ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
आषाढ़ का एक दिन तर्क और दीवानगी के बीच का संवाद
01-Apr-2019 09:22 PM 162     

मणिकौल (1944-2011) का सिनेमाई सफ़र चेतना के आंकड़ों के विरुद्ध का सफ़र है। इक्कीसवीं सदी का यह दूसरा दशक जब लगभग ख़त्म हुआ चाहता है और भारत में धर्म और आस्था अपनी नई परिभाषाओं में आकार ग्रहण करती हुई मौजूद होती जा रही है, जहाँ आंकड़ों की भयावहता एक "नया खेल" रच रही होती है, ऐसे में मणिकौल जैसे फ़िल्मकार को याद करना "तर्क" के लिए जगह बनाने जैसा होता है। मणिकौल का सिनेमाई सफ़र मोहन राकेश की कहानी और नाटक से आरंभ होता है। 1969 में मोहन राकेश की कहानी "उसकी रोटी" पर "उसकी रोटी" नाम से और मोहन राकेश के "आषाढ़ का एक दिन" नाटक पर 1971 में इसी नाम से मणिकौल ने फिल्म बनाई। दोनों फिल्मों का आस्वाद अलग है और यह "अलग" होना मणिकौल की अपनी एक खास विशेषता है। मणिकौल की यह दूसरी फिल्म थी जो मोहन राकेश द्वारा 1958 में लिखे गए नाटक पर आधारित थी। बतौर नाटक अपनी अनेक प्रस्तुतियों में "आषाढ़ का एक दिन" सफलता के कई कीर्तिमान स्थापित कर चुका था। मणिकौल ने जब इस नाटक को अपनी फिल्म में ढ़ाला तो लगभग 159 मिनट 02 सेकेंड तक परदे पर पसरी हुई यह फिल्म दर्शक के माध्यम से अपने समय और समाज से सांस्कृतिक संवाद कायम करती हुई हमारे सामने आकर खड़ी नहीं होती बल्कि हमें उसके सामने खड़ा होना पड़ता है। दरअसल, मणिकौल कि फिल्म दर्शकों के पास नहीं जाती बल्कि दर्शक को उसके पास चलकर जाना होता है। माना जाता है कि मणिकौल सिनेमा के टैबू से आजादख्याल फ़िल्मकार रहे हैं। वे, सिनेमा के किसी व्याकरण पर यकीन नहीं करते, वे नहीं मानते हैं कि सिनेमा का कोई व्याकरण भी होता है। सिनेमा अपने निर्माण के साथ खुद के लिए व्याकरण रचता चलता है और यह हर सिनेमा के लिए अलग-अलग होता है। मणिकौल पर यह प्रभाव रसियन फ़िल्मकार तार्कोवस्की (1932-1986) के यहाँ से आया है। तार्कोवस्की ने अपने जीवन की पहली फिल्म महज 19 मिनट की 1956 में "द किलर्स" नाम से विद्यार्थियों के लिए बनाई थी। आगे चलकर तार्कोवस्की, सोलारिस (1972), द मिरर (1975), नॉस्टेल्जिया (1983) जैसी फिल्मों से प्रसिद्धि पाई। दरअसल, तार्कोवस्की फिल्मांकन और उसके शब्दांकन दोनों में संतुलन की धारणा पर यकीन करने वाले फ़िल्मकार की प्रणाली पर कभी बल नहीं देते हैं। साहित्य, सिनेमा और पटकथा के रिश्ते को तार्कोवस्की के देखने का नजरिया पारंपरिक नजरिए से भिन्न है। वे कहते हैं, "मैं पटकथा को साहित्यक शैली नहीं मानता। दरअसल पटकथा जितनी अधिक चलचित्रमय होगी, वह अपने ही पक्ष को मजबूत करती हुई साहित्यिक महता के दावे को न्यूनतम करती जाएगी, ठीक उसी तरह जैसे नाटक की स्क्रिप्ट प्राय: करती ही है, और फिर, व्यावहारिक तौर पर कोई पटकथा साहित्य के स्तर तक नहीं पहुँच सकती।" तार्कोवस्की की इस धारणा से मणिकौल प्रभावित रहे हैं। "आषाढ़ का एक दिन" देखते हुए हम इस प्रभाव को दृश्य दर दृश्य घटित होते हुए देख सकते हैं। मणिकौल ने मोहन राकेश के नाटक "आषाढ़ का एक दिन" को अपनी फिल्म में हूबहू ढालने की कोशिश की है। कुछ जगहों पर नाटक के संवाद को ज़रूर हटा दिया है लेकिन उसकी जगह पर अपनी ओर से कुछ जोड़ा नहीं है। नाटक के संवाद के कुछ शब्दों को मणिकौल ने अपनी फिल्म में ज़रूर बदला है। यह बदलाव फिल्म के परिवेश की माँग है और यहीं पर यह सवाल मन में उठता है कि क्या यह नाटक के परिवेश की मांग नहीं हो सकती थी?
"आषाढ़ का एक दिन" पहली बार 31 दिसम्बर 1971 को प्रदर्शित हुई। इस फिल्म के निर्माण में फिल्म वित्त निगम और राष्ट्रीय संगीत नाट्य केंद्र ने सहयोग किया था। इस फिल्म में मल्लिका का किरदार रेखा सबनीस ने निभाया है। कालिदास का किरदार अरुण खोपकर और विलोम का किरदार ओम शिवपुरी ने निभाया है। पिंचू कपूर ने मातुल की भूमिका निभाई है। इस फिल्म में संगीत जयदेव (1919-1987) ने दिया है। जयदेव एक ऐसे संगीतकार हैं जिनका संगीत साठ और सत्तर के दशक में खूब मशहूर हुआ था। हम दोनों, घरौंदा, रेशमा और शेरा, गमन, आँखें जैसी फिल्मों में उनके दिए संगीत ने खूब नाम कमाए। संगीत का उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका है। रामानंद सागर के "रामायण" धारावाहिक में संगीत देकर जयदेव अपना इतिहास लिख चुके हैं। "आषाढ़ का एक दिन" के संगीत में मृदंग का खूब इस्तेमाल हुआ है, पात्रों की मनस्थिति और उसके परिवेश के सांद्र को मृदंग ने अपनी हर थाप से अभिव्यक्त किया है, मृदंग पर सुदर्शन अधिकारी अपनी पूरी लयात्मकता के साथ मौजूद हैं। इस फिल्म में कैमरे का कमाल सबसे ज्यादा है। आषाढ़ की बारिश की आवाज के साथ कैमरे का संचालन के.के. महाजन (1944-2007) ने किया है। के.के. महाजन को चार बार नेशनल अवार्ड सिनेमेटोग्राफी के लिए दिया गया था। "आषाढ़ का एक दिन" पर फिल्म को फिल्मफेयर का बेस्ट क्रिटिक अवार्ड मिल चुका है।
मणिकौल का सिनेमा अवांगार्द का सिनेमा है। अवांगार्द को दरअसल, रेनाटो पोग्गिली ने अपनी किताब "द थ्योरी ऑफ द अवांगार्द" (1962) में बड़े कामगार वर्ग की उस राजनीतिक, सांस्कृतिक चेतना से जोड़कर विश्लेषित किया जिसमें वह अपने वर्ग-शत्रु की पहचान करता है और बदलाव के लिए संघर्ष करता है। मणिकौल अपने समय की राजनीति और भारतीय सिनेमा के स्वरूप की न केवल पहचान करते हैं बल्कि सिनेमा के भविष्यलक्षित को समझते हैं, इसलिए उनके सिनेमा का रास्ता प्रचलित लोकप्रियता के ढांचे से अलग मक़ाम रखता है इसलिए उनकी फिल्मों को एक "कल्ट फिगर" के रूप में याद रखा जाना चाहिए। अधिकांशतः मणिकौल अपने सिनेमा में साहित्य को अपना विषय बनाते हैं। साहित्य ही उनकी फिल्मों की दुनिया को चेतनशील बनाती है, और दर्शक के जेहन में धीरे-धीरे उतरने का रास्ता बनाती है। दुविधा (1973) विजयदान देथा की कहानी पर, घासीराम कोतवाल (1979) विजय तेंदुलकर के नाटक पर, सतह से उठता आदमी (1980) मुक्तिबोध की कहानी पर, नौकर की कमीज (1999) विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास पर आधारित फ़िल्में मणिकौल की हिंदी सिनेमा में अवांगार्द की उपस्थिति को दर्ज करती है। ध्रुपद (1982), माटी मानस (1984), सिद्धेश्वरी (1989), नजर ( 1991) जैसी फिल्म और डाक्यूमेंट्री मणिकौल को एक अलग पहचान देती है।
मणिकौल की फिल्म "आषाढ़ का एक दिन" में प्रेम का त्रिकोण जितना "अंडरटोन" है, उतना मोहन राकेश के नाटक में नहीं है। नाटक और फिल्म में यह त्रिकोण मल्लिका, कालिदास और विलोम के बीच घटित होता है। नाटक को पढ़ते हुए प्रेम सत पर ठीक से उभरता हुआ, एक आकार लेता हुआ पाठक को दिखलाई देता है जबकि फिल्म में दर्शक प्रेम में एक गहरी और ठोस उदासी देखता है। फिल्म में मल्लिका और कालिदास के बीच प्रेम की तरावट संगीत के "सम" पर तरंगित होती है। मल्लिका के प्रेम में दीवानगी भरी उदासी है तो कालिदास के प्रेम में तर्क की उदासी। दर्शक को इस तरंग से अपना तादात्म्य नियोजित करना होता है। यह तरंग फिल्म में मृदंग की आवाज के साथ घटित होती है। नाटक में पाठक, संवाद के साथ खुद भी घटित होता हुआ महसूसता है। पाठक की चेतना में संवाद और दृश्य की स्थितियाँ आरोह-अवरोह की निरंतरता में बनती रहती है। इस फिल्म को देखते हुए, बार-बार नाटक की याद इसलिए हो आती है कि नाटक में जो रंग-निर्देश पात्र के संवादों के बीच दिए हुए हैं, फिल्म में वे अधिकांश जगहों पर अनुपस्थित हैं, फिल्म की दृश्य-भाषा में भी वह लक्षित नहीं होती है। फिल्म में कहीं-कहीं नाटक के कुछ संवाद भी अनुपस्थित हैं। जो संवाद अनुपस्थित हैं नाटक में उसे पढ़ते हुए यह नहीं लगता कि फिल्म में यह अभिनेय नहीं रहा होगा और यह भी नहीं कि यह कथा से जुड़ा हुआ नहीं है। फिल्म में इसके अनुपस्थित होने का ठीक-ठीक कारण नहीं पता चलता। यह अनुपस्थिति कई बार गैरजरूरी लगती है। इस फिल्म को देखते हुए यह लगता है कि अगर किसी दर्शक ने "आषाढ़ का एक दिन" नाटक नहीं पढ़ा है तो वह इस फिल्म के कथा-तंतु को ठीक से नहीं समझ सकता है। फिल्म में एक बात की तरफ ध्यान ज़रूर जाता है कि फिल्म में जितने भी संवाद लिए गए हैं वे नाटक से हू-ब-हू लिए गए हैं यानि कि फिल्म में जो संवाद हैं वह कोई पटकथा का हिस्सा नहीं लगता सीधे नाटक से उठाया लगता है। आंशिक तौर पर नाटक के संवाद में से फिल्म के लिए कुछ शब्दों को बदल दिए गए हैं। यहाँ मैं चंद उदाहरण आपके सामने पेश करता हूँ। आप देखेंगे कि जिन शब्दों को फिल्म के लिए बदला गया है, वे बदलाव कभी-कभी गैरजरूरी हैं और उसके बदलने से अर्थ में कोई विस्तार नहीं होता है। कहीं-कहीं पर तो नाटक की तुलना में फिल्म में प्रयोग किए गए शब्द ज्यादा दुरूह लगते हैं। मैं थोड़ा तफ़सील से कुछ उदाहरणों के साथ अपनी बात कहना चाहता हूँ।
नाटक में कालिदास का संवाद है - "... मैं अनुभव करता हूँ कि यह ग्राम-प्रान्तर मेरी वास्तविक भूमि है। मैं कई सूत्रों से इस भूमि से जुड़ा हूँ। ... यह आकाश है ये मेघ हैं, यहाँ की हरियाली (फिल्म में "हरियाली" के स्थान पर "हरितिमा") है, हरिणों के बच्चे हैं, पशुपाल हैं।"
नाटक में मल्लिका का संवाद- "... लगता है फिर वर्षा होगी।" फिल्म में- "संभवतः फिर वर्षा होगी।"
उपर्युक्त उद्धरणों के साथ सिनेमा और नाटक के और उद्धरणों को गौर से देखने पर एकबारगी यह कहना कि फिल्म के लिए संवाद में किए गए परिवर्तन दरअसल सिनेमा माध्यम की अपनी मांग है या यह कि यह बदलाव सिनेमा की अर्थवत्ता को सापेक्षत: बढ़ा देती है ; एक साधारणीकृत वाक्य जैसा लगता है। मणिकौल की कुछ और फिल्मों को देख लेने के बाद "आषाढ़ का एक दिन न" को देखना कई बार निराश भी कर जाता है। इस फिल्म में पात्र की सवांद अदायगी बेहद कमजोर है और कई जगह दोषपूर्ण भी लगती है। संवाद को सुनते हुए लगता है कि पात्रों की जबान पर संवाद को चस्पा कर दिया गया है; लगता है पात्रों को संवाद बोलने के लिए कोई भारी दबाव हो, वे इसे बोलने में बहुत ही शुष्क मेहनत करते हुए लगते हैं। इस फिल्म में पात्र संवाद बोलते हुए नहीं लगते, बल्कि देखकर संवाद को पढ़ते हुए लगते हैं। इस फिल्म का यह एक बेहद निराशाजनक पहलू है। फिल्म का पहला ही संवाद जिसके आने का दर्शक बड़ी शिद्धत से इंतजार करता है और मेरे जैसा दर्शक तो और भी ज्यादा। फिल्म का पहला संवाद :
मल्लिका - "आषाढ़ का पहला दिन और ऐसी वर्षा माँ! ... ऐसी धारासार वर्षा! दूर-दूर तक की उपत्यकाएं भींग गयीं। ... और मैं भी तो! देखो न माँ, कैसी भीग गयी हूँ!"
इस संवाद में परदे पर मल्लिका नहीं होती बल्कि उसकी माँ अम्बिका होती है, मल्लिका की आवाज होती है। संवाद को सुनते हुए यह कहीं से नहीं लगता है कि आषाढ़ की बारिश में भीगी हुई कोई स्त्री बोल रही है। ऐसा बार-बार लगता है कि संवाद में प्रयुक्त विस्मयादिबोधक चिन्ह(!) का कोई अर्थ पात्र के लिए है ही नहीं। यह केवल इस संवाद में नहीं बल्कि और भी कई संवाद में प्रयुक्त चिह्नों का संवाद अदायगी में अनुपस्थिति सिनेमाई भाषा को कमजोर कर देती है। कई संवादों को सुनते हुए तब और ज्यादा निराशा होती है या यों कहें दर्शक की अभिग्रहणीयता को बाधित करता है जब संवाद में प्रयुक्त प्रश्नचिन्हों(?) की अभिव्यक्ति नहीं होती है और न ही पात्रों के अभिनय में ही प्रश्न का बोध होता है। मैं सिनेमा के एक और संवाद (कालिदास और विलोम के बीच) का उदाहरण देना चाहता हूँ, जिसे परदे पर घटित होते हुए और प्रश्नचिह्न के अनुपस्थित होते देखना त्रासद है।
कालिदास - "मैं तुम्हारी प्रशंसा करने के लिए अवश्य बाध्य हूँ। तुम दूसरों के घर में नहीं, उनके जीवन में भी अनधिकार प्रवेश कर जाते हो।"
विलोम - "अनधिकार प्रवेश? मैं? क्यों अम्बिका, तुम्हें कालिदास की यह बात कहाँ तक संगत प्रतीत होती है कि मैं, विलोम, दूसरों के जीवन में अनधिकार प्रवेश कर जाता हूँ?"
विलोम के संवाद में प्रश्नचिह्नों का प्रयोग, संवाद की अर्थगर्भिता को बढ़ा देता है लेकिन परदे पर संवाद अदायगी में यह सिरे से गायब है। ऐसे कई उदाहरण इस सिनेमा में भरे पड़े हैं। यह उन दर्शकों के लिए घोर निराशाजनक है जो मणिकौल की फिल्मों के पास पहुँचते हैं क्योंकि हम जानते हैं कि मणिकौल की फ़िल्में दर्शकों के पास नहीं पहुँचती है, उन तक दर्शकों को जाना होता है और यह जाना अनायास नहीं बल्कि सचेतन होता है।
उपर्युक्त संदर्भों और उसके आधार पर किए गए विश्लेषणों से यह लग सकता है कि क्या "आषाढ़ का एक दिन" पर बनी फिल्म नाटक की तुलना में एक कमजोर प्रस्तुति है? तात्कालिक उत्तर इसका हाँ में ही दिया जा सकता है, लेकिन ज्यों-ज्यों कैमरे की आँख जिसमें हमारी भी आँख शामिल प्रतीत होती है (और यह के.के. महाजन की विशेषता है) के माध्यम से हम दृश्य- दर-दृश्य सिनेमा से गुजरते हैं तों "दी जर्मन आइडियोलॉजी, कलेक्टेड वक्र्स" में माक्र्स और एंगेल्स के हवाले से यह कहने का मन हो आता है कि "चेतना जीवन को तय नहीं करती बल्कि जीवन ही चेतना को तय करता है।" मल्लिका-कालिदास-विलोम की त्रियक उपस्थिति (सिनेमा और नाटक दोनों में ही) में इस चेतना को घटित होते हुये एक ऐसे सांद्र की उपस्थिति के साथ देखा जा सकता है जिसमें कला, प्रतिभा और प्रेम के साथ राष्ट्र - राज्य यूँ खड़ा हो जाता है कि जैसे राष्ट्र-राज्य, कला, प्रतिभा और प्रेम का सहचर हो जबकि हम जानते हैं यह रिश्ता अधिकांशत: विपरीतार्थक होता है। इस विपरीतार्थक संबंध और उसके असर का खुलासा हमें मल्लिका के जीवन, खासकर नाटक के तीसरे हिस्से में दिखलाई देता है। कालिदास के जाने के बाद मल्लिका के जीवन का जो रचाव है उससे ही एक भिन्न किस्म की चेतना का निर्माण हुआ है, जिसमें मल्लिका के पास कालिदास के दुबारा वापस लौट कर आने या विलोम के साथ मल्लिका के रहने का मल्लिका के जीवन में कोई उत्साह का संचार नहीं करता। मल्लिका का जीवन ही मल्लिका की चेतना को तय करती है। यह अलग बहस हो सकती है कि यह चेतना मल्लिका को कितना और किस प्रकार का चेतनशील बनाती है। मणिकौल एक ऐसे फ़िल्मकार रहे हैं जो अपनी फिल्मों में क्लोज शॉट के लिए और शॉट की दीर्घ अवधि के लिए जाने जाते हैं। अभिनय की बारीकी को वे अभिनेता के चेहरे पर उभरने वाली रेखाओं, आँखों के घुमाव और उसके कटान से सृजित करने वाले रहे हैं। "आषाढ़ का एक दिन" फिल्म का नब्बे फीसदी हिस्सा क्लोज शॉट से निर्मित है। फिल्म का अधिकांश हिस्सा मल्लिका के घर के भीतर घटित होता है। फिल्म में एक लॉन्ग शॉट एक घंटे चौबालीस मिनट बाद घटित होता है, जब कैमरा मल्लिका के घर से बाहर निकलता है और जाकर एक चोटी पर स्थिर हो जाता है। और फिर पहाड़ी की चोटी से कैमरा मल्लिका के घर का एक लॉन्ग शॉट लेता हुआ मल्लिका के चेहरे पर केंद्रित होते हुये क्लोज शॉट में तब्दील हो जाता है, जहाँ मल्लिका का कालिदास से एक लंबा संवाद चल रहा होता है। इस संवाद में प्रेम अपने गहरे सत्त्व के साथ मौजूद होता है। संवाद को सुनते हुए मुझे प्रेम-सत्त्व से भरे संवाद की ताप तीव्रता से महसूस होती है। इस महसूसने में मुझे विक्टर हयुगो याद आते हैं जिन्होंने माना है कि रोमांटिसिज्म वही करता है जो प्रकृति करती हैै, और शार्ल नोदिए भी याद आते हैं जिन्होंने कहा कि यह (साधारण चीजों से थककर) मानव-हृदय की अंतिम शरणस्थली है। कालिदास भी उज्जैन और काश्मीर के राज्य-सत्ता के प्रपंच से थककर मल्लिका के पास पुनः पहुँचता है, अपनी अंतिम शरणस्थली। कालिदास एक बार फिर से मल्लिका के साथ "अथ" से शुरू करना चाहते हैं। सवाल है कि क्या कालिदास अपना जीवन मल्लिका के साथ फिर रअथथ से शुरू कर पाते हैं, क्या जीवन फिर "अथ" से शुरू किया जा सकता है? नहीं, क्योंकि मल्लिका के मौन एकालाप में आषाढ़ के दिन की बारिश लगातार और धारासार बरस रही है। कालिदास के जाने के बाद तो यह बारिश और सघन हुई है। इस फिल्म में आषाढ़ की बारिश का एक रंग है जो फिल्म के आरंभ से लेकर अंत तक लगातार बारिश की आवाज के माध्यम से शामिल है। बारिश की आवाज की पृष्ठभूमि में सारे पात्र अपने होनेे को सृजित कर रहे हैं। दरअसल, परदे पर मल्लिका जितनी बार अवतरित होती है बारिश की आवाज के साथ प्रेम की रागात्मकता में उदासी की एक अछोर लकीर लेकर अवतरित होती है। बारिश में भीगी हुई प्रेम-कथा लेकर जिसमें केवल समर्पण और त्याग है। चाहना कुछ भी नहीं। मल्लिका अपने एकांत में जब खुद से यह संवाद कहती है कि ...यह मेरे अभाव की संतान है। जो भाव तुम थे, वह दूसरा नहीं हो सका... जानते हो मैंने अपना नाम खोकर एक विशेषण उपार्जित किया है और अब मैं अपनी दृष्टि में नाम नहीं, केवल विशेषण हूँ। तब मल्लिका, ईसा पूर्व पहली शताब्दी (जब विक्रमादित्य का राज्य था जिसके कार्यकाल के दौरान कालिदास के होने की बात कही जाती है) में स्त्री के होनेे की गाथा लिख रही होती है, जिसके होनेे में नाम नहीं बल्कि विशेषण शामिल हो जाता है। यह विशेषण दरअसल पितृसत्तात्मकता की उपज है। मल्लिका के एक और संवाद को पितृसत्तात्मकता के संदर्भ में देखा जा सकता है, जब मेघ-गर्जन की पृष्ठभूमि में कालिदास से वह कह रही होती है...। मैं टूटकर भी अनुभव करती रही कि तुम बन रहे हो। क्योंकि मैं अपने को अपने में न देखकर तुममें देखती थी। यह एक भावावेग है जो मल्लिका के जीवन में कालिदास का देय है। रोमांटिक भावावेश में पूरी तरह बह जाने वाले एक नाजुक दौर और उसकी धड़कन को फ्रांस्वा त्रुफ़ो (1932-1984) ने भी अपनी फिल्मों में सृजित किया है। भारतीय चित्त-वृत्ति में यह बात रही है कि अपने "स्व" को अपने प्रिय के "स्व" में समाहित कर लिया जाता है और उसमें ही उसे संतोष प्राप्त होता है। दरअसल, रस की निष्पति भी तो ऐसी ही होती है। कमोबेस यह आज भी भारतीय समाज में देखने को मिलती है। लेकिन क्या जीवन ऐसे जिया जा सकता है? जीवन ऐसे जिया जाना चाहिए? दरअसल, यह किसी भी व्यक्ति के "स्व" की धारणा के लिए एक आत्मघाती प्रक्रिया है। लेकिन हम भारतीय इस आत्मघाती प्रक्रिया को एक मूल्य या "नैतिकता" के रूप में देखे जाने के आदि हैं।
"आषाढ़ का एक दिन" फिल्म के कई दृश्य ऐसे हैं जिसके लिए मणिकौल की अवांगार्द दृष्टि की प्रशंशा की जानी चाहिए। फिल्म में एक दृश्य है, लगभग 93 मिनट बाद। कालिदास बहुत दिनों बाद मल्लिका के पास लौटकर आता है। मल्लिका, कालिदास की अनुपस्थिति में एक लंबा जीवन जी चुकी है, इस जीवन में विलोम की अनचाही उपस्थिति है। जिस दिन कालिदास मल्लिका को छोड़कर गया था, वह दिन भी आषाढ़ की बारिश का था और जब आज आया है तब भी आषाढ़ की बारिश का दिन है। उस दिन कालिदास की गोद में एक हरिण शावक था और आज मल्लिका की गोद में एक बच्ची। मल्लिका स्वालाप करती है... वही आषाढ़ का दिन है। उसी तरह मेघ गरज रहे हैं। वैसे ही वर्षा हो रही है। वही मैं हूँ। उसी घर में हूँ। किंतु, संवाद में किंतुु को अलग से रेखांकित किया जाना चाहिए।
मल्लिका यह जानती है कि हर वर्ष आषाढ़ की बारशि होगी, वह हर बार भींग भी सकती है लेकिन उसका भींगना क्या कालिदास के साथ पहले दिन की तरह भींगना हो सकता है। क्या अब भी भीगने में वह नन्हा हरिण शावक शामिल हो सकता है। मल्लिका जब यह संवाद कह रही होती है परदे पर ठीक मल्लिका के पीछे अंधकार है। अंधकार के ठीक बीचों-बीच मल्लिका के पीठ के पीछे से एक पीली लौ जलने लगती है। यह पीली लौ कालिदास के आने का संकेत है, नाटक में यह संकेत नहीं है। ठीक इसी वक्त परदे पर बिजली कौंधती है, दरवाजा खोलकर कालिदास उपस्थित होता है। "आषाढ़ का एक दिन" फिल्म का यह प्रसंग सबसे अधिक सघन और भावुक कर देने वाला क्षण है, लेकिन मणिकौल भावुकता वाले दृश्यों से परहेज करते हैं। भावना का आना उनकी सिने प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा है, चाही गई प्रक्रिया नहीं।
"आषाढ़ का एक दिन" फिल्म में बिजली की कौंध की आवाज, बादल की गडगडाहट, लगातार बारिश की आवाज, पंक्षियों की आवाज, मृंदग थाप की ध्वनि का तालमेल बेहतरीन है। और यही मणिकौल की अपनी विशेषता है। दरअसल, मणिकौल में ध्वनि की यह विविधता समकालीन सिनेमा आंदोलनों की उपज मानी जा सकती है जो उनके अपने अनुभवों से होकर गुजरी है। सिनेमा में ध्वनि दरअसल एक तकनीक है। मणिकौल इस तकनीक का बखूबी इस्तेमाल अपनी फिल्म में करते हैं। इस तकनीक का बेहतरीन इस्तेमाल मणिकौल ने "सतह से उठता आदमी", "सिद्धेश्वरी" और "नौकर की कमीज" में भी किया है। दरअसल, इटालियन फ़िल्मकार फेदरिको
मणिकौल की फिल्मों में इस्तेमाल किए गए बिंबों की एक परस्पर क्रमबद्धता हुआ करती है। यह क्रमबद्धता तीन स्तरों पर निर्मित होती है। पहला ध्वनि और छवि के रूप में, दूसरा वस्तु और घटना के रूप में तथा तीसरा अभिनेता और स्थल के रूप में। "आषाढ़ का एक दिन" में बिंबों की क्रमबद्धता बनी हुई है। यह आवश्यक नहीं है कि क्रमबद्धता एकरैखिक हो और यह भी है कि बिंबों की क्रमबद्धता, फिल्म के नरेटिव की क्रमबद्धता से अलग होती है। स्वयं मणिकौल एकरैखिकता के विरोधी हैं, उन्होंने कहा है कि "सिनेमा का सबसे बड़ा श्राप एकरैखिक नेरेटिव है। एक नरेटिव जो यहाँ से चलकर यहाँ होता हुआ एक क्लाइमेक्स पर जाकर खत्म हो जाता है।
यह जो एकरैखिक नेरेटिव है, आप समझ लीजिए, यह फिल्म के लिए सबसे बड़ा बंधन है जो साहित्य की देन है बल्कि कहिये खराब साहित्य की देन है। साहित्य भी अब बढ़ चुका है। 16वीं शताब्दी के बाद।" (अभेद आकाश, मध्यप्रदेश फिल्म विकास निगम मर्यादित, संस्कृति भवन, बाणगंगा, भोपाल द्वारा प्रकाशित से उल्लिखित) मणिकौल को साहित्य हमेशा आकर्षित करता रहा है और बाधित भी। वे साहित्य की चुनौती को स्वीकार करने वाले फ़िल्मकार रहे हैं इसलिए वे अपनी फिल्मों में साहित्य की एकरेखीय स्वरूप को तोड़ना चाहते हैं। अपनी फिल्मों में वे इसकी कोशिश करते हुए लगते भी हैं।

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