ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
विनीता तिवारी
विनीता तिवारी
राजस्थान में जन्म। राजस्थान विश्वविद्यालय से रसायन विज्ञान में बी.एस.सी. (ऑनर्स), बी.एड. तथा कम्प्यूटर में डिप्लोमा। कविताएँ एवं ग़ज़लें लिखने के अलावा भारतीय शास्त्रीय संगीत एवं नृत्य में रुचि। ग़ज़लों को संगीतबद्ध कर प्रस्तुत करती हैं। सम्प्रति - अमेरिका के वर्जिनिया में निवास एवं काउंट्री स्कूल में शिक्षिका।

देश-विदेश के दरम्यान
तरक़्क़ी की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते हम अपने औ अपनों से कितनी दूर निकल जाते हैं, पता ही नहीं चलता। समय की बेलगाम उड़ान हमें कब, कहाँ से उड़ा के ले जाती है ये समय गुज़र जाने के बाद ही पता चलता है... इसी तरह की बहुत-सी पंक्तियाँ हम सभी ने कभी ना कभी अपने जीवन क
जौहर की ज्वाला के आधुनिक संदर्भ
भारत में किसी फ़िल्म को लेकर इतना बवाल, इतनी तोड़फोड़ और मरने मारने की धमकियाँ सुनने और देखने का यह मेरा पहला और अनोखा अनुभव है। एक फ़िल्म जो अभी परदे तक पहुँची भी नहीं और जन सामान्य ने देखी भी नहीं, मगर फिर भी कही सुनी बातों और पूर्वानुमानों के आधार
आधी आबादी का पक्ष
पिछले महीने की आठ तारीख़ यानी आठ मार्च को जब दुनियाभर में अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा था तो मेरे दिमाग़ की शिराओं में महिलाओं की सदियों से चली आ रही व्यथा कथा की चित्रमाला दौड़ रही थी। अपने दिमाग़ के कोने में चल रहे इन चलचित्रों को देखकर लग
वर्जीनिया इज़ फ़ॉर लवर्स
हिंदुस्तान की सर ज़मीन से विवाहोपरांत जब पैर उखड़े तो सीधे अमेरिका की धरती पर आकर पड़े। यहाँ की चौड़ी-चौड़ी, साफ़-सुथरी सड़कें, उन पर क़तारों में चलती बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ, गगनचुंबी इमारतें और इन सबसे कुछ ही दूर घने, लम्बे, सीधे खड़े पेड़ों से भरे ख़ूबसूरत जंगल,

विदेश में देश
देश से बाहर निकले करीब उन्नीस साल हो गए लेकिन इन उन्नीस वर्षों में से शुरू के लगभग तेरह वर्ष ऐसे थे, जिनमें हर दिन, हर पल अपने देश लौट जाने की चाह थी। उन्हीं, पीछे छूटी, भीड़-भाड़ वाली गलियों और चौराहों के सपने थे। जोर-जोर से बजने वाले लाउडस्पीकरों,
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