ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
महाभारत और ताओ द चिङ का चिंतन तुलनात्मक अध्ययन
01-Jun-2019 12:41 AM 407     

धर्म और ताओ एक वस्तुगत नियम है, जिसका पालन लोग ठोस काम
करने से करते हैं। जैसे ब्रह्माण्ड एक क्षण के लिए भी नहीं रुकता है, वैसे
ही मनुष्य को भी निरंतर कर्म साधना में लीन रहना चाहिए।

यद्यपि आधुनिक युग में चीन और भारत के मध्य राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक आदान-प्रदान अधिकाधिक मात्रा में हो रहा है, फिर भी आम भारतीय और चीनी लोगों के मध्य एक सांस्कृतिक अंतर अभी भी विद्यमान है जिसके कारण दोनों देशों के लोग गहराई से एक-दूसरे को समझ नहीं पाते। परन्तु यह भी माना जाता है कि चीनी संस्कृति और भारतीय संस्कृति के मध्य बहुत सारी विभिन्नताओं के बावजूद बहुत सारी समानताएं भी विद्यमान हैं। यह पूर्णतः असत्य भी नहीं है। दो महान संस्कृतियों में विद्यमान विभिन्नताओं के बावजूद भी कुछ मूल तत्व लगभग समान हैं, जैसे विश्व का मूल एवं सार्वभौमिक नियम - धर्म एवं ताओ, मानव जीवन के उत्तम दर्शन -- निष्काम कर्म का सिद्धांत तथा ब्रह्मांड और मनुष्य का अंत - अनवरत जीवन क्रम में परिभ्रमण।
विश्व का मूल एवं सार्वभौमिक नियम - धर्म एवं ताओ
धर्म भारतीय संस्कृति की सबसे महत्वपूर्ण केंद्रीय धारणा है। एक प्रसिद्ध भारतीय विद्वान ने कहा है - भारतीय संस्कृति का मूल रूप धर्म है, हिन्दू नहीं। भारत में एकमात्र विचारधारा धर्म है, जिससे भारतीय विचारधारा के अनुसार प्रत्येक वस्तुएं उत्पन्न होती हैं तथा मानव जीवन की प्रत्येक गतिविधियाँ उस पर निर्भर हैं, मानव जीवन का आदि तथा अंत भी उसी से घटित एवं फलित होते हैं। धर्म के विचार का उत्तम वाहक महाभारत है। भारतीय संस्कृति को धर्म संस्कृति भी कहा जाता है।
ताओ का चीनी संस्कृति में विशेष स्थान है, दूसरे शब्दों में कहें तो चीनी संस्कृति में ताओ का स्थान सर्वोच्च है। ताओ के बारे में यहाँ तक कहा जाता है कि ताओ संस्कृति ही चीनी संस्कृति है। इस संस्कृति का सबसे बड़ा वाहक लाओत्स् के द्वारा लिखा हुआ ग्रन्थ "ताओ त चिङ" है। चीन के प्रसिद्ध विद्वान प्रो. चिन तिङ हान ने लिखा है कि किसी विदेशी को यदि चीन की पारंपरिक संस्कृति के बारे में जानना हो, तब दो ग्रंथों का पठन उसके लिए नितांत आवश्यक है - पहला कन्फ़ूशस का "सूक्तिसंग्रह" और दूसरा लाओत्स का "ताओ त चिंङ"।
यदि हम "धर्म" एवं "ताओ" की तुलना करें, जो भारतीय और चीनी संस्कृति का सारतत्व है, अध्ययनोपरांत इनमें बहुत समानताएं दृष्टिगोचर होती हैं। धर्म और ताओ की व्याख्या शब्दों में किया जाना असम्भव तो नहीं परन्तु अत्यंत कठिन है। वे दोनों बहुत सूक्ष्म हैं। ताओ समस्त सृष्टि का आदि स्रोत है और संचालन कर्ता है। वह सृष्टि के पहले भी विद्यमान था और सृष्टि के नष्ट होने के बाद भी विद्यमान रहेगा। ताओ से ही सृष्टि की समस्त वस्तुओं, प्रक्रियाओं एवं आयामों का आरंभ तथा अन्त होता है। ताओ वह नियामक तत्व है जिसके द्वारा ब्रह्माण्ड की समस्त घटनाएं घटित एवं संचालित होती हैं।
धर्म आम भारतीय जनमानस के रक्त में बहता है, उनके लौकिक एवं परलौकिक जीवन पर प्रभाव डालता है, उनके दैनिक जीवन में सांसारिक एवं भौतिक जीवन पथ पर मार्गदर्शन करता है। पर ताओ का आम चीनी लोगों के दैनिक जीवन में इतना बड़ा प्रभाव नहीं, केवल अध्ययन के क्षेत्र में इसकी ख़ूब चर्चा होती है।
हम मानते हैं कि ताओ और धर्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे दोनों बहुत सूक्ष्म हैं। महाभारत के अनुसार कुरुक्षेत्र का युद्ध धर्मयुद्ध कहा जाता है, धर्म के प्रतिनिधि पांच पांडु पुत्रों ने अधर्म के प्रतिनिधि दुर्योधन आदि सौ धृतराष्ट्र पुत्रों पर विजय प्राप्त की। पर प्राचीन भारतीय युद्ध करने के नियम के अनुसार, पांडवों ने कई बार धर्म का त्याग करके युद्ध में प्रमुख विजय प्राप्त की थी। जैसे गाण्डीवधारी अर्जुन ने शिखंडी के पीछे छुपकर परशुराम शिष्य भीष्म पितामह का वध किया, जो एक योद्धा के सामने केवल एक योद्धा से लड़ने के नियम को भंग किया। युधिष्ठिर ने अपने गुरु द्रोण के सामने झूठ बोला, जो द्रोणाचार्य के मृत्यु का कारण बना। सत्यवादी, निष्कपट एवं सत्यनिष्ठा वाले महापुरुषों ने भी धर्म को भंग किया, आंशिक रूप से ही अधर्म के मार्ग पर चले। प्रश्न है कि इसका कारण क्या है। क्योंकि धर्म और अधर्म के बीच एक अस्पष्ट क्षेत्र है - सूक्ष्म धर्म। सूक्ष्म धर्म काला और सफेद के बीच एक भस्म रंग का क्षेत्र है, पाप एवं पुण्य के बीच एक पतला कागज़ है।
मानव जीवन के उत्तम दर्शन---निष्काम कर्म का सिद्धांत
धर्म और ताओ एक वस्तुगत नियम है, जिसका पालन लोग ठोस काम करने से करते हैं। जैसे ब्रह्माण्ड एक क्षण के लिए भी नहीं रुकता है, वैसे ही मनुष्य को भी निरंतर कर्म साधना में लीन रहना चाहिए। फिर भी महाभारत और ताओ द चिङ को पढ़कर ऐसा लगता है कि कभी-कभी वे कर्म पथ से भटक जाते हैं। उदाहरण स्वरूप महावीर द्रोण शिष्य अर्जुन भी कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध के मैदान में सामने स्वजनों को देखकर अपने कर्म पथ से विचलित हो जाते हैं, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होते हुए भी धनुष के त्याग का विचार करते हैं, परन्तु भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा कर्म सिद्धांत का मर्म समझाने पर अर्जुन कर्म पथ से विमुख नहीं होते है। महाराज पांडु, धृतराष्ट्र, युधिष्ठिर आदि राजाओं ने राज त्याग कर वन में तपस्या की थी। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि महभारत तथा लाओत्से के विचार कर्म के प्रति नकारात्मक हैं, वास्तव में ये दोनों सिद्धांत सकाम कर्म की अपेक्षा निष्काम कर्म के सिद्धांत मंडन करते हैं।
भारतीय संस्कृति में ईश्वर का स्थान सबसे ऊंचा है। ईश्वर के सामने मनुष्य तुच्छ एवं शक्तिहीन है। इसलिए बहुत लोग भाग्य को मानते हैं, तपस्या को ही कर्म मानकर जीवन के सर्वोतम पुरुषार्थ मोक्ष के लिए तप के मार्ग को अपनाते हैं। पर वास्तव में भारतीय संस्कृति में काम-निष्ठा की भावना भी प्रचलित है। महाभारत में निष्काम कर्म का सिद्धान्त प्रस्तुत किया गया। कामना काम करने की प्रेरक शक्ति है, पर दबाव नहीं है। जब हम काम करने के पीछे की कामना को छोड़ देते हैं, तभी हम अधिक अच्छी तरह काम कर सकते हैं। ऐसा निष्काम से काम करना, काम नहीं करना है, बल्कि इन दोनों के बीच में है। वह फल की चिंता नहीं करता, वह यथाशक्ति कर्म करने में विश्वास रखता है, कर्मफल जो हो उसे स्वीकार करने की सद्इच्छा रखता है। उदाहरण के लिए, महाभारत में दुर्योधन को पद, अधिकार तथा राज्य पाने की बड़ी कामना है, परन्तु उसे अंत में कुछ नहीं मिला। लेकिन युधिष्ठिर जिसे पहले राज पाने का लालसा नहीं थी, वे अंत में राजा बन गये।
ताओ द चिङ के विचार समझने के लिए "वू वे" का अर्थ जानना आवश्यक है। "वू वेे" का शाब्दिक अर्थ है - काम मत करना। जैसे "अत: संत निष्क्रिय कर्म से करता कार्य निष्पादित, नि:शब्द नाद से करता अपने सिद्धान्त संप्रेषित" और "हो उपलब्ध जब अक्रियता की ऐसी अवस्था तब हों सभी अनुद्विग्न, हो शांति की सुव्यवस्था"। लाओत्स बुद्धिमता से समाज और मनुष्य के जीवन के जटिलता का समीक्षा करते थे। लाओत्से पर अध्ययन करने वाले प्रसिद्ध विद्वान छन च्या तिंग ने लिखा है कि लाओज़ के अपनी किताब लिखने का सबसे बड़ा उद्देश्य यह है कि "वू वेे" सिद्धान्त का प्रसारण करना है। "वू वेे" के विचारों को समझे बिना लाओत्स को समझना असंभव है। लेकिन चीन में "वू वेे" के प्रति ऐसा भ्रम है कि "वू वेे" का मतलब केवल कोई काम नहीं करना है। कुछ लोगों को लगता है कि यह एक नकारात्मक काम करने का तरीका है, जो अकर्मण्य करते हैं, इसलिए हमें इसे त्यागना चाहिये। पर वास्तव में "वू वेे" का वास्तविक अर्थ निष्काम कर्म के पथ पर चलना है। यदि चीनी लोग महाभारत और भगवद्गीता पढ़कर कर्म योग का मर्म समझते होंगे, तो अधिक अच्छी तरह लाओत्से के "वू वेे" का अर्थ भी जानते होंगे। इस प्रकार महाभारत तथा लाओत्स के तुलनात्मक विचारों से स्पष्ट है कि दोनों में बहुत अधिक साम्यता है, निटकता है, अतः हम कह सकते हैं कि भारतीय एवं चीनी संस्कृति के मूल रूपों में उतना अन्तर नहीं है जितना हमारी कल्पना में।
ब्रह्मांड और मनुष्य का अंत - अनवरत जीवन क्रम में परिभ्रमण
ब्रह्मांड विज्ञान के अभाव में जीवन के एक व्यापक एवं ठोस सिद्धांत को प्रस्तुत करना असंभव है। महाभारत तथा लाओत्स ने ब्रह्मांड और मनुष्य के अंत के बारे में लगभग समान विचार दिया है। उन दोनों ने इस सवाल का जवाब देने से इन्कार नहीं किया और पश्चिम संस्कृति की तरह स्वर्ग और नरक का चित्र भी नहीं खींचा, बल्कि एक साथ परिभ्रमण करने का सिद्धान्त का प्रयोग करके इस विश्व के रूप को समझाते हैं।
महाभारत में समय परिभ्रमण करता है। ब्रह्मा के एक दिन और एक रात के बड़े परिभ्रमण में चार छोटे परिभ्रमण होते हैं ---- सत्य युग, त्रेतायुग, द्वापर युग और कलियुग। विष्णु का दशावतार भी एक तरह का परिभ्रमण है। धरती पर जब-जब धर्म की हानि हुई है तब-तब धर्म की पुनस्र्थापना के लिए भगवान विष्णु का अवतार हुआ है। इसके अलावा मनुष्य भी अपने कर्मों के फल को भोगने के लिए पुनर्जन्म के चक्र में घूमता है। जैसे राजकुमारी अम्बा भीष्म से प्रतिशोध लेने के लिए बार-बार जन्म लेती हैं। ऐसा लगता है कि महाभारत में मृत्यु कभी भी जीवन का अंत नहीं होता, जैसे भगवद्गीता में लिखा है कि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नये शरीरों को प्राप्त होता है।
हालांकि लाओज़ में आत्मा का इतना उल्लेख नहीं किया, जितना महाभारत में, फिर भी इसमें परिभ्रमण का सिद्धान्त भी होता है। लाओज़ ने लिखा था कि "ताओ होता संचालित पुनरावृत्ति" लाओज़ मानता है कि विश्व की समस्त वस्तुओं का विकास इस तरह होता है कि वे अधिकतर दो कदम आगे बढ़कर एक कदम पीछे हटाते हैं। यानी वे हमेशा के लिए सीधे आगे बढ़ नहीं सकते, बल्कि कुंडली की तरह धीरे-धीरे परिभ्रमण के साथ विकास करते हैं। लाओत्स की दुनिया देखने की दृष्टि बहुत जटिल है। वे अंध आशावादी नहीं हैं, पर नकारात्मक निराशावादी भी नहीं है। उनकी बुद्धि यह है कि हर प्रगति के पीछे छिपा हुआ संकट उन्होंने अच्छी तरह देखा है। कुछ लोग कहते हैं कि लाओत्स का इतिहास के प्रति नकारात्म विचार होता है, यानी प्रगति के बजाए दुनिया का पतन हो रहा है। पर यह सत्य नहीं है। लाओज़ केवल यह कहना चाहते हैं कि जैसे एक व्यक्ति जन्म से युवा तक, युवा से वृद्ध तक तथा वृद्ध से मृत्यु तक एक परिवर्तन होता जा रहा है, वैसे ही सारी सृष्टि भी शक्तिहीन से शक्तिशाली, शक्तिशाली से शक्तिहीन के चक्र में भ्रमण करती है। ऐसा अनुभव प्रत्येक व्यक्ति के पास होता है। चाहे एक व्यक्ति जितना भी उच्च स्थान पर या अमीर तथा बलवान होता है, वह इस परिभ्रमण से छूट नहीं पाता। लाओत्स ने लिखा है "निर्दोषता को शिशुवत उपलब्ध होता"। जीवन का अंत बिल्कुल जीवन के आरंभ की तरह होता है।
वास्तव में महाभारत और लाओज़ के परिभ्रमण का सिद्धान्त खगोल विज्ञान में भी सिद्ध हुआ है। सन् 2002 में अमेरिका वैज्ञानिक ने "सर्कुलर यूनिवर्स" मॉडल का उल्लेख किया। यानी ब्रह्मांड कभी खत्म नहीं होगा, वह हमेशा के लिए उत्पन्न, विकास और विलुप्त होने के चक्र में है। यह तथ्य सुनकर हमें प्राचीन भारतीय और चीनी संतों की बुद्धिमत्ता का प्रशंसा करना पड़ती है। महाभारत और लाओज़ के परिभ्रमण के सिद्धान्तों में कुछ समानताएँ हैं, जैसे वे दोनों दुनिया और मनुष्य का अंत नहीं मानते, बल्कि यह मानते हैं कि अंत वास्तव में आरंभ का दूसरा नाम है। फिर भी उनके बीच कुछ विभिन्नताएं भी हैं। महाभारत के परिभ्रमण के सिद्धान्त का पालन देव, मनुष्य और राक्षस तीनों लोकों के लोग करते हैं, पर लाओज़ के परिभ्रमण के सिद्धान्त का पालन केवल मनुष्य का समाज और समाज का मूल नियम तओ करते हैं।
साहित्य मनुष्य के हृदय का विज्ञान है। आधुनिक युग में तकनीक का शीघ्रता से विकास हो रहा है, जिससे मनुष्य का बाह्य जीवन प्रभावित एवं परिवर्तित हो रहा है। पर मानव का आन्तरिक भाग अभी भी तकनीकी विकास से अधिक प्रभावित नहीं हो पाया है। प्राचीन समय में मानव हृदय में जो प्रेम, लालसा, मान-अपमान आदि भावनाएं एवं उनसे जुड़ी समस्याएं अभी भी आधुनिक लोगों के सामने हैं। महाभारत और ताओ द चिङ जैसा ग्रंथ भारतीय और चीनी संस्कृति का मूल एवं आदि स्रोत है। वे न केवल भारत और चीन के अतीत को हमें बताते हैं, बल्कि भारत तथा चीन के वर्तमान एवं भविष्य का भी अवलोकन हमें कराते हैं। ये अमूल्य हैं, हर युग में इनका मूल्य बना रहा है, हर काल में ये प्रासंगिक बन रहे हैं तथा जब तक मानव के हृदय में दया, प्रेम, करुणा, भय, विछोह, संताप, ईष्र्या आदि गुण-अवगुण रहेंगे तब तक इन ग्रंथों के ज्ञान प्रासंगिक रहेंगे। आशा है कि महाभारत और ताओ त चिङ की तुलना के द्वारा हम चीन और भारत के साहित्यिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का एक नया मार्ग ढूँढेंगे और यह मार्ग भारत-चीन के वासियों को अधर्म से धर्म, असत्य से सत्य, अन्धकार से प्रकाश, हिंसा से अहिंसा, असहिष्णुता से सहिष्णुता की ओर ले जायेगा तथा हम मानवीय सद्गुणों से भरे हुए समाज, देश एवं विश्व के निर्माण करने में अपनी सहभागिता दे सकेंगे।

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