ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
फिल्में क्यों बनाई जाएँ
01-May-2017 02:07 PM 1710     

अपने शुरूआती दौर से ही सिनेमा आम आदमी को सपनों की दुनिया में ले जाने का सस्ता, सुलभ साधन रहा है। मनोरंजन के अन्य साधनों की तुलना में सिनेमा अधिक लोकप्रिय भी है। भारत में सिनेमा के आरम्भिक काल में धार्मिक कथा-चित्रों का अधिक निर्माण किया गया। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को बचाए रखने के साथ-साथ धार्मिक चल-चित्रों में समाज के लिए उपयोगी संदेश भी होते थे। अगर सिनेमा हमारे समाज का प्रतिबिंब है, तो क्या आज इसकी कथावस्तु समाज से ही ली जा रही है? पुराने दौर में इसकी कथाओं में बाल-विवाह, दहेज-प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया गया और रोचक घटनाओं के द्वारा भाईचारा, जात-पांत के भेद-भाव को मिटाने का संदेश दिया गया। लेकिन समय के साथ सिनेमा का स्वरूप धीरे-धीरे बदल गया है। आज सिनेमा समाज के लिए कम और व्यवसाय के पक्ष में ज्यादा हो गया। फिल्में महज पैसा कमाने का माध्यम बन कर रह गई हैं। अब फिल्मों में जिस तरह हिंसा, अश्लीलता और कमजोर कथावस्तु दिखती है, वह उसकी समाज पर होती कमजोर पकड़ को ही प्रदर्शित करती है। एक वर्ष में हजारों फिल्में बनती हैं जिसमें से कुछ ही समाज में अपनी पहचान बना पाती हैं।
अगर वर्तमान समय की बात करें तो सिनेमा में कुछ मूलभूत परिवर्तन करना होगा। जिससे समाज में सकरात्मक परिवर्तन हो सके। विशेषकर युवा वर्ग में, क्योंकि आज का युवा वर्ग सिनेमा से अत्यधिक प्रभावित है, वो वही करता है जो सिनेमा में उनके पसंदीदा पात्र करते हैं, चाहे वो पहनावा हो या हेयर स्टाइल, बोलने का तरीका हो या काम करने का तरीका। कहने का तात्पर्य यह है कि आज का सिनेमा ऐसा होना चाहिए जो हमारे आज के युवा को एक राह दिखाए अपनी मंजिल तक पहुंचाने के लिए।
यह सही है कि आज भी अच्छी फिल्में बन रही हैं, लेकिन उनकी संख्या बहुत ही कम है। जब सिनेमा हमारे परिवार, घर और खुद हम पर भी इस कदर हावी हो चुका है कि हम चाह कर भी खुद को सिनेमा से अलग नहीं कर सकते तो समाज में सकरात्मक परिवर्तन के लिए ये नितान्त आवश्यक है कि बेहतरीन फिल्मों की संख्या में बढ़ोतरी हो, ये ना सोचा जाये की सिर्फ फ़िल्में बनानी है बल्कि ये सोचा जाये की फिल्में क्यों बनानी है?
विगत जनवरी माह में यहाँ शिकागो के थियेटर (ॠग्क् द्यण्ड्ढठ्ठद्यड्ढद्ध) में नव वर्ष के उपलक्ष्य में हिंदी फ़िल्म दंगल देखने का अवसर मिला। वर्ष का पहला सप्ताह, साथ में हल्की बर्फ़बारी से मौसम बहुत ही अच्छा हो चला था। इस तथ्य से सभी अवगत हैं कि अमेरिका में भी हिंदी फिल्मों की दीवानगी भारत जैसी ही दिखाई देती है। यहाँ भी भारतवंशी हिंदी फिल्मों के प्रदर्शित होने का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं।
दंगल फ़िल्म पहलवान महावीर सिंह फोगाट के जीवन पर आधारित है, जो पहले अपनी बेटियों को कम आंकते हैं। बाद में उन्हें अहसास होता है कि बेटियां भी वह काम कर सकती हैं, जिसकी उम्मीद वे बेटों से लगाये बैठे थे। इतनी सी कहानी को बहुत ही बेहतरीन तरीके से नितीश तिवारी ने फ़िल्म में दर्शाया है। फ़िल्म दर्शकों को अन्त तक बाँधे रखती है।
मेरी एक बेटी है और जब मैं यह फ़िल्म देखने गयी उसके कुछ दिनों बाद ही मेरी दूसरी बेटी ने जन्म लिया। मुझे लगता है कि मेरा परिवार पूरा हुआ। यह फ़िल्म मुझे मेरी बेटियों से जोड़ती है। मेरी नजर में एक बेहतरीन फ़िल्म वही है, जिसे देखने के बाद हमें ये लगे बस यही तो मेरी कहानी है।

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