ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-15पञ्चवटी
CATEGORY : विमर्श 01-Mar-2017 08:41 PM 1379
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-15पञ्चवटी

चारू चन्द्र की चंचल किरणें, खेल रही है जल थल में, स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई थी अवनि और अंबर तल में - राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त यह लिखकर अमर हो गये। पञ्चवटी की शुरुआत हुई वाल्मीकि से। वाल्मीकि के भौगोलिक संधान में उनको ऐसी एक जगह की जरूरत थी, जहां कुछ नाटकीय घटना बन जाये। अधर्म से धर्म का युद्ध उनकी भावना थी, लेकिन इसका काव्यिक प्रकाश शब्दों से नहीं होता, उसके लिये परिवेश चाहिये। पञ्चवटी के स्वच्छ वातावरण में अधर्म हो ही नहीं सकता, लेकिन अधर्म मनुष्य की प्रकृति में है, चाँद में मनुष्य ही काला घेरा फेंक सकता है।
चित्रकूट से निकलने के बाद रामजी, लक्ष्मण और सीता दंडकारण्य जंगल में दस साल तक ऋषियों के आश्रम में घूमते रहे। राजा दशरथ के पुत्र होने के नाते ऋषियों का उनके ऊपर सद्भाव था। रामजी खुद ही ऋषियों के सत्संग के आशयी थे। यह सारा समय आश्रमों के आतिथ्य परिवेश से बीत गया। उन्होंने राक्षसों के दुष्ट कर्मों के बारे में सुना और उनके अपकर्मों को अपनी आँखों से देखा। ऋषियों के आश्रम में शांति प्रदान करना क्षत्रियों का धर्म है, ऐसी भावना के तहत उन्होंने इस कार्य के लिये अपने को मन से तैयार कर लिया।
ऋषि अगस्त्य बारे में और राक्षसों के साथ उनकी चमत्कारी शक्ति का रामजी को पता चला। वह अपने भाई और पत्नी के साथ दक्षिण की ओर चल पड़े। जब वे वहाँ पहुँचे तो ऋषि अगस्त्य ने उनको पहचान लिया और अपने संरक्षित अस्त्रों में से कुछ विशेष तीर और शर उनको दिये। रामजी परिवार समेत ऋषि के आश्रम में रह सकते थे, लेकिन उनके मन में सीताजी का मन बहलाने का इरादा था। उन्होंने ऋषि अगस्त्य को अपनी सोच बतायी और ऋषि ने उनको पञ्चवटी में घर बसाने की सलाह दी। गोदावरी के किनारे पांच वट वृक्षों से सजा हुआ धरती में स्वर्ग पञ्चवटी। ऋषि ने जगह की तारीफ की और रामजी को पञ्चवटी का रास्ता बता दिया।
पञ्चवटी में पहुँचते ही रामजी को उनके अभियान के पहले मित्र का दर्शन हुआ। जटायु एक गिद्ध था। बूढ़ा हो गया था। उसने रामजी को पहचाना और अपनी सारी वंश परम्परा उनको सुनाई। ब्रह्माजी के मानस पुत्र कर्दम से शुरू करके उसने सारे ब्राह्मणों का वर्णन अपनी भाषा में रामजी के सामने रखा। राजा दशरथ उसके सगे जैसे हैं और इसलिए सीता उसकी पुत्रवधू जैसी है। जंगल में पुत्रवधू का ख्याल रखना उसका कर्तव्य है। रामजी को वृद्ध का आशीर्वाद मिला और मैत्री भी। वृद्ध जटायु को भी अपने जीवन की शेष अवस्था में कुछ धार्मिक काम मिल गया। यह है भारतीय संस्कृति के ऊपर वाल्मीकि की नजर!
साधु और मनुष्यों के ऊपर राक्षसों के जुल्म जटायु ने अपनी आँखों से देखा था और रामजी की प्रतिज्ञा शायद उसको मालूम थी। वह जानता था कि निर्जन जंगल किसी औरत के निवास के लिये आशंका पूर्ण है। अतः उसने खुद ही अपने को उसकी रक्षा के लिये नियुक्त कर लिया। इसका तात्पर्य रामजी को तभी ज्ञात हुआ जब सीता का अपहरण हुआ। तब भी रामजी जटायु को पहचान न सके जब तक जटायु ने रावण के साथ उसके युद्ध का वर्णन नहीं किया। इस कथा के साथ ही जटायु के होश खो गये और वह मर गया। पञ्चवटी में रामजी ने अपनी पत्नी को खोया था और अपने पहले मित्र का शेषकृत्य किया।
राक्षसों के अड्डे का नाम था जनस्थान, जो पञ्चवटी के नजदीक ही था। पहले यह एक पुण्य स्थान था, जिसको राक्षसों ने साधुओं को भगाकर अपना कर लिया था। हजारों राक्षस वहां अपना ढेरा बनाये रखे थे और उधर से दूसरी जगहों पर पहुँच कर मुश्किलें बढ़ाते। उधर से ही रावण की बहन सूर्पणखा अपने को सजाकर रामजी को मनाने आई। रामजी ने शायद उसकी कुमति पहचान ली और उसको भाई लक्ष्मण के पास भेज दिया। सूर्पणखा ने इसी बीच सीता को देखा और उसके ऊपर कूद पड़ी। सीताजी को बचाने के लिये लक्ष्मण ने सूर्पणखा के नाक और कान काट कर उसको विकृत कर दिया।
सूर्पणखा छोड़ने वाली नहीं थी। उसने अपनी बात जनस्थान में सेनापति खर को बतायी। खर ने पहले अपने चौदह राक्षस योद्धाओं को राम से युद्ध करने के लिये भेजा। रामजी ने उनको आसानी से मार डाला। फिर खर ने चौदह हजार राक्षस सेना भेजी और वह सब भी रामजी के हाथ मारे गये। अंत में गुस्से में आकर खर खुद ही रामजी पर हमला बोलने को तैयार हो गया और सारे राक्षसों के लिये शहीद हो गया। अब सूर्पणखा लाचार थी और उसने अपने भाई रावण के पास पहुंचकर फरियाद की।
“"तुम्हें सीता जैसी पत्नी चाहिये। तुम राजा हो, सभी सुंदर वस्तुओं के ऊपर तुम्हारा अधिकार है।"’
यह सुन रावण को घमण्ड आ गया।
जब रामजी पहले पञ्चवटी आये तो उस जगह के साथ उनकी दोस्ती बन गयी थी। गोदावरी नदी, फूलों के तालाब, फल-फूल से भरे हुए पेड़ और लताएं, जानवरों के झुंड, उन्हें यह सब एक साथ देखने को मिला। सबसे प्यारा था- पांच बटवृक्ष। जिनके विस्तार ने अपनी सैकड़ों शाखाओं को बिखरा कर वहां प्रकृति में जादू करके रखा था। यहाँ रोशनी और छाया का खेल दिनभर चलता था। इस परिसर में उनकी लाड़ली सीता घूमती हुई अपनी मर्जी चलाती रहती। यह भावना रामजी के लिये अनमोल थी। सीता भी प्यार से गोदावरी में नहाती थी, फूलों से अपने को सजाती थी, जंगल को घर जैसा मानती थी।
धरती को छूती हुई वटवृक्षों की शाखायें रामजी की दुश्मन बन गयी। राक्षस राजा रावण ने अपने भृत्य मारीच को हिरन का वेश पहनकर वहीं शाखाओं की गहनाई में घूमने को प्रोत्साहित किया। फिर आदेश दिया। मारीच सोने के रंग के हिरन के वेश में अपने को सजाकर उन शाखाओं के बीच हिरन जैसे कुलाचें मारता हुआ इधर-उधर घूमता रहा। यद्यपि यह दृश्य अस्वाभाविक था, तो भी सीता को उस हिरन के ऊपर लालच आ गया। लक्ष्मण को मालूम था कि कोई जालसाजी कर रहा है, लेकिन वह रामजी को हिरन का पीछा करने से रोक नहीं पाये। रामजी हिरन के पीछे ज्यों ली गये वह आगे-आगे भाग चला। अंत में जब उसको रामजी ने शर मारा तो उसका राक्षस शरीर निकल आया।
यह था पञ्चवटी का जादू। जहां रोशनी और छाया के खेल से प्रकृति वहां लुभाती है। यह बात शायद कवि वाल्मीकि को पता थी इसीलिये उन्होंने इस नाटक के लिये पञ्चवटी को चुना। मारीच मनुष्य के स्वर से "हा सीता", "हा लक्ष्मण" करके पुकारने लगा तो सीता उसके जाल में और गंभीरता से  फँस गईं। उन्होंने लक्ष्मण को धिक्कार करके राम के पास जबर्दस्ती भेजा और खुद अकेली दोनों भाइयों की राह देखने लगी। इस तरफ रावण ब्राह्मण का वेश पहनकर सीता के पास भीख माँगने आया। धार्मिक सीता अधर्म न होने के नाते रावण को भीख देने के लिये कुटिया से बाहर निकल आई। रावण उसको उठाके अपने विमान में बिठाकर भाग चला। पञ्चवटी निर्जनता में किसी को यह बात पता ही नहीं चली।
अकेले वृद्ध गिद्ध ने ही रावण को देखा और उसका सामना किया। अपने पंखों से गिद्ध ने रावण के रथ को तोड़ दिया। रथ के घोड़े घायल हो गये। रावण ने फिर अपने खड्ग से जटायु के पंखों को काट डाला और उसको घायल कर दिया। उस तरफ रामजी सीताजी को कुटिया में न देखकर हैरान हो गये- "हे कदम्ब, मेरी सीता को तुमने देखा है? बोल, अशोक, मेरी सीता कहां है? हे अर्जुन, तूने क्या सीता को छुपाया है?" कोई आवाज नहीं आई। वे फिर घबराते हैं- "अरे हिरन, तूने क्या मेरी सीता को देखा है? अरे शेर, बोल तो जरा, मेरी सीता कहां गई?" सारा पञ्चवटी अभी राम का परिवार बन गया है। सब जगह सन्नाटा है, सीता नहीं है।
कुछ देर में रामजी जटायु को गिरा हुआ देखते हैं। अपने घायल शरीर से रोता हुआ जटायु रामजी को सीताजी का हाल सुनाता है और उसकी आखिरी सांस निकल जाती है। अपनी पत्नी के सन्धान में जाने से पहले रामजी को पहले और एक काम करना होता है। लक्ष्मण चिता की व्यवस्था करते हैं और रामजी जटायु का अंतिम संस्कार करते हैं। उन्होंने अपने पिताजी का संस्कार नहीं कर पाया था, जटायु को अपने पिता का सम्मान देते हैं और उसको पञ्चवटी में दाह करके जगह को श्रेयता देते हैं। पञ्चवटी हिन्दुओं के मोक्ष क्षेत्र में से एक बन जाता है।

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