ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सपने न हों तो क्या कीजे
01-May-2017 01:56 PM 1960     

मेरा सौभाग्य कहिए कि दुर्भाग्य कि हिन्दी फ़िल्मों का मेरे जीवन पर विशेष प्रभाव रहा है। भारतीय संस्कृति क्या है, मेरा इसमें क्या किरदार है, यह मुझे हिन्दी फ़िल्मों ने ही सिखाया है। राखी, होली, दीवाली आदि त्योहारों की पहचान और महत्ता हिन्दी फ़िल्मों की ही देन है। गीत-संगीत की तरफ़ जो मेरा रुझान है, उसका श्रेय हिन्दी फ़िल्मों को ही जाता है। यहाँ तक कि मेरा बर्फ़ीले पहाड़ों से मोह और दुनिया भर घूमने की लगन का सेहरा हिन्दी फ़िल्मों पर ही है। कुल मिलाकर यह समझिए कि हिन्दी फ़िल्में न होती तो मैं पैसे कमाने वाला हाड़मांस का पुतला बन कर रह जाता। न तहज़ीब होती, न अदब।
मेरा जन्म छोटे से गाँव शिवगढ़ में हुआ। बेहद ग़रीबी में बचपन गुज़रा। किन्हीं कारणवश प्राथमिक शिक्षा ननिहाल में हुई। दुर्भाग्य था कि पिता साथ नहीं थे। पर सौभाग्य था कि भरापूरा संयुक्त परिवार मिला। ख़ूब प्यार मिला। ख़ुशियाँ मिलीं। ख़ूब तीज-त्योहार मनाएँ। संस्कृति से पहचान हुई। पर यह बहुत कच्ची उम्र थी। यदि हिन्दी फ़िल्में इन्हें फिर से न दर्शाती तो मैं उन्हें सदा के लिए भूल जाता।
माता-पिता की इज़्ज़त करना, सेवा करना, समय आने पर उनका सहारा बनना, श्रवण कुमार की कहानी से सुना था। लेकिन उसे आधुनिक युग में घटित होते हिन्दी फ़िल्मों में ही देखा। जो कि परी कथा नहीं, सम्भव लगता था। अनुकरणीय था।
मेरी नज़रों में दीवार फ़िल्म से जो मैंने सीखा, वो गीता से भी नहीं।
अपने बेटे की रोटी चुराने के अपराध की पैरवी न करते हुए, एक शिक्षक का यह कहना :
"चोरी चाहे एक पैसे की हो या एक लाख की, चोरी तो चोरी हैं। लाखों लोग भूखे हैं, इसका मतलब ये तो नहीं कि सब चोर हो जाए।"
एक भाई का दूसरे भाई से कहना :
"दूसरों के पाप गिनाने से ख़ुद के पाप कम नहीं हो जाते।"
एक माँ का अपने ग़लत काम करते हुए बेटे से यह कहना :
"जिसने तुम्हारे हाथ पर लिख दिया, "मेरा बाप चोर है", वो तुम्हारा कौन था? तू तो मेरा बेटा है, तूने कैसे मेरे माथे पर लिख दिया कि "मेरा बेटा चोर है।"
और फिर एक भाई का दूसरे भाई से कहना :
"आज मेरे पास बिÏल्डग है, प्रापर्टी है, बैंक बैलेन्स है, बंगला है, गाड़ी है। क्या है, क्या है तुम्हारे पास?"
और दूसरे भाई का चार शब्दों का जवाब जो आज तक मेरे जीवन में गूँज रहा है :
"मेरे पास माँ है।"
ये चार शब्द हॉलीवुड की कोई फ़िल्म कभी नहीं समझ सकती। मैं पिछले 31 साल से ऐसी संस्कृति में रह रहा हूँ, जहाँ बेटे का माँ-बाप के साथ रहना हेय-दृष्टि से देखा जाता है। हिन्दी फ़िल्में न होती तो मैं भी शायद इस संस्कृति को अपना लेता।
इसीलिए सोचता हूँ कि कुछ की नज़रों में यह मेरा दुर्भाग्य है कि मैं हिन्दी फ़िल्मों से इतना प्रभावित हूँ कि अमरीका में 31 वर्ष रहकर भी अमरीकन नहीं बन पाया हूँ। मैं भारत को भारत कहता हूँ तो भारतीय ऐसे देखते हैं जैसे किसी चिड़ियाघर से निकल कर आया हूँ। ऐसा नहीं कि ये भारत नहीं कहते या भारत से अनभिज्ञ हैं। बस भारत नहीं जाते, भारत से नहीं आते। इण्डिया जाते हैं, और इण्डिया से ही आते हैं। भारत शब्द तो मुँह से तब निकलता है जब "भारत माता की जय" के गरमा-गरम मुद्दे पर बहस करनी होती है।
हिन्दी फ़िल्मों के गीतों ने, उनकी धुनों की बजाय, उनके शब्दों ने, उनमें निहित अर्थों ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। कबीर के दोहे मुझे बहुत प्रिय हैं - कम शब्दों में बड़ी बात। यही बात हिन्दी फ़िल्मों के गीतों पर खरी उतरती हैं।
कोई भी तेरी, राह न देखे
नैन बिछाये ना कोई
दर्द से तेरे, कोई न तड़पा
आँख किसी की ना रोई
कहे किसको तू मेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहाँ
वहाँ कौन है तेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहाँ
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कभी ये भी सोचा कि मंज़िल कहाँ है
बड़े से जहाँ में तेरा घर कहाँ है
जो बाँधे थे बंधन वो क्यों तोड़ डाले
कहाँ जा रहा है तू ऐ जाने वाले
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ये जीवन है इस जीवन का यही है रंग रूप
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ज़िंदगी का सफ़र है यै कैसा सफ़र
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ज़िन्दगी कैसी है पहेली
कभी ये हँसाए, कभी ये रुलाए
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मेरा जीवन कोरा काग़ज़, कोरा ही रह गया
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कभी पलकों पे आँसू हैं, कभी लब पे शिकायत है,
मगर ऐ ज़िन्दगी फिर भी मुझे तुझसे मुहब्बत हैं
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हर घड़ी बदल रही है रूप ज़िन्दगी
छांव है कभी, कभी है धूप ज़िन्दगी
हर पल यहाँ जी भर जियो
जो है समां कल हो न हो
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असंख्य गीत हैं जो जीवन के हर मोड़ पर सहारा बनते हैं, प्रेरणा देते हैं। चाहे वो शैलेन्द्र ने लिखे हो, या आनन्द बक्षी साहब ने या प्रसून जोशी ने। सब के सब प्रभावशाली हैं, प्रेरणादायी हैं।
मेरी कार में, मेरे फोन पर, मेरे घर पर, पल-पल के साथी हैं। इन्हीं की बदौलत घर में महफ़िलें जमी हैं, जश्न हुए हैं। और इन्हीं कलाकारों के मेरे शहर में आयोजित कार्यक्रमों में मैं हर्ष और उल्लास के साथ जाता हूँ। कुल मिलाकर हिन्दी सिनेमा मेरे जीवन का, मेरे जीवन के रस का अभिन्न अंग है।
जहाँ तक हॉलीवुड की फ़िल्मों का सवाल है, मैंने भारत में रहते इक्का-दुक्का ही अंग्रेज़ी फ़िल्में देखी थीं। और वे भी पल्ले नहीं पड़ीं थीं। मेरी अंग्रेज़ी की पढ़ाई पाँचवीं के बाद ही शुरू हुई थी। भूगोल, इतिहास, नागरिक शास्त्र सब की हिन्दी में ही पढ़ाई की। इसलिए अंग्रेज़ी कम समझ में आती थी। आज भी अंग्रेज़ी फ़िल्म बिना सबटाईटल के समझ नहीं आती। इसलिए थिएटर में देखने से आनाकानी करता हूँ, क्यूँकि वहाँ बिना सबटाईटल के देखनी पड़ती है। सबसे बड़ी दिक़्क़त होती है पात्रों को उनके नाम से जोड़ने की। हिन्दी फ़िल्मों में भी पात्रों के नाम याद नहीं रहते, लेकिन कोई दिक़्क़त नहीं होती कि कौन किसकी बात कर रहा है। अंग्रेज़ी फ़िल्म में उलझन होती है। इतने पात्र हैं, कौन राबर्ट, कौन पीटर, कौन हेनरी? सब गड्डमड्ड हो जाता है। फिर कई शब्द साफ़ बोलते भी नहीं हैं।
अंग्रेज़ी फ़िल्में भी अच्छी होती हैं। पर ऐसी बहुत कम जो पूरे परिवार के साथ देखी जा सके। कहीं बहुत ज़्यादा अंग प्रदर्शन है, तो कहीं बहुत ही हिंसा। जो देखी जा सकती हैं, वे वाक़ई अच्छी होती हैं। एक विषय पर केन्द्रित होती हैं। विषय से भटकती नहीं। कलाकारों की भी पूरी कोशिश रहती है विषयवस्तु के साथ पूर्णत: न्याय करने की।  
लेकिन मेरे दिल को फिर भी तृप्ति नहीं होती जब तक हिन्दी फ़िल्म न देख लूँ। जैसे "डायल एम फ़ॉर मर्डर"। बेहतरीन फ़िल्म है। पर "ऐतबार" उससे कई गुना अच्छी है। कितने ख़ूबसूरत कर्णप्रिय गीत हैं। याद करते से ही मन पुलकित हो उठता है। कॉलेज के दिन याद आ जाते हैं। "किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है..."
कई लोग नक़ल को नीची निगाह से देखते हैं। मैं तो इसे मुझ जैसे दर्शक के लिए वरदान कहता हूँ। यदि नक़ल न होती तो मैं असल के बारे में अनजान ही रह जाता। जैसे कि "इतना न मुझसे तू प्यार बढ़ा कि मैं इक बादल आवारा..."
यह गीत मोज़्ज़ार्ट की सिम्फोनी 40 की नक़ल माना जाता है। मैंने मोज़्ज़ार्ट को कभी सुना नहीं और न ही शायद कभी सुनने की चाह रखता, यदि सलिल चौधरी यह हिन्दी गीत नहीं बनाते।
हॉलीवुड की फ़िल्म सपने नहीं बेचती। कई लोग इस बात की तारीफ़ करते हैं। मैं तो चाहता हूँ कि वे सपने दिखाएँ, दर्शकों को सपने देखने की प्रेरणा दें। सपने ही तो हैं जो हमें सुबह उठने की शक्ति देते हैं। एक नए कल के निर्माण की ओर प्रेरित करते हैं। पहाड़ों में घूमने की, विदेश भ्रमण की इच्छा जाग्रत करते हैं। सपने न हो तो जीवन नीरस है।   

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