ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बेटे से एक मुलाकात (कहानी का एक अंश) रूसी से हिंदी अनुवाद - किरण सिंह वर्मा
01-May-2019 06:16 PM 711     

बूढ़ा चोरदोन कुछ अजीब से असमंजस में घर लौटा था। किसी वजह से वह या तो बहुत ज्यादा परेशान था या बहुत उदास और दुखी था। उसकी पत्नी तुरंत ही समझ गई थी कि कुछ न कुछ ज़रूर हुआ है। और जब उसे वस्तुस्थिति का पता चला, स्तब्ध रह गई। फिर उसे समझ नहीं आया कि क्या करें। उसने विचित्र बात सोची थी, जो सामान्य नज़रिये में बुढ़ापे का पागलपन, बेतुकी बात ही कहलाएगी, न कि किसी समझदार व्यक्ति की सोच।
बूढ़े का एक जवान बेटा था, जो करीब बीस साल पहले युद्ध में शहीद हो गया था। अब तो चोरदोन के अलावा शायद ही कोई उसे याद भी करता होगा। इतने समय तक साथ रहते हुए भी खुद चोरदोन ने भी उसके बारे में शायद ही कोई बात की होगी। और अब अचानक बूढ़े ने वहाँ जाने का फैसला किया, जहाँ युद्ध में जाने से पहले बेटा शिक्षक था।
"मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि वह जीवित है और जैसे अब भी वहाँ पर है। वह मुझे वहाँ बुला रहा है, मैं उसे देखना चाहता हूँ।" बूढ़े ने कहा।
पत्नी ने चिंता से उसकी तरफ़ देखा, पहले उसका मज़ाक बनाना चाहा, "तुम्हारा दिमाग तो ठीक है, बुढ़ापे के कारण सठिया गए हो क्या?" - पर समय रहते खुद को सम्भाल लिया। बहरहाल, जिस तरह से उसने ये शब्द कहे थे, उसकी आँखों में बेटे के प्रति स्नेह, दृढ़ता और निश्छलता झलक रही थी। पत्नी भी दृढ़विश्वास और निष्कपट भाव से कहे गए उसके शब्दों को समझ गई थी कि उसने पूरी गंभीरता से बोला है और यकीनन वह पूरे होशो-हवास में है। उसे उस क्षण ऐसा महसूस हुआ कि बेचारगी भरी झुर्रियों वाले गेहुएँ रंग के इस बूढ़े इंसान की इस सनक को बच्चों की तरह झिड़क देना पाप होगा, जिसकी सफेद दाढ़ियों के बीच स्नेहभरी, करुणामयी अधखुली निगाहें जवाब के इंतजार में थी और दोनों लंबे थके हाथ घुटनों पर आड़े-तिरछे रखे हुए थे। उसे उस पर दया तो आ रही थी, लेकिन उसके बेतुके इरादे से भी भली-भांति वाकिफ़ थी।
"अगर ऐसा है, तो तुम पहले ही वहाँ क्यों नहीं गए?" उसने उसकी भावनाओं को आहत किए बगैर सावधानी बरतते हुए सवाल किया।
"नहीं जानता।" चोरदोन ने गहरी साँस लेते हुए कहा। "पर अब देखो, कुछ खींच रहा है। मुझे वहाँ जाना चाहिए, अभी ज़िन्दा हूँ, मेरा दिल मुझे बार-बार प्रेरित कर रहा है। कल सूर्योदय के साथ ही मैं निकल पडूँगा।"
"ठीक है, देख लो, जो तुम्हें ठीक लगे।"
उसका अनुमान था कि बुड्ढ़ा जल्दी होश में आ जाएगा और सच्चाई जान जाएगा कि उसका वहाँ जाना व्यर्थ है, अनजान दूर बस्ती में उसे अब क्या मिलने वाला है? पर उसका अनुमान बेकार साबित हुआ, चोरदोन का इरादा अटल था और वह जाने की तैयारी करने लगा।
छोटी पहाड़ी की तराई में बसा गाँव बहुत पहले से सो रहा था, सारी खिड़कियाँ अँधेरे में डूबी थीं। सिर्फ चोरदोन के घर पर ही निरन्तर रोशनी टिमटिमा रही थी। बूढ़े को किसी तरह से चैन नहीं मिल रहा था। रात में ही कई बार उठा, कपड़े पहने, आँगन में गया और हर बार घोड़े के अस्तबल में जाकर तिपतिया घास डाल आता था। ऐसी-वैसी घास नहीं, बल्कि सबसे बढ़िया और पहली काटी हुई फसल की। और उसे गर्मियों से ही अनाजघर की छत पर सँभालकर रखी गई घास के ढेर को समय से पहले खोलकर निकालने में कोई अफ़सोस नहीं हो रहा था। इससे पहले शायद ही उसने खुद को भी ऐसी उदारता बरतने की अनुमति दी होगी। सर्दियों तक वह किसी को भी घास के नज़दीक भी आने की इजाज़त नहीं देता था। गाय और घोड़े को भी चरने के लिए पिछवाड़े के खाली पड़े किचन गार्डन में, कटाई के बाद खेतों में, शरतऋतु के काँटेदार पौधे (भटकटैया) और कटाई के बाद फसलों के अवशेष चरने हाँक देता था। लेकिन अब कोई मलाल नहीं है, यहाँ तक कि रास्ते के लिए खुरजी में जई भी रख ली थी।
और इस तरह वह सारी रात बेचैनी में कमरे का चक्कर लगाता रहा, जिस कारण पत्नी भी नहीं सो पाई। वह सोने का ढोंग करती रही, ताकि बूढ़े को अपना काम करने में कोई हिचक महसूस न हो। जब वह घर से बाहर निकला, तब उसने गहरी साँस ली। उसे समझाना बेकार ही था। वह उसे यह भी कह सकती थी, "सुनो, अब भी सोच लो, कहाँ जा रहे हो? और क्यों? तुम क्या बिल्कुल बच्चे बन गए हो, लोग तुम पर हँसेंगे!" लेकिन वह चुप ही रही। वह डर गई कि बूढ़ा कहीं उसे यह कह बैठे, "अगर तुम उसकी अपनी माँ होती, तो तुम मुझे समझाने-रोकने की कोशिश नहीं करती, बल्कि साथ देती।" उसे ऐसे शब्द सुनने की इच्छा नहीं थी। हालाँकि उसने बेटे को नहीं देखा था। वह नहीं जानती थी, कि वह कैसा दिखता था। चोरदोन की पहली पत्नी का करीब दस साल पहले ही देहान्त हो गया था और वह उसकी दूसरी पत्नी थी। उसके साथ कुछ भी हो, अपने पति के समक्ष उसे शर्मिन्दगी ही झेलनी पड़ती थी। उसे हमेशा बेवजह अपराध बोध कराया जाता कि वही दोषी है। शहर में अपने-अपने परिवारों के साथ रह रहीं उसकी दो शादीशुदा बेटियाँ नहीं आईं तो इसमें भी उसका ही दोष है। पता नहीं क्यों नहीं आई, उन लोगों से कोई सम्बन्ध क्यों नहीं रखतीं? लेकिन देखा जाए तो, चोरदोन भी बहुत कम बार ही कभी उनके पास गया होगा, जबकि अब तो वह शहर में रहता था। उनके बारे में शायद ही उसे कुछ बताया होगा और उसने पूछने की कोशिश भी नहीं की। सौतेली माँ होने के नाते अच्छा है कि इन मामलों से दूर ही रहें, इससे शाँति बनी रहती है। यही वजह थी कि बेमन से ही सही, जैसे-तैसे उसने बूढ़े के इस फ़ितूर को पूरा करने की इजाज़त दे दी। फिर कुछ देर मनन कर वह इस नतीजे पर पहुँची, "शायद, वह आदमी गहरी उदासी की अवस्था में है। उसे सचमुच रोकना नहीं चाहिए, उसकी आत्मा को शाँति मिलेगी, दिल को सुकून मिलेगा। दुख हल्का होगा..."
चोरदोन सुबह पहली किरण के साथ ही उठ गया। घोड़े की जीन कसने गया और फिर वापस आ गया। अपना नया गर्म चोगा पहना, दीवार से चाबुक उतारा और अँधेरे में पत्नी के बिस्तर पर झुकते धीरे से फुसफुसाया, "नसीप्कान, मैं जा रहा हूँ। तुम चिंता मत करना, मैं कल ही देर रात तक लौट आऊँगा। तुम सुन रही हो? तुम चुप क्यों हो? बात को समझो। बेटा तो मेरा ही है न। हालाँकि मैं सब जानता हूँ, पर मेरा मन पता नहीं क्यों, उधर जाने को मचल रहा है। मेरी आत्मा तड़प रही है, समझने की कोशिश करो।"
पत्नी चुपचाप बिस्तर से उठ गई, उसने अँधेरे में आँखें फाड़कर देखने की कोशिश की कि बूढ़े ने सिर पर क्या पहना है। फिर बड़बड़ाते हुए बूढ़े पर बरसी, "अपनी टोपी की तरफ तो देख लिया होता। चालीस पैबंद लगे हुए हैं। तुम लकड़ियाँ बीनने नहीं, बल्कि मेहमान बनकर जा रहे हो।" कहकर बिस्तर के ऊपर सँदूक का ढक्कन टटोलते हुए पति की भेड़ की खाल वाली मुड़ी-तुड़ी टोपी ढूँढकर उसे दी। "लो, पहनो। पुरानी टोपी अच्छी नहीं लगती।"
चोरदोन ने टोपी बदली और बाहर की तरफ चल दिया।
"रुको।" उसने उसे रुकने को कहा। "खिड़की की देहली से खाने की पोटली उठा लो, और उसे खुरजी में रख देना। शाम तक रास्ते में भूख लग जाएगी।"
चोरदोन "धन्यवाद" कहना चाहता था, पर चुप रहा, उसे पत्नी को धन्यवाद कहने की आदत नहीं थी।
गाँव अभी भी सो रहा था, जब चोरदोन अपने घोड़े पर बैठकर घर के पिछवाड़े वाली सड़क की ओर बढ़ने लगा, ताकि कुत्ते व्यर्थ ही न उठ जाएँ। अब वह गाँव की सरहद से निकलकर उस बाहरी सड़क पर मुड़ गया था, जो पहाड़ों की तरफ जा रही थी।
कल इसी रास्ते पर पुरानी जीन में सजे इसी घोड़े पर, गर्मी के कारण दरक चुकी घोड़ा गाड़ी में, चोरदोन लकड़ियाँ लेकर घर लौटा था। सर्दियों के लिए ईंधन इकट्ठा करना जरूरी था।
उसने छोटी घाटी के मुहाने पर सूख चुकी झाड़ियों को काटकर गाड़ी पर लाद दिया था और घोड़े की जीन पर बैठकर बड़े इत्मीनान से गाड़ी के दोनों तरफ के डंडों पर आराम से पैर रखकर झपकियाँ लेते हुए इसी रास्ते पर चलता रहा था। इस दौरान पहिये अपने स्वभाव के अनुसार टूटी-फूटी सड़कों की चुगलियाँ करते हुए गड़गड़ाते रहे और गाड़ी भी चरमराती हुई बढ़ती जा रही थी। दिन शान्त और गर्म था।
शरद ऋतु में एक समय ऐसा आता है, जब ठंड की रफ्तार दिन-प्रतिदिन तेज़ होने लगती है। लेकिन इससे पहले, जैसे कि विदाई के समय, दिन असाधारण चमक और स्वच्छता की रौनक लिए होते हैं। पहाड़ी से इस बार आसपास का पूरा परिदृश्य साफ-साफ नज़र आ रहा थाः घाटी में अँधेरे में डूबे गाँव के बीच पारदर्शी चमक बिखरते हुए बाग और घरों की सफेद दीवारों के साथ लाल भूरे रंग के सूखे हुए तँबाकू के बाग़ान, पतझड़ की जुताई करते हुए ट्रैक्टर, आकाश में ऊँचाई पर उड़ते चाँदी की तरह चमकते हवाई जहाज, क्षितिज पर कबूतर के स्लेटी रंग जैसी शहर की समतल भूमि के ऊपर स्थिर धुएँ की चादर। और पूरी इस धरती के ऊपर कोई तेज़, काली चिड़ियों से घिरी शाँत लहर उड़ रही थी।
चोरदोन जानता था ः ये अबाबील चिड़ियाँ थीं। जब सुबह वह लकड़ियों के लिए जा रहा था, अबाबील चिड़ियाँ समूहों में टेलीग्राफ लाइन के ऊपर एक साथ उड़ रही थीं। फिर वे लम्बी-लम्बी कतारों में आमने-सामने बैठ गईं। ऐसे प्रतीत हो रहा था, जैसे कि वे एक ही तरह की सफेद छाती वाली, एक ही साँचे में ढले सिर वाली हों और दो शाखाओं वाले चमकते तीरों जैसी पूँछ वाली एकदम बिना हिले-डुले बैठी थी। वे शाँत बैठी थीं, कभी-कभी थोड़ा चहचहाते हुए जगह बदल लेती थीं और लग रहा था, जैसे किसी खास वक्त का इंतजार कर रही हों कि सब एक साथ उड़ान भरें और अपने गंतव्य की ओर उड़ चलें। इन अबाबील चिड़ियों की मँडली में कोई तो अनुष्ठान था, जिसके रिवाजों की सख्ती ने उनके बेदाग सौंदर्य को बाँध रखा था। "ये तुम्हारे लिए नहीं कह सकते गौरैया" - अहंकार से चोरदोन ने सोचा। और फिर, देखते ही देखते उसकी आँखों के सामने अबाबील चिड़ियाँ उड़ चलीे। उन्होंने धरती के ऊपर विदाईपूर्ण चक्कर लगाये, जहाँ उन्होंने गर्मियाँ बिताई थीं - वे हवा में शाँत लेकिन फुर्ती से उड़ते हुए सूरज के सामने चमकता हुआ एक विशाल काले चमचमाते झुँड की तरह लग रही थीं।
चोरदोन ने देर तक उनकी उड़ान शैली का अवलोकन किया। इस झुँड ने एक बार फिर शरद ऋतु के बाग के ऊपर एक और बड़ा चक्कर लगाया, पंख फड़फड़ाए और आपस में मिलकर फिर से सभी चिड़ियाँ कतार में आ गईं और तेज़ी से बड़े मैदानों की तरफ बढ़ चलीं। समूह धीरे-धीरे छोटे से छोटा होता चला गया, नीले आकाश में धुँधलाता हुआ, जैसे खुली जगह में दूर गूँजता हुआ गीत, और अंततः एक काले बिंदु में परिवर्तित हो गया। अबाबील चिड़ियाँ अज्ञात स्थान की ओर उड़ चली थीं। उन्हें सुबह को ही देखा जा सकता था। उन्हें सराहा जा सकता था, उनकी चहचहाहट सुनी जा सकती थी। और फिर कोई अजीब सी मीठी और उदासी भरी उतावली लहर आत्मा में उमड़ने लगी। आँसुओं ने आँखों को धुँधला सा कर दिया, बूढ़े को अब कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था, पर वह फिर भी आकाश की ओर देखे जा रहा था और गहरी साँस लेते हुए पता नहीं क्या सोच रहा था, किसी अपने सगे और करीबी के बारे में जिसके लौटने की कोई उम्मीद नहीं थी। अगर जवान होता, तो वह अवश्य विदाई का गीत गाता।
चोरदोन अपने विचारों से जागा, जब उसे पास से किसी जानवर की पदचाप सुनाई दी। एक आज्ञाकारी, फुर्तीले घोड़े पर कोई पहाड़ी पर चढ़ रहा था। चोरदोन उसे तत्क्षण नहीं पहचान पाया। लगता है, वह शायद पड़ोस के गाँव का बूढ़ा सापाराली है। दोनों एक-दूसरे को ज़्यादा नहीं जानते थे, कभी-कभी अंतिम संस्कारों या उत्सवों पर मिल जाते थे, एक-दूसरे का अभिवादन करते थे और इसके साथ ही दोनों एक-दूसरे से अनजान हो जाते थे। देखने से लग रहा था कि सापाराली कहीं मेहमान बनकर जा रहा है। उसने मखमल का नया चोगा, नए ऊँचे जूते और उसके ऊपर तेज नुकीले जूते, सिर पर लोमड़ी की रोयेंदार खाल की टोपी पहनी थी और हाथ में रक्तकोल (रोवन वृक्ष) के हत्थे वाला चाबुक था।
"क्या सोच रहे हो, लोहार?" सापाराली ने ज़ोर से मधुर आवाज़ में उसे पुकारा और लगाम खींच दी।
हाँ, कभी चोरदोन लोहार होता था।
"अबाबील चिड़ियाँ जा रही हैं।" चोरदोन ने आत्मचिंतन करते हुए कहा।
"क्या? अबाबील? कहाँ हैं?"
"उड़ गईं।"
"ठीक है, जाने दो उन्हें अपने रास्ते। तुम ईंधन के लिए लकड़ियाँ ले जा रहे हो?"
"हाँँ सर्दियों के लिए। और तुम किधर जा रहे हो?"
गुलाबी से, अभी भी जवान से, काली दाढ़ी वाले सापाराली के मुख पर एक मनोहर सी मुस्कान फैल गई ः
"बेटे के पास। वह अकसाये शहर में, ऊँचे पहाड़ों की तलहटी पर बसे सामूहिक फार्म का निदेशक है।" कहकर सापाराली ने ज़ोर से चाबुक को लहराते हुए उस ओर इशारा किया।
"सुना है मैंने, अकसाये के बारे में सुना हैै", चोरदोन ने सिर हिलाते कहा।
"इसलिए जा रहा हूँ। बेटे ने किसी के मार्फ़त संदेश भिजवाया है, अच्छा होगा, अगर पिताजी एक-दो दिन के लिए आ जाएँगे अगर, उसने कहााा। हालाँकि वे लोग वहाँ साहब हैं, पर हम बूढ़ों के बिना, उनका काम नहीं चलता। पोते की शादी हो रही है। मुझे शादी के लिए तैयारियाँ करवानी है, रीति-रिवाजों के साथ। बहुत सारे मेहमान होंगे, घुड़दौड़ का बंदोबस्त करना होगा।।
और फिर सापाराली ने अपने बेटे के सामूहिक फार्म में होने वाले कार्यों के बारे में विस्तार से बताना शुरू कर दिया कि आजकल बढ़िया ऊन काटी गई है, गड़ेरियों को बड़े-बड़े इनाम दिए गए हैं, लोग अपने नए प्रबंधक से खुश हैं। एक अच्छी अफवाह यह भी है कि उसका नाम पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया है।
सब कुछ बढ़िया था, पर चोरदोन तो कुछ और ही सोच रहा था। उसे अचानक लम्बे समय की पहले की अपनी उदासी, जो आत्मा की गहराई में आजीवन चुप्पी के साथ दफ़नाई हुई थी, सुनाई देने लगी थी, पर हमेशा के लिए जिं़दा वह उदासी एक बार फिर अकस्मात् उसे अंदर तक टीस देने लगी थी, जो अब अबाबील चिड़ियाँ के उड़कर चले जाने से महसूस हो रही थी। अब वह उदासी जलती हुई लौ की तरह उसके सीने में नया जोश भरने लगी थी। उसकी यह उदासी बेटे के लिए थी। हाँ, उसके लिए, जो अरसे पहले इस दुनिया से चला गया था। उसने भी कभी अकसाये शहर के पास काम किया था और उसने भी तो अपने पिता को अपने पास आकर कभी मिलने का निमंत्रण दिया था। और यह सोचे-समझे बिना कि वह आगे क्या कहने जा रहा है, उसने बेपरवाही से सापाराली की बात को काटते हुए कहा ः
"मुझे भी मेरे बेटे ने आमंत्रित किया था।"
"तुम्हारा बेटा भी वहाँ है क्या?"
हाँँ- उत्तेजित होकर चोरदोन फुसफुसाया।
"पर मैं नहीं जानता था", सापाराली ने भोलेपन से कँधा झटकते हुए कहा, "अगर ऐसा है, तो अच्छा है। वे जहाँ भी रहें, भगवान उन्हें स्वस्थ रखे। अलविदा!" इन शब्दों के साथ सापाराली ने घोड़े को हिलाया।
जैसे ही वह वहाँ से गया, चोरदोन होश में आ गया। खामोशी और गहरा गई। शून्यता के गर्जन से वह अंदर तक हिल उठा ः मैंने ये क्या कह दिया?
ऐसा झूठ, जो सच से बहुत दूर है! क्यों?...ंं
चोरदोन रास्ते पर उतर गया और सापाराली के पीछे दौड़ पड़ा।
"रुको, रुको, सापाराली!" वह चिल्लाया और उसके पीछे-पीछे दौड़ा, ताकि वह उससे माफ़ी माँग सके और सच्चाई बता सके।
सापाराली ने घोड़े को वापस मोड़ दिया।
"क्या हुआ तुम्हें?" उसने चिंता व्यक्त की।
चोरदोन दौड़ता-हाँफता गया, वह उसे सब कुछ साफ-साफ बताना चाहता था, पर तभी फिर से किसी अदृश्य शक्ति ने चोरदोन को सच्चाई बताने से रोक दिया। यह शक्ति उसे अपने बेटे को जीवित रूप में देखने की इच्छाशक्ति थी, जो उसकी जुबान पर पुनः हावी हो गई थी। वह दोबारा उसे वहीं दफ़नाना नहीं चाहता था। उसकी यह बताने की हिम्मत नहीं हुई कि बेटा बरसों से नहीं है, वह बरसों पहले युद्ध में शहीद हो गया था। उसकी इच्छा थी कि बेटा, थोड़ी देर के लिए ही सही, अभी और जीये। बाद में बता देगा, बहुत समय है...
"क्या तुम्हारे पास तँबाकू है? है, तो कृपया दो। इसके बिना मैं मर रहा हूँ।" चोरदोन ने आग्रह किया।
"ओह, तेरे दुश्मन तुझे तबाह कर दे, भगवान ही तेरा मालिक है, तुमने तो मुझे एकदम से डरा ही दिया था!" सापारपाली ने चैन की साँस ली और तँबाकू के लिए अपनी जेब में हाथ डाल दिया।
"लाओ अपना हाथ बढ़ाओ। मैं जानता हूँ कि तँबाकू एक बुरी लत है", उसने काँच की शीशी से चोरदोन के हाथ में तँबाकू पलटते हुए कहा - "ये क्या तुम्हारा हाथ काँप रहा है, लोहार? बूढ़े हो गये हो।"
"हाँ, हथौड़े से बहुत लड़ाई लड़ी है, बुढ़ापा इस वजह से आया हैै", चोरदोन ने जवाब दिया। "मुझे माफ़ करना, तुम्हें रोक लिया।"
"ऐसी भी कोई आफ़त नहीं मचा दी। अच्छा, तो मैं चलता हूँ।"
"शुभ यात्रा।" चोरदोन ने कहा।
अब किसी व्यक्ति को और रोकना असहज हो सकता था और चोरदोन तो इस बात से खुश था कि सापाराली जल्दी चला भी गया, और उसे अपने बेटे की मृत्यु के बारे में बताने की ज़रूरत नहीं पड़ी।
सापाराली जब चला गया, तो चोरदोन कुछ देर तक रास्ते में विचारमग्न खड़ा रहा, फिर हथेली खोली, ज़मीन पर तँबाकू झाड़ दी और वापस घोड़ा-गाड़ी की तरफ चल दिया।
वह सिर नीचे किये, धीरे-धीरे चला जा रहा था। "ये मैंने क्या कर दिया, दिमाग खराब हो गया था मेरा!" वह बड़बड़ाया, फिर रास्ते के बीचोंबीच रुक गया। कुछ सोचते हुए चारों तरफ देखा। चौड़े मैदानों के ऊपर फैले ऊँचे आकाश की ओर बहुत देर तक देखता रहा, उस तरफ, जिस तरफ चिड़ियों का झुँड उड़ कर गया था, और फिर बुदबुदाया ः "नहीं, मेरा बेटा जीवित है।" - फिर अचानक पीड़ित भाव से चिल्लाया ः "मेरा बेटा है, मैं भी अपने बेटे के पास जाऊँगा, मैं उसे देख पाऊँगा, देखूँगा!" - और फिर शाँत हो गया।
गाँव के पूरे रास्ते चोरदोन खुद को दिलासा देता रहा, मुझे चिंता नहीं करनी चाहिए, जो बीत गया, नहीं लौटेगा। फिर भी उस बस्ती तक जाने की इच्छा उसके अंदर आग की तरह लपटें उठाती रही। यह तो होना ही था।

यह आग उसके सीने में लम्बे समय से सुलग रही थी, कई वर्षों से। वह अक्सर सोचता, अच्छा वक्त लौटने के सपने देखता, वहाँ जाकर सजदा करने के अवसर तलाशता जहाँ बेटे ने सेना में जाने से पहले अपने आखिरी दिन बिताए थे। और सापाराली से मुलाकात तो महज संयोग से उठी हुई एक चिंगारी थी। अब चोरदोन के दिमाग में ठोस समाधान तलाशने के बजाय बेटे के जिं़दा होने की कल्पना घर कर गई थी। वक्त-साल बड़े अजीब तरीके से अचानक बदल चुके थे। कल्पना हकीक़त में बदल गई और मन में गढ़ी हुई बात सच साकार होने लगी। वह कल्पना करने लग गया था कि उस बस्ती में पहुँचेगा, कैसे अपने बेटे से मिलेगा, वे लोग किस बारे में बात करेंगे। मुझे देख वह बहुत खुश होकर बोलेगा कि आखिरकार आप आ ही गए! - और मेरे पास आ जाएगा।

- द्वद्वआ गया, मेरे प्यारे, सुखी रहो। तुम वैसे के वैसे ही हो। और मैं बूढ़ा हो गया हूँ, जैसा कि तुम देख रहे हो।।।

- द्वद्वअरे नहीं, पिताजी, इतने भी बूढ़े नहीं हुए हो आप, केवल समय ही बहुत बीत गया है। इतने लम्बे समय तक क्यों नहीं आए? कितने बरस बीत गएः बीस, या और फिर इससे भी अधिक। या फिर आपको मेरी याद ही नहीं आई?ईई

- द्वद्वयाद कैसे नहीं आई! पूरी जिंदगी तरस रहा हूँ। तुम्हें इतने लम्बे समय इंतज़ार करवाया, फिर भी कुछ कर नहीं पाया, इसके लिए तुम मुझे क्षमा कर दो। तुम तो जानते हो, तुम्हारी माँ का देहांत हो गया और उसे दफना भी दिया। जब तुम्हारे युद्ध में शहीद होने की खबर मिली, उसके बाद से ही उसने बिस्तर पकड़ लिया था और फिर कभी नहीं उठी। और अब मैं आया हूँ तेरी याद को सम्मान देने। मैं उन लोगों के सामने सिर झुकाने आया हूँ, जिनके बीच तू रहता था। इस धरती को, इन पहाड़ों को, हवा को, जिसमें तुम साँस लेते थे, पानी, जिसे तुम पीते थे, उन सब का आभार जताने और यही सब देखने के लिए आया हूँ, मेरे बेटे। तुम क्या देख रहे हो, चलो मुझे ले चलो, मुझे अपना स्कूल दिखाओ, बस्ती दिखाओ। तुमने उसके बारे में बहुत कुछ बताया है...ैै

चोरदोन उस शिकारी को याद करने का विफल प्रयास कर रहा था, उसे उसका नाम तक याद नहीं आ रहा था, जिसके घर में उसका सुल्तान रहा था। बस इतना जानता था कि वह एक अच्छा इंसान था, बेटा उसे बहुत पसंद करता था। अब, उसकी उम्र करीब सत्तर के आसपास होनी चाहिए, ज़िन्दा है या मर चुका है? उसने कई बार बेटे के मार्फ़त सूचना भिजवाई थी कि चोरदोन यहाँ आकर मेहमान बन कर रहे। फिर मिलकर हम चालाक सुनहरे बाज़ का शिकार करेंगे। क्या ऐसे सुनहरे बाज अभी भी हैं? बाज़ वैसे ज़्यादा समय तक जीता है।

मेरे ख्याल से बेटा शिकारी के पास रहता था। सुलतान पहली कक्षा में था और जब दूसरी में गया तो युद्ध शुरू हो चुका था। वह वहाँ परिवार के सदस्य की तरह ही हो गया था। शिकारी की पत्नी एक दयालु महिला थी। पर उसे कठिनाइयों का सामना करना पड़ता थाः कोलखोज़ (सामूहिक फार्म) में भी और घरेलू कार्यों में भी। उसने सुल्तान से किसी तरह से भी शिकारी कुत्तों का एक जोड़ा पिता के पास रख आने का आग्रह किया था। शिकारी कुत्तों के इतने बड़े झुँड के लिए दलिया बनाना कष्टप्रद लगता था। सुल्तान ने ऐसा ही किया। वह अपने साथ एक सफेद शिकारी कुत्ता, जिसके दोनों तरफ पीले धब्बे थे, ले आया। ओह, क्या कुत्ता था वह! विशाल बर्फीले पहाड़ों पर ही ऐसे खूबसूरत, फुर्तीले शिकारी कुत्ते हो सकते हैं, अबाबील की तरह। वे ही जंगली बकरों को खदेड़कर फंदों में फंसाने में सक्षम हो सकते हैं। और सुबह सुल्तान कुत्ते को वापस ले गया। उसने कहा था, ााकुत्तों का मालिक बहुत नाराज़ हो जाएगा। बेहतर होगा कि मैं दलिया बनाने में ही मदद कर दूँ। और वह लाजवाब शिकारी कुत्ता उसकी साइकिल के पीछे-पीछे भागता चला गया था। चोरदोन को कुत्ते से बिछड़कर अफ़सोस तो हुआ, पर वह जानता था कि शिकारी के लिए कुत्ते की कितनी अहमियत होती है। वह तो लोहारी के काम तक ही बँधकर रह गया था। निशाने पर सटीक निगाह रखने वाले ये सफेद किर्गीज़ शिकारी कुत्ते कहीं बदल तो नहीं गए, या अब भी लोमड़ियों का पीछा करते हैं?

यही सब सोचते-सोचते चोरदोन को यहाँ आने की एक और ठोस वजह मिल गई। ।हाँ, मुझे इस आदमी के पास जाना चाहिए। अगर इस दुनिया में नहीं है, तो उसकी कब्र पर ही सिर झुकाकर श्रद्धांजलि दे आऊँगा। और अगर जीवित है, तो उससे हाथ मिलाऊँगा, बेटे की देखभाल करने के लिए हृदय से उसका आभार व्यक्त कर आऊँगा।।

सिर्फ़ एक परिस्थिति के बारे में सोचते हुए चोरदोन ने खुद को रोक लिया। जैसे ही यह विचार कौंधा, कई तरह की जिम्मेदारियों और चिंताओं ने उसे उलझा दियाः वह हिसाब-किताब करने में निमग्न हो गया कि आने वाली सर्दियों में आलू और अनाज का क्या भाव रहेगा, कब भेड़ को काटूँगा, बछड़े को रख लेना चाहिए या बेच देना चाहिये...

वह जानता था कि यह सब पहले से सोचकर रखा हुआ है, इसलिए कुछ भी सोचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, लेकिन चाहकर भी ऐसा नहीं कर पा रहा था। खुली आँखों में गुज़ार देने वाली उन रातों को ये विचार लोहारखाने में अहरन पर हथौड़े की तरह चोट करते थे, भट्ठी में पिघलते थे और फिर पानी में छन्न की आवाज़ के बाद शाँत और सख्त बनते थे। अपने बारे में तो उसने अरसा पहले से ही निर्णय कर रखा था कि भगवान ही न्याय करेगा कि वह सही था या गलत..। और अगर उसे दूसरी दुनिया में बेटे से मिलने का मौका मिलेगा, तो वह उसे सब कुछ बताएगा, यह सब कैसे हुआ...पर उससे क्षमा की अपेक्षा नहीं करेगा, कदापि नहीं। जब उसकी शहरी बेटियों ने उसके मुख पर उसे बुरा-भला कहा था, तब भी चोरदोन को कोई मलाल नहीं रहा था, वह चुप ही रहा था।

और वे अभी तक उस भयानक घटना के लिए उसे माफ़ नहीं कर पाई हैं। यह घटना सुल्तान को युद्ध पर भेजने वाले दिन शहर के स्टेशन पर
घटी थी।

1941 के अक्टूबर महीने में लोहारखाने में एक व्यक्ति चोरदोन के पास दौड़ता हुआ आया था और कहने लगाः जल्दी से घर जाओ, बेटा तुमसे विदा लेने आया है। चोरदोन जले हुए काले पड़े चुके लोहारी वस्त्र में ही दौड़ पड़ा था। कानों में अब भी अहरन और हथौड़े की चोट गूँज रही थी। वह तेज़ी से कदम बढ़ाते हुए चला जा रहा था लेकिन उसे बिल्कुल यकीन नहीं हो रहा थाः अभी तो बेटा बहुत छोटा है, क्यों उसे युद्ध के लिए बुला रहे है? पर सच में ऐसा ही हुआ, सुल्तान जिले के केंद्र से किसी के घोड़े पर चढ़ बीमार माँ से मिलने चला गया था। लगभग छह माह से वह स्वस्थ नहीं हो पाई थी। उसने पिता से आग्रह किया था कि उसे विदा करने शहर के स्टेशन पर आ जाएँ। निश्चय ही दोनों न तो बात कर पाए थे और न ही ठीक से एक-दूसरे को विदा कर पाए थे, जैसा होना चाहिए था। कुछ समय भी ऐसा ही था। उतने शब्द भी नहीं कहे गए, जितने विचार दोनों के मन में उमड़ते-घुमड़ते रहे। शायद ही कोई इसे व्यक्त भी कर पाएगा कि उस वक्त दोनों के दिल पर क्या बीता था...

चोरदोन घोड़े को तेज़ी से हाँकते हुए शहर की तरफ बढ़ता गया। करीब तीस किलोमीटर की दूरी ऐसे तय की कि घोड़ा रास्ते में भड़कते-भड़कते रह गया। और पहुँचने के बाद, स्टेशन की तरफ देख वह अवाक्-सा रह गया। स्टेशन के सामने भारी भीड़, भीड़ में आपाधापी मची हुई थी। वहाँ हर तरह के लोगों के अलावा क्या नहीं था! सवारी चढ़ाने वाले लाल पट्टियों वाले ट्रक, घोड़ा-गाड़ी, घास फूस और गेहूँ के भूसों से भरी चार पहियों वाली गाड़ियाँ, खुले और जीन कसे हुए घोड़े, और रेलवे इंजन की गूँज, रेल के डिब्बों की खड़खड़ाहट। इन सबके बीच - गाँव से, बस्तियों से, शहर से आए हुए लोगः बूढ़े, जवान, बच्चे...

चोरदोन ने जल्दी मचाई। जो घोड़ा गाड़ी उसे सबसे पहले मिली, वहीं कई घोड़ों के बीच अपने घोड़े को बाँध दिया और बेटे को ढूँढने चल पड़ा। चलता रहा, लोगों से धक्का-मुक्की करते हुए पूछताछ करते हुए बढ़ता रहा। लोगों ने बताया कि सेना में लड़ाई पर जाने वाले सेनानी स्टेशन के पास वाले पार्क में हैं, उन्हें वहाँ अलग से नियंत्रण में रखा गया है और उन्हें कहीं आने-जाने नहीं दे रहे हैं। जल्दी ही उनकी रवानगी है। वह पार्क की तरफ चल दिया। वहाँ बाड़ के पीछे खँभे बनाए जा रहे थे, आदेश दिए जा रहे थे, हाज़िरी लगाई जा रही थी। चोरदोन उधेड़बुन में पड़ गयाः कैसे यहाँ किसी को ढूँढा जाए? और पेड़ों की वजह से उसे टुकड़ियों में खड़े लोगों को देखना मुश्किल हो रहा था। और फिर अचानक करीब से आवाज़ आईः ःःपिताजी, पिताजी, इधर आइए!एए दोनों बेटियाँ हाथ हिला रही थीं। वे पार्क के प्रवेशद्वार के पास खड़ी थीं। चोरदोन भीड़ को चीरते हुए उनकी तरफ़ आया, तो बाड़े के पीछे जत्थे में उसे अपना बेटा दिखाई पड़ा। बेटे ने भी पिता को देख लिया और मुस्कुराते हुए हाथ हिलाया। वह कुछ सावधानी बरतते हुए संकोच से मुस्कुराया था। बेटे को देख तरस आ गया। बिना मूँछों वाला वह किशोर सिर्फ़ कद से ही दूसरों के बराबर था, कँधों से और शक्ल-सूरत से बच्चा ही था। अभी तो उसका कद और बढ़ना था। चोरदोन बेटे में खुद को देख रहा था, ाबेटे को मजबूत कद-काठी वाला ताकतवर मर्द बनना चाहिए। बमुश्किल दो साल में ही वह सुगठित नौजवान बनकर निकलेगा।।

बेटे के बारे में सोचते हुए, चोरदोन ने एक बार भी यह समझने की कोशिश नहीं की कि उसमें ऐसा क्या था, किस कारण वह उसकी इज्ज़त करता था। वह उसे सिर्फ प्यार ही नहीं करता था, बल्कि बचपन से ही विवेकी, व्यावहारिक, बुद्धिमान, होनहार और समर्थ इंसान भी था। हालाँकि वह थोड़ा-बहुत शरारती बच्चा भी था। पर चोरदोन को समझ नहीं आता था कि ऐसा क्यों हुआ। खासतौर पर जब से बेटा अध्यापक बना। चोरदोन उसके साथ बड़ी नरमी से पेश आता था, उसके सामने गंभीर रहता, जबकि वह कभी-कभी ही आता था, अपनी लाल पायोनियर टाई निकाले बिना ही आ जाता था। वह बच्चों के पायोनियर कैंप में परामर्शदाता था। नौजवान गर्ममिजाज़ी, रुखा था, पर चोरदोन को लगता था कि वक्त के साथ उसके स्वभाव में बदलाव आ जाएगा। चोरदोन सोचता था कि दूसरों के मामले में दखल नहीं देना चाहिए, उसे सिखाना झँझट का काम है। वह अपना रास्ता खुद ढूँढ लेगा। शायद बेटियों से टकराव की यही वजह थी। वे दोनों ही, बड़ी वाली जेइनेश, छोटीवाली सालीका, शहर में पढ़ती थीं। वहीं शादी कर ली और शहरी हो गईं। वे ही सुल्तान को अपने साथ शहर ले गई थीं, जहाँ उसने शिक्षा-विज्ञान संस्थान में पढ़ाई पूरी की और अब पूरे एक साल से अध्यापक के रूप में कार्य कर रहा था।

चोरदोन आखिरकार जब बेटियों के पास पहुँचा तो पता नहीं क्यों, वे उसे भीड़ से बाहर निकालने लगीं। वे पसीने से भीगी हुई थीं, चिड़चिड़ी हो गई थीं और आपस में फुसफुसाते हुए भाई की बुराई कर रही थीं। उसे बिगड़ैल और बेवकूफ बच्चा कहकर कोस रही थीं। चारों तरफ भीड़ ही भीड़ थी, बेटयिाँ उतावली थीं और खीझ रही थीं। इसलिए चैक पर, भीड़ के बीच ही पिता से कहने लगींः

- द्वआपको पता है, आपका बेटा मनमौजी होता जा रहा है?ै

- द्वनहीं, चोरदोन ने हैरानी से कहा। - क्यों क्या हुआ?आ

- द्वहमने जब सैनिकों की भर्ती करने वाले स्टेशन में फोन किया तो पता चला कि उसने खुद युद्ध में जाने के लिए आवेदन किया था, खुद ही युद्ध में जाने का निर्णय ले लिया। समझे?े

- द्ववह अभी बहुत छोटा है, समझ रहे हो न, कि मैं क्या कहना चाहती हूँ?ँ

- द्वइसका मतलब यही है कि उसे लगा कि उसका वहाँ जाना जरूरी है।।

- द्वज़रूरी है? - और इसी बात पर बेटियाँ अपने पिता के साथ बुरी तरह झगड़ने लगीं। - पिताजी, आपको कैसे समझ नहीं आ रहा? इतना ही काफ़ी नहीं कि हमारे पति भी वहीं हैं। वे लौटकर आएँगे भी या नहीं, पता नहीं। यह समझने के लिए काफ़ी नहीं कि हम अकेली रह गईं, और अब वह भी, परिवार का आखिरी बच्चा, खुद
युद्ध में जाने के लिए उत्सुक है।।

- द्ववह वहाँ चिड़ियाँ के बच्चे की तरह खो जाएगा। वहाँ वह कोई पायोनियर कैंप में सलाहकार नहीं होगा।।

- द्वआप चुप क्यों हैं, पिताजी?ी

- द्वमैं क्या कह सकता हूँ, कर क्या सकता हूँ?ँ

- द्वअभी उसके पास जाइए, हम उनसे निवेदन करते हैं कि आपको जाने दें। उससे कहिए कि ऐसा करने की हिम्मत न करे। अब भी देर नहीं हुई है, उसे मना लीजिए।।

- द्वअब भी वह मना कर सकता है, संभव है। आप ही उसे समझा सकते हैं।।

- द्वनहीं, मेरी बात सुनोो, -चोरदोन ने धीरे से कहा। ।उसे शोरशराबे और भीड़-भाड़ भरे इस माहौल में बेटियों को समझाना मुश्किल हो रहा था कि इस तरह किसी इंसान पर दबाव नहीं डालना चाहिए। अब वह कैसे अपने वादे से मुकर सकता है? वह कैसे उन लोगों से आँखें मिला पाएगा, जो उसके साथ एक कतार में खड़े हैं? सब उसके बारे में क्या सोचेंगे और वह बाद में अपने बारे में क्या सोचेगा?ा

- द्वऐसा ठीक नहीं होगा, वह शर्मिंदा हो जाएगाा, - चोरदोन ने कहा।

- द्वलो इसमें शर्म की क्या बात है!ै

- द्वकिसी को क्या लेना, यहाँ उसे कौन जानता है? हे भगवान! किसे उसके बारे में जानने की पड़ी है?ै

- द्ववह खुद तो अपने बारे में जानता हैै, - चोरदोन ने त्योरियाँ चढ़ाते हुए कहा। - ।यही सबसे महत्वपूर्ण बात है।।

- द्वआह, रहने दो, पिताजी, बच्चा है अभी भी वह। जाओ, जाओ, कहीं देर न हो जाए।।

तभी हलचल मच गई, लोग शोर मचाने लगे, एक तरफ़ को हटने लगे। मार्च के लिए सेना बैंड बजने लगे, लाल झंडा ऊपर उठ गया और पार्क के गेट से सैनिकों के जत्थे बाहर निकलने लगे। ट्रेन में चढ़ने की घोषणा हो गई थी। बेटियाँ चोरदोन को बाजू से पकड़कर जल्दी जल्दी चलने को कहने लगीं, सैकड़ों आवाज़ों और संगीत के साथ-साथ वे भी चिल्लाकर बोलने लगीः

- द्वजल्दी से कमिश्नर के पास चलते हैं। वह स्टेशन पर है, आपको बेटे को बचाना चाहिए।।

- द्वपिताजी चलिए, हमारी बीमार माँ की खुशी के लिए! कमिश्नर को माँ के बारे में बताइए कि वह मृत्युशैय्या पर है।।

ये शब्द सुनकर चोरदोन विचलित हो गया। बेटियाँ उसे विदा करने आए लोगों की भीड़ के बीच से खींचते हुए स्टेशन की तरफ ले गईं, जहाँ सेना में भेजने वाला कमिश्नर था।

पत्थर की ऊँची सीढ़ियाँ प्लेटफार्म से ऊपर स्टेशन की इमारत तक जाती थीं जहाँ नीचे से ऊपर तक खचाखच भीड़ थी। पर बेटियाँ उसे गर्म, पसीने से भरे जिस्मों के बीच से, युद्ध के शोक, बिछड़ने के गम में डूबीं सैकड़ों आँखों के सामने से, ड्रमों को पीटते सैनिकों और सैन्य संगीत के शोरगुल में प्लेटफार्म पर अलविदा कहते सैनिकों की चीखों के बीच से, चोरदोन के अपने दर्द और आत्मा की मौन चीख से बाहर निकालते हुए ऊपर लिए चली जा रही थीं।

हालाँकि वह बखूबी जानता था कि बहनें अपने भाई की सिर्फ भलाई चाहती हैं, उसकी और परिवार की बेहतरी चाहती हैं, बड़ी बहनें होने के नाते उसे प्यार करती हैं, उसकी रक्षा करती हैं, फिर भी उसके मन में बेटियों के प्रति एक अनसुना सा आक्रोश उत्पन्न हो गया। वह सोचने लगा कि यद िवह अपने बेटे की इच्छाशक्ति और उसके स्वतंत्र कदम को जकड़ देगा तो वह उसके आत्मसम्मान का अंत कर देगा। बेटियाँ उसे ऊपर खींचती ले जा रही थीं, उबलती हुई भीड़ के बीच से सीढ़ियों पर रास्ता बनाते हुए। वहीं ऊपरी सीढ़ी पर चोरदोन को मार्च करती सेना की आखिरी टुकड़ी दिखी, जिसमें उसका बेटा भी था। टुकड़ी को सेना बैंड ने घेर लिया था, यह ट्रेन पर चढ़ने वाला आखिरी दस्ता रह गया था। सुल्तान आखिरी पँक्ति में चल रहा था, चोरदोन ने उसे झट से पहचान लिया, उसने देखा कि कैसे वह इधर-उधर नज़रें घुमाते हुए अपने पिता और बहनों को ढूँढ रहा था। उसे क्या पता था कि उसे मुक्त कराने का अनुरोध करने, उसे अपनी ही नज़रों में गिराने और उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने के लिए पिता को इस क्षण कमिश्नर से मिलाने के लिए खींचकर ले जाया जा रहा है।

फिर चोरदोन ने देखा, भीड़ से निकलकर एक लड़की लाल स्कार्फ में भागती हुई आई, सुल्तान की ओर झटपट दौड़ गई। पर उसे तुरंत हटा दिया गया और वह सिर्फ उसे हाथ हिलाती ही रह गई।

वे लोग स्टेशन के प्रमुख के केबिन तक पहुँच गए, जहाँ कमिश्नर बैठा था। बेटियों ने उसे दरवाजे की ओर धक्का देना शुरू कर दियाः

- द्वजाओ, जल्दी जाओ, कहना कि तुम पिता हो, माँ के बारे में बताना। कहना कि उसे समझ नहीं, बच्चा है अभी। विनती करना कि कृपया उसे ट्रेन से उतार दें। सब कुछ उसे स्पष्ट बता देना।।

- द्वजाइए पिताजी, देख क्या रहे हैं! एक-एक मिनट कीमती है।।

चोरदोन को लोगों के सामने शर्मिंदगी महसूस होने लगी, हालाँकि उसके ऊपर किसी का भी ध्यान नहीं गया था। युद्ध से जुड़े और आम नागरिक बेचैन होकर इधर-उधर भाग रहे थे।

- द्वमेरे लिए ऐसा करना ठीक नहीं, नहीं जा पाऊँगाा, - चोरदोन ने साफ़ मना कर दिया।

- नहीं, आपको जाना होगा।

- अगर नहीं जाएँगे तो हम खुद चले जाएँगे। हम खुद यह कर लेंगे। कहते हुए अधीर बेटियाँ झटपट कमिश्नर के दरवाजे पर पहुँच गई।

- ऐसी कोशिश भी मत करो, अंदर मत जाओ! - चोरदोन ने उन्हें हाथों से पकड़ा और बाहर को खींच लिया।

वह उनको पूरी ताकत लगाकर फिर से उसी भीड़ से होते सीढ़ियों से खींचते नीचे ले गया। और तब उसने उनके मुँह से ऐसा सुना, जो शायद ही कोई अपने बच्चों से सुनता होगाः

- द्वआप अपने बेटे को मौत के मुँह में भेज रहे हैं!ं - ंधिक्कार है आप पर, आप हमारे पिता नहीं।।

- द्वहाँ, आप हमारे पिता नहीं!ं - दूसरी ने समर्थन किया।

सफेद पड़े चोरदोन ने धीरे-धीरे अपनी भींची हुई अँगुलियाँ खोलीं, उनके हाथों को छोड़ दिया, चुपचाप मुड़ गया और लोगों को धकेलते हुए प्लेटफार्म की तरफ़ चल दिया। वह अपने बेटे से विदा लेने के लिए तेज़ी से आगे बढ़ा, इंसानों की भीड़ से निकलते हुए प्लेटफार्म की तरफ, शोर और चीखों को चीरता, प्लेटफॉर्म पर लगी ट्रेन की तरफ। पर वहाँ का प्रवेश तो पहले ही बंद कर दिया गया था। लोगों की भीड़ काली लहर की तरह हिलोरें मार रही थी, सेना का बैंड बज रहा था, वहाँ पैर रखने तक की जगह नहीं थी।

चोरदोन प्लेटफॉर्म की सलाखों से चिपका रहा, लम्बी कतारों वाले लाल डिब्बों के ऊपर उसे नरमुंडों का समुद्र नजर आ रहा था।

- द्वसुल्तान, सुल्तान, मेरे बेटे, मैं यहाँ हूँ। तुम मुझे सुन रहे हो?ो - वह बाड़े से अपने हाथ निकालकर उठाते हुए ज़ोर से चिल्लाया।

पर वहाँ चिल्लाने से क्या फायदा? पास खड़े एक रेलवे कर्मचारी ने उससे पूछाः

- द्वतुम्हारे पास घोड़ा है?ै

- द्वहाँ हैै, - चोरदोन ने जवाब दिया। - ।और जानते हो, रेलवे-यार्ड कहाँ है?ै

- द्वजानता हूँ, उस तरफ है।।

- द्वतो फिर ऐसा है पापा जी, घोड़े पर बैठो और सरपट दौड़ जाओ।।

- द्वतुम पहुँच जाओगे, करीब पाँच किलोमीटर होगा, उससे ज्यादा नहीं। ट्रेन वहाँ एक मिनट रुकेगी, वहाँ पर बेटे से विदा ले लेना, बस जल्दी दौड़ जाओ, एक पल भी रुको नहीं।।

चोरदोन प्लेटफॉर्म पर तब तक दौड़ता रहा, जब तक उसे अपना घोड़ा नहीं मिल गया। उसे याद भी नहीं कि उसने कैसे उछलकर घोड़े की लगाम की गाँठ खोली, कैसे रकाब पर पैर रखे, कैसे उसने घोड़े के पुट्ठे पर चाबुक मारी और झुकते हुए रेलवे लाइन की तरफ तेज़ी से निकल पड़ा। सुनसान खड़खड़ाती सड़क पर इक्का-दुक्का लोगों को झकझोरते हुए घोड़े को बँजारे की तरह बिजली की गति से दौड़ा रहा था। ।।किसी तरह से बस पहुँच जाऊँ, बस मैं पहुँच जाऊँ, बहुत कुछ कहना है बेटे से!ेे - उसने सोचा और अपने भींचे हुए दाँतों को खोले बिना प्रार्थना की और घुड़दौड़ में हिस्सा लेने वाले घुड़सवारों का मंत्र पढ़ने लगा। ।।मदद करो मेरी, मेरे पुरखों की आत्माओं। मेरी मदद करो, घोड़ों के आका काम्बार-आता (किर्गीस्तान में घोड़ों का भगवान) घोड़े को लड़खड़ाने न देना! इसे बाज़ के पंख दे दो, उसे लोहे का दिल दे दो, उसे हिरण के पैर दे दो, उसे मछली के फेफड़े दे दो!ोो

सड़क पार करने के बाद, चोरदोन रेल पटरी पर कूद गया और फिर घोड़े को फाटक से निकाला। रेलवे-यार्ड तक थोड़ी ही दूरी बची थी, जब उसे ट्रेन का शोर पीछे आता सुनाई पड़ा। दो भाप इंजनों की भारी-भरकम गड़गड़ाहट वाली ट्रेन, मानो पहाड़ों का भूस्खलन झुके हुए चैड़े कँधों पर आ गिरा हो।

ट्रेन ने उछलते हुए चोरदोन को पीछे छोड़ दिया। घोड़ा बहुत थक चुका था। पर उसे उम्मीद थी कि वह पहुँच जाएगा, बस ट्रेन रुक जाए। रेलवे-यार्ड ज्यादा दूर नहीं रह गया था। कहीं ट्रेन रुके ही नही तो, इस चिंता और डर ने उसे भगवान को याद करने के लिए मजबूर कर दिया थाः

द्वद्वमहान ईश्वर, अगर तुम धरती पर हो, तो रोक दो इस ट्रेन को! प्रार्थना करता हूँ तुमसे, रोक दो, रोक दो ट्रेन को!ोो

ट्रेन पहले ही रेलवे-यार्ड पर खड़ी थी, जब चोरदोन पिछले डिब्बों से होता बढ़ रहा था। और बेटा ट्रेन के साथ-साथ दौड़ता आया, अपने पिता से मिलने। उसको देख, चोरदोन घोड़े से कूद गया। वे दोनों सब कुछ भूलकर चुपचाप एक-दूसरे के गले से लग गए।

- द्वपिताजी, आप मुझे क्षमा कर दो, में अपनी मर्जी से जा रहा हूँँ, - सुल्तान ने कहा।

- द्वमैं जानता हूँ, बेटा।।

- द्वमैंने अपनी बहनों को नाराज़ किया है, पिताजी। अगर वे इस अपमान को भूल सकें तो अच्छा होगा।।

- द्वउन्होंने तुम्हें माफ़ कर दिया है। तुम उनकी बात का बुरा नहीं मानना, उन्हें भूलना नहीं, उन्हें लिखते रहना, सुन रहे हो न। और माँ को मत भूलना।।

- द्वठीक है, पिताजी।।

स्टेशन पर एक घंटा बजा, अलग होने का, बिछड़ने का समय आ गया
था।

आखिरी बार पिता ने अपने बेटे का चेहरा देखा और उसमें उसने एक पल के लिए अपने ही नयन नक्श, खुद को महसूस किया, जो अभी भी जवान है, अभी तो जवानी की शुरुआत में ही है। उसने उसे कसकर अपने सीने से लगा लिया। और उस एक मिनट वह पूरे दिल से अपने बेटे को पिता का प्यार देना चाहता था। उसे चूमते हुए, चोरदोन ने वही बात दोहराईः

- द्वइंसान बनके रहना, मेरे बेटे! चाहे जहाँ भी रहो, इंसान बनकर रहना! और हमेशा इंसान बने रहना!ा

डिब्बों में कँपन हुई।

- द्वचोरदोनोव, चलो हम चल रहे है!ै - कमांडर ने ज़ोर से पुकारा।

जब सुल्तान को चलती हुई ट्रेन की बोगी में खींचा, चोरदोन ने हाथ नीचे कर लिए और फिर मुड़ गया, पसीने से भरे घोड़े की गर्म बालों वाली गर्दन पर सिर रखकर सिसकने लगा। वह घोड़े की गर्दन पकड़कर इतनी ज़ोर से काँपने लगा कि उसके गहरे दुख के भार से घोड़े के पैर डगमगाने लगे।

रेलवे कर्मचारी चुपचाप पास से निकलते रहे। वे जानते थे कि क्यों लोग उन दिनों रोते थे। सिर्फ़ स्टेशन के बच्चे शाँतिपूर्वक और बालसुलभ कौतुहल और जिज्ञासावश अपने बुजुर्ग को रोते हुए देख रहे थे।

चोरदोन जब छोटी पहाड़ी के सँकरे रास्ते से गुज़र रहा था, तब सूरज पहाड़ों के ऊपर चिनार के दो वृक्षों के बराबर उठते हुए ऊँची-नीची पर्वतीय घाटी के चैड़े खुले मैदान में निकल चुका था। यह घाटी भारी बर्फ़ के पहाड़ों के नीचे फैली हुई थी। वहाँ के आभामंडल ने मानो चोरदोन को जकड़ लिया था - हो भी क्यों न, इस धरती पर उसका बेटा जो रहता था।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 15.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^