ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
शून्य दाता शून्य?
01-Jan-2017 12:05 AM 2581     

पतझड़ के पत्ते
जो जमीं पे गिरे हैं
चमकते दमकते
सुनहरे हैं

पत्ते जो पेड़ पर
अब भी लगे हैं
वो मेरे दोस्त,
सुन, हरे हैं
 
मौसम से सीखो
इसमें राज़ बड़ा है
जो जड़ से जुड़ा है
वो अब भी खड़ा है

रंग जिसने बदला
वो कूड़े में पड़ा है

यह कविता सबको पसंद आती है। मुख्यत: उन्हें जो या तो रंग बदल चुके हैं या बदलने वाले हैं या उन्हें डर हैं कि कहीं उनके रंग बदल न जाए।
चूंकि मैं अमरीका में रहता हूँ, तो जाहिर है मैं अमरीका में रहने वाले भारतवंशियों की बात कर रहा हूँ। कनाडा की बात अलग है। कहते हैं कि वहाँ का वातावरण ऐसा है कि हर मुल्क का आदमी अपनी पहचान बरकरार रख सकता है। अमरीका में ऐसा नहीं है। इसे "मेÏल्टग पॉट" कहा जाता है। यानि घुल-मिल जाओ। अलग-थलग न रहो। चमड़ी का रंग तो नहीं बदल सकते पर अपना खाना-पीना, उठना-बैठना, सोना-जगना, कपड़ा-लत्ता, सब ऐसा कर लो जिससे कि कोई कह न सके आप उस देश के हो, या उस संस्कृति के हो। नाम भी ऐसे कर लो कि दूसरे को कठिनाई न हो और संस्कृति की पहचान भी मिट जाए।
जब गिरमिटिया अपने सीमित वेतन में, सीमित साधनों में अपनी भाषा, परम्परा, अस्मिता बचा पाए, तो हम क्यों नहीं? हम सब तो खूब अच्छे खाते-पीते घरों से हैं, सुशिक्षित हैं, अच्छे ओहदों पर हैं, अच्छा वेतन पाते हैं। पूरे परिवार में कर्मठ इन्सान हैं, सब स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी भी हैं। अपने धर्म, अपने संस्कार के ज्ञाता भी हैं। फिर क्यों?
कारण यह है कि गिरमिटिया अपनी मर्जी से नहीं आए थे देश से बाहर। उन्हें ज़बर्दस्ती लाया गया। उनका मन अपने देश के साथ, उसकी संस्कृति से जुड़ा रहा। वही एक रिश्ता उन्हें पालता रहा, पोसता रहा। विदेश में रहना मजबूरी थी। मज़दूरी तो करनी थी, पेट तो भरना था, पर सुख उन्हें अपनी परम्परा से जुड़ कर ही मिलता था। राम-राम कहना। राम कथा सुनना-सुनाना। व्रत-त्योहार मनाना। अपने ही रीत-रिवाज़ से शादी-ब्याह करना। अंत्येष्टि करना। गीत गाना। पकवान बनाना। एक-दूसरे का सहारा बनना।
हम अमरीका अपनी मर्जी से आए हैं। जी-तोड़ मेहनत कर के भी, और तिकड़म लगा कर भी। कि कैसे वीसा आसानी से हासिल किया जा सकता है। कैसे पासपोर्ट जल्दी से बन जाए। कैसे अमरीका में नौकरी का इंतजाम हो जाए। कैसे ग्रीन-कार्ड मिल जाए, कैसे हम सिटिज़न बन जाएं। कैसे हम यहीं के हो जाएं।
जब शुरुआत से ही हम अपने देश से परेशान थे, तो फिर उसकी संस्कृति को क्यों ढोएं? जब भी किसी कार्य को हाथ में लिया, उसमें सफलता चाही और समय की कमी आई तो सबसे पहले अपनी संस्कृति को दरकिनार किया।
"कल मेरा फ़ाइनल है, मैं आज मंदिर नहीं जा सकता, आप लोग जाओ।
"परसो मेरा इंटव्र्यू है, तैयारी करनी है, मैं मामा के यहाँ शादी में नहीं जा सकता। आप लोग चले जाओ।"
"अब ये यज्ञोपवीत का भी क्या मतलब है। सब पुरानी बाते हैं। कोई पहनता तो है नहीं। बेकार का नाटक।"
"और ये मुण्डन? बिलकुल जोकर बना के रख दोगे आप तो।"
वगैरह, वगैरह।
लगभग हरेक तर्क उचित लगने लगता है। और धीरे-धीरे हम संस्कृतिहीन होते चले जाते हैं। जैसे ज्ञान की पोटली बन कर रह जाते हैं।
और इसी ज्ञान के सहारे सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते जाते हैं और आगे और आगे निकलते चले जाते हैं अपने परिवेश से, अपनी संस्कृति से।
जब सब इतना अच्छा चल रहा है तो इसमें हर्ज़ ही क्या है? क्या औचित्य है संस्कृति का? संस्कृति नौकरी नहीं देती। संस्कृति बंगला, गाड़ी, नौकर-चाकर पैसा नहीं देती।
ड्राईंग रूम की मेज पर कट फ़्लॉवर्स लगते तो सुंदर हैं, पर वे पनपते कीचड़-मिट्टी में पलकर ही है। कीचड़-मिट्टी को आप गंदा कह सकते हैं। नाक-भौ सिकोड़ सकते हैं। लेकिन सृजन में उनका योगदान नहीं भुला सकते।
इसीलिए हम संस्कृतिहीन, ज्ञान की पोटलियों की अगली पीढ़ी दयनीय स्थिति में आ जाती है। सर पर ज्ञान का बोझ, और ज्ञान भी वो जो बदलता रहता है। आज ये रटो तो कल वो। दिल कहीं लगता नहीं। सहारा कहीं मिलता नहीं। इस भरी दुनिया में अकेले रह जाते हैं।
कहाँ तो हम घुलने-मिलने के लिए आमादा थे, और अब अकेले रह गए।
भगवान का शुक्र है कि हालात अभी भी ज़्यादा बिगड़े नहीं हैं। भला हो बॉलीवुड का। जो काम माँ-बाप नहीं कर सके, वो हिंदी फ़िल्में करती हैं। राखी-दीवाली-होली आदि की जानकारी देती हैं। उन्हें हर्ष और उल्लास से जोड़ती हैं। कुर्ता-पजामा-शेरवानी-सलवार-कमीज़-पगड़ी आदि को पहनना फ़ैशनेबल बनाती हैं।
हम हमेशा सोचते रहते हैं कि भारतवर्ष इतना गौरव-शाली हुआ करता था, सारा वैभव कहाँ हवा हो गया? जिस देश समाज में विश्व को शून्य दिया, वो शून्य कैसे हो गया? सही कारण तो पता नहीं। लेकिन हमारे सामने जो आज हो रहा है, वह हमारी संस्कृति के विनाश की ओर एक और क़दम है। अक्सर हमें पास से चीज़ें साफ़ नहीं दिखती है।

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