ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंदी फिल्मों के विविध आयाम
01-May-2017 02:17 PM 3156     

दुनिया में भारत की पहचान जहां भारतीय संस्कृति एवं कठिन परिश्रम को लेकर होती है। वहीं विश्व में हिंदी सिनेमा यानी बॉलीवुड को भी खूब सराहा जाता है। हिंदी सिनेमा ने भारतीय संस्कृति को विश्व में भलीभांति प्रस्तुत किया है। वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोगों ने इसे हिंदी सीखने के माध्यम के तौर पर भी अपनाया है। हिंदी सिनेमा में प्रयोग किये संवाद बहुत प्रचलित हो जाते हैं। जो हिंदी नहीं जानते हैं वे भी इन्हें अक्सर दोहराते हैं।
हिंदी सिनेमा के बहुत से संवाद इतने प्रसिद्ध हुए हैं कि उनका जादू देश-विदेश में लोगों की जवान पर चढ़ गया। इन संवादों को हम दैनिक जीवन में भी अधिकांशत: प्रयोग करने लगते हैं। जिन्हें कई सामाजिक संदर्भों में भी उपयोग कर लिया जाता है जैसे -
"आज मेरे पास गाड़ी है, बंगला है, पैसा है, तुम्हारे पास क्या है?"
"मेरे पास माँ है।"
"रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं।"
"हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं।"
इन वाक्यों को व्यंग्य विनोद के रूप में अधिकतर प्रयोग किया जाता है, जो कि मनोरंजन का साधन हो जाता है।
विदेशों में हिंदी पाठ्यक्रम में हिंदी फिल्मों को हिंदी सीखने के माध्यम के रूप में भी प्रयोग किया जा रहा है। जैसे फिजी में हिंदी डिप्लोमा के पाठ्यक्रम में हिंदी फिल्मों को भी स्थान दिया गया है तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ अन्य कई देशों में फिल्मों को हिंदी पाठ्यक्रमों के स्थान प्राप्त हुआ है।
हिंदी फिल्मों के कारण ही बहुत से देशों से पारस्परिक संबंध भी मजबूत हुए हैं जैसे रूस में हिंदी फिल्म का गाना "मेरा जूता है जापानी..." बहुत प्रचलित हुआ। रूस में यह फ़िल्मी गीत बहुत लोगों ने याद किया था और इस के माध्यम से रूसी लोग भारत के निकट आये थे। ऐसे अन्य देश भी भारतीय फिल्मों को देखकर यहां के समाज को समझना चाहते हैं और उस में रुचि दिखते हैं।
हिंदी फिल्मों के सभी विषय प्रमुखता से दिखाई जाते हैं जिनमें गंम्भीर विषयों से लेकर हास्य-विनोद, वास्तविकता से कल्पना, उत्साह जगाने से लेकर देशभक्ति तक के सभी विषय बहुत सहजता से तथा कलात्मक रूप से हिंदी फिल्मों में प्रस्तुत किये जाते हैं, जिनसे लोग बखूबी प्रभावित भी होते हैं।
हिंदी सिनेमा में खेल जगत को भी बहुत अच्छे तरह से दर्शाया जाता है और बहुत-सी फिल्में खेलो को आधार बनाकर बनायी गई हैं जैसे "लगान", "चक दे इंडिया" और हाल ही में चर्चित "दंगल"। इन फिल्मों से न केवल खेल भावना विकसित होती है, बल्कि प्रेरणा भी मिलती है।
हिंदी फिल्में जहां मनोरंजन का साधन हैं वहीं सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए भी प्रयत्नशील रहती हैं। अनेकों फिल्मों में दहेज़ प्रथा के विरुद्ध बनी सामाजिक समरसता भी उभारी गई है तथा जात-पांत आदि के विरुद्ध भी फिल्मों ने आवाज उठाई है। दबंग फिल्म में लड़कियों को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी गई है। इतना ही नहीं लड़कियों को हर क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा फिल्में लगातार देती हैं। जिस से हम समाज की बुराइयों को दूर कर सकें।
हिंदी फिल्में देशभक्ति की अलख जगाने में भी पीछे नहीं हैं। कुछ आधुनिक फिल्में देशभक्ति के लिए चर्चित हुईं, जैसे "एयर लिफ्ट", "रंग दे बसंती", "बॉर्डर" तथा "बेबी"।
कुछ फिल्मों के डॉयलाग जो युवाओं के सिर चढ़कर बोले, उनमें थे -
"एक सच्चे देशभक्त को हम फ़ौज से निकाल सकते है, लेकिन उसके दिल से देशभक्ति नहीं।"
"चाहे हमें एक वक़्त की रोटी न मिले, बदन पे कपड़े न हों, सर पे छत न हो, लेकिन जब देश की आन की बात आती है, तब हम जान की बाज़ी लगा देते हैं।"
फिल्मों का दूसरा पहलू भी है जहां फिल्में प्रेरणा देकर समाज सुधार का माध्यम बनीं, वहीं हिंदी फिल्मों ने समाज को कुछ बुराईयां भी दी हैं। हर सिक्के के दो पहलू होते हैं इसलिए हमें बुराइयों के प्रति भी सावधान होना चाहिए। फिल्मों में बहुत कुछ ऐसा होता है जहां वे वास्तविक जीवन से कोसों दूर होती हैं, परन्तु अबोध मन उसे सत्य मान कर उसमें जीने लगता है। वह फ़िल्मी नायकों का फिल्मों के अनुसार अनुसरण करने लगता है और वास्तविकता से दूर होने के कारण उनके जीवन में बहुत से संकट आ जाते हैं। कई बार अच्छे भले युवक-युवतियां, जिनमें बहुत सी प्रतिभा होती है वे फिल्मों की ख्याति के कारण उनमें जाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाते हैं जिसके कारण उन्हें आगे चलकर बहुत से संकटों का सामना भी करना पड़ता है।
इसी प्रकार नकारात्मक फिल्मों को देखकर बहुत से युवक अपराध जगत कि और बढ़ जाते है। इसका  मनोवैज्ञानिक कारण यह है कि दृश्य माध्यम श्रव्य माध्यम से अधिक शक्तिशाली होता है। इसलिए हिंदी सिनेमा बनाने वालों की यह बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिये कि वह बुराईयों को कम दिखाएँ और उनको इस तरीके से दिखाया जाये कि वह समाज में किसी भी वर्ग के लिए प्रेरणा न बने।
अनेक बार फिल्मों के नायकों को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि वह हर प्रकार से समर्थ हैं, अजेय हैं और फौलाद के बने हैं, जबकि आम जीवन में ऐसा कोई चरित्र नहीं होता।
हिंदी फिल्मों के एक बड़े हिस्से में डांस और गाने होते हैं जिसके कारण हिंदी फिल्में अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा में एक अपनी अलग पहचान बनती हैं और लोग इन्हें सीखने के लिए लालायित हो उठते हैं। उल्लेखनीय है कि विदेशों में हिंदी फिल्मी गानों को सिखाने के लिये अनेक केंद्र संचालित हैं जिनमें देशी-विदेशी युवक-युवतियाँ शामिल होते हैं।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि फिल्में मानव जीवन का एक अहम हिस्सा तो हैं ही पर उन्हें मनोरंजन के लिए ही या मनोरंजन के तौर पर ही लिया जाये तो उचित है। हिंदी फिल्मों को सामाजिक सोद्देश्यता के अपने मूल उद्देश्य को भी स्मरण रखना चाहिये।

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