ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
उर्दू साहित्यकार डॉ. वजाहत हुसैन रिजवी से प्रख्यात पत्रकार राजू मिश्र की बातचीत
01-Sep-2016 12:00 AM 5370     

जहां लफ्जों के मोती, एहसास की डोर में गुंथ जाते हैं तो शायरी का रूप धर लेते हैं और जब बोलों की शक्ल-सूरत अख्तियार करते हैं तो वो कहानी बन जाती है। शब्दों को किसी माला की मोतियों की मानिन्द सजाने-संवारने का हुनर सबके पास नहीं होता। डॉ. वजाहत हुसैन रिजवी के लिए नौकरी की मसरूफियत के बीच लिखने-पढ़ने के लिए वक्त निकालना चुनौतीपूर्ण तो है, लेकिन नामुमकिन नहीं। इस जज्बे के तहत साहित्य के साथ-साथ मीडिया की दोनों बाहों (पिं्रट-इलेक्ट्रॉनिक) को सलीके से थामे रखने की जिम्मेदारी कंधों पर उठाए आज भी कलम का मजदूर बने हैं। वे कहते हैं कि मैंने अदब की जमीन पर कुछ उकेरने, कुछ सृजन करने की कोशिश की है। वे उत्तरप्रदेश सरकार की उर्दू पत्रिका "नया दौर" के संपादक हैं। "नया दौर" के कई यादगार अंक उन्होंने निकाले हैं। उर्दू नावेलेट का तहकीकी व तनकीदी तजजिया, "हीरे पत्थर", "दीवाने समर", अली जवाद ज़ैदी (मोनोग्राफ), "उर्दू नावेलेट : हैय्यत, असालीब और रुझानात" और "अयामा" डिप्टी नजीर अहमद (तदवीन) उनकी लिखी कुछ ऐसी किताबें हैं जिन्होंने खासी लोकप्रियता पाई। राजू मिश्र ने उनसे लंबी गुफ्तगू की। प्रस्तुत हैं इसके खास हिस्से :
आधुनिक उर्दू-साहित्य की धारा को कैसे बयान करेंगे?
उर्दू साहित्य में आधुनिकता का रुझान इंसान की आंतरिक भावनाओं के जन्म से लिया गया है, चूंकि ये दृष्टिकोण प्रगतिशील आंदोलन को रद्द करने के कारण अस्तित्व में आया अत: इसको समझने के लिए प्रगतिशीलता की मूलभूत वस्तुस्थिति को ही देखना होता है। इसलिए कि प्रगतिशील आंदोलन का केंद्रीय विषय इंसान की वाह्य समस्याओं और समाज के सामूहिक विषय से था। इस कारण समय के बदलाव के साथ इस रुझान में भी तब्दीली पैदा हुई। क्योंकि प्रगतिशीलता से ही आधुनिकता ने जन्म लिया। इंसान को केवल वाह्य या सामाजिक समस्याओं से सम्बद्ध नहीं होना चाहिए, बल्कि इंसान की अपनी जात भी अहमियत रखती है इसलिए कि इंसान भी इसी समाज का एक हिस्सा है और उसकी आन्तरिक समस्याओं की अनदेखी नहीं की जा सकती।
कुर्रतुलऐन हैदर, राजिन्दर सिंह बेदी, जोश मलीहाबादी, फिराक़ गोरखपुरी और फैज़ के बाद किसके नाम का उल्लेख करेंगे, जिसने सृजन के जरिये समाज को दिशा दी हो?
उर्दू शायरी में फैज़ के बाद इरफान सिद्दीकी, मुनीर नियाजी, इफ्तेखार आरिफ और नासिर काजमी, निदा फाजली, शहरयार वगैरह का नाम महत्वपूर्ण है और कथा साहित्य में गोपी चन्द नारंग, शमसुर्रहमान फारूकी, रतन सिंह, रामलाल, आबिद सुहेल, इकबाल मजीद, शमयूल अहमद, तारिक़ छतारी, फैय्याज रफत आदि का नाम है, जिन्होंने उर्दू साहित्य में अपनी बौद्धिक प्रथा कलात्मक दृष्टि से अदब को नई दिशा से परिचित कराया।
बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक की मानसिकता उर्दू साहित्य को कहां तक प्रभावित करती है?
भाषा के बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक वाले दृष्टिकोण ने दोनों भाषाओं अर्थात हिन्दी-उर्दू को काफी नुकसान पहुंचाया है। इसलिए दोनों के विकास के लिए इन दोनों भाषाओं को मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता है। ऐसा करने से दोनों भाषाओं को खुलकर फलने-फूलने का मौका मिलेगा।
उर्दू में लिखे जा रहे साहित्य के व्यापक फैलाव में इसकी लिपि बाधा बनती है?
उर्दू में उच्चकोटि के साहित्य का सृजन किया जा रहा है। लेकिन उर्दू लिपि न जानने वाले इससे वंचित हैं यह बात किसी हद तक दुरुस्त भी है, इसलिए इसकी एक सूरत यह है कि उर्दू साहित्य का अनुवाद दूसरी भाषा में किया जाए, ताकि उससे लोग ज्यादा से ज्यादा फायदा ले सकें। ये समस्या केवल उर्दू भाषा के साथ नहीं, बल्कि दुनिया की बड़ी ज़बानों के साथ भी है।
उर्दू के साहित्यकार देवनागरी को अपनाएं, आप क्या कहेंगे?
मैं उर्दू को देवनागरी लिपि में लिखे जाने का क़ायल नहीं हूं। इसलिए कि इससे भाषा की बहुत हानि होती है, भाषा के विकास में रुकावट आती है और भाषा की आत्मा तथा गुणवत्ता लिपि बदलने के साथ लगभग समाप्त हो जाती है। मैं इसके लिए कतई तैयार नहीं हूं। लिपि ही भाषा की पहचान होती है। इसकी जिन्दा मिसाल फिल्में हैं, जो उर्दू में होने के बावजूद हिन्दी फिल्में कही जाती हैं।
इधर हिंदी-उर्दू की भाषा राजनीति कुछ ठंडी-ठंडी चल रही है, सच है?
यह बात तो दुरुस्त है कि हिंदुस्तान की हर उस चीज़ का तेजी के साथ राजनीतिकरण किया गया है, जिससे ज्यादातर लोगों के आस्था, श्रद्धा, धर्म, समाज, अर्थव्यवस्था यहां तक कि भाषा को भी एक विशेष मानसिकता रखने वाले लोग उसे मज़हब के चश्मे से देखते हैं। इसलिए ये नरमी-गरमी हिंदुस्तान के सियासी उतार-चढ़ाव की तरह अपना अंदाज भी बदलती रहती हैं।
यूं तो लगभग सभी भारतीय भाषाओं के पाठकों में कमी हो रही है, उर्दू के पाठकों का क्या हाल है?
वर्तमान दौर में ये स्थिति हिंदुस्तान की सभी भाषाओं के साथ है। इसके विभिन्न कारण हो सकते हैं, लेकिन इसका ये अर्थ कतई नहीं कि लोग हिंदुस्तान की प्रसिद्ध भाषाओं से अपना रास्ता अलग कर चुके है। अगर कोई ये सोचता है तो गलत है। हां हिंदुस्तान के जानी-मानी भाषाएं आधुनिक टेक्नालॉजी के विचित्र परिवेश में गुजर रही है, लेकिन समय के साथ इसमें अधिक सुधार की सम्भावनाएं पायी जाती हैं। उर्दू भाषा की वर्तमान स्थिति इतनी अच्छी नहीं जितनी अच्छी दिखाने की कोशिश की जा रही है। इसका सबसे बड़ा कारण भाषा का राजनैनिक दृष्टिकोण जिसने उर्दू जैसी मिली-जुली तहजीब का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा को केवल मुसलमानों से जोड़कर उसका राजनीतिकरण कर दिया। जिसकी वजह से हिन्दुस्तान का एक बड़ा तबका मजहब के नाम पर उससे दूर हो गया है। हालांकि लोग उर्दू जबान की शीरीनी (मिठास) और खूबियों की तारीफ जरूर करते हैं, लेकिन वो उसे सीखने से दूर नजर आते हैं। अब मौजूदा दौर में जदीद टेक्नालॉजी ने इस सोच को ग़लत साबित कर दिया। लोग उर्दू जुबान की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। इंटरनेट के जरिए उर्दू सीख रहे हैं। उर्दू के लिए यह एक स्वस्थ संकेत है।
उर्दू की प्रचलित विधाओं पर कुछ कहें?
उर्दू की प्रचलित विधाएं जैसे शायरी में ग़ज़ल, नज्म, नसरी नज्में, कसीदा, मसनवी, मर्सिया, किता, रुबाई, वासोख्त इसी प्रकार कथा साहित्य में उपन्यास, लघु उपन्यास, कहानी, रिर्पोताज, नाटक, लघुकथाए तथा आलोचना। ग़ज़ल और नज्म उर्दू को जिन्दा किए हैं। कसीदे की जगह अब सलाम ने ले ली, मर्सिये, किता, रुबाई आज भी लिखी जा रही है। कथा साहित्य में उपन्यास की जगह लघु उपन्यास एवं अफ़साने की जगह मिनी अफसाने ले रहे हैं।
गांधीजी ने भारत में सम्पर्क भाषा के तौर पर हिंदुस्तानी की वकालत की थी, क्या आज भी वह विचार उपयोगी है?
गांधीजी का नजरिया दुरुस्त था इसलिए कि हिंदुस्तान विविध आबादी वाल मुल्क है लिहाजा यहां की जनता का प्रतिनिधित्व यहां के सम्प्रदाय गंगा-जमुनी तहजीब से समझने और यहां के धार्मिक  और सम्प्रदाय व सभ्यता को समझने के लिए हिन्दुस्तान की जुबान को विश्व भाषा के प्रेषण का माध्यम बनाए जाने की वकालत मुनासिब और बेहतर थी। गांधीजी चाहते थे कि हिंदुस्तानी जुबान अर्थात हिंदी और उर्दू अपनी-अपनी लिपि में लिखी जाए।
इधर कुछ राज्य क्षेत्रीय बोलियों, भोजपुरी आदि को स्वतंत्र भाषा के तौर पर दर्ज करने की वकालत कर रहे हंै आप क्या कहेंगे?
हिंदुस्तान में हजारों बोलियां बोली जाती हैं। स्पष्ट है कि जब किसी बोली का व्याकरण बन जाता है तभी वो भाषा की श्रेणी में आ आती है। जुबान, समझने और समझाने का एक माध्यम होती है। अगर जिसकी अधिक क्षमता मौजूद होगी वो सम्प्रेषण के क्षेत्र में अपना अस्तित्व स्वयं बना लेगी। वर्ना किसी भाषा को केवल स्वतंत्र भाषा का दर्जा दिलाना या मिल जाने से कुछ नहीं होता।
हिंदी-उर्दू सहित भारतीय भाषाओं के भविष्य को आप किस नजर से देखते है?
हिंदी-उर्दू साहित्य का भविष्य बहुत ही रौशन है। इसलिए इन दोनों भाषाओं में गंभीरता से साहित्य सृजन करने वाली युवा पीढ़ी पूर्ण मनोदशा से अपना योगदान दे रही है। नौजवान नस्ल दिलचस्पी ले रही है। आखिर में मैं उर्दू सहाफत (पत्रकारिता) के बारे में कहना चाहूंगा कि मुल्क की जंगे आजादी में उर्दू पत्रकारिता ने जो भूमिका निभाई, उसे फरामोश नहीं किया जा सकता। आज भी उर्दू पत्रकारिता तमाम समस्याओं को उजागर करने में लगी रहती है। "इंकलाब और जिंदाबाद" का नारा उर्दू ने ही दिया।
उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं "दाग"
हिंदोस्तां में धूम हमारी जबां की है

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