीं कर पाती वह उनके ही पोप के शब्दों में पूर्व में इस नई शताब्दी के लिये अनछुई फसल काटने को उद्द्यत हैं। वे यह नहीं जानते कि गरीबी और अशिक्षा को हथियार बना कर पाँव पसारने का स्वप्न भारत के ईसाईयों के लिये मुश्किलें पैदा कर सकता है। वे "घर वापसी" जैसे नये शगूफ़े को प्रतिक्रिया के रूप में जन्म दे रहे हैं जिसका प्रतिकार धार्मिक स्वतंत्रता का मनमाना अर्थ लेकर नहीं किया जा सकता।
अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुये कहा था कि "यह कितना दुखद समय आ गया है कि आज परमाणु को तोड़ना आसान है पर पूर्वाग्रहों को तोड़ना मुश्किल है।" जो तर्क और विवेक का उपयोग ही नहीं करते वे धर्मांध हैं; वे भक्त बन जाते हैं। जिनमें विवेक है ही नहीं वे मूर्ख हैं या अशिक्षित हैं और जो तर्क करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते वे गुलामों से भी बदतर हैं। इस युग में इंसानों ने दीवालें बहुत बना ली हैं पर पुल बनाना वे भूल गये हैं।

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