ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंदी से चीनी संस्कृति की आत्मा छूना बी.आर. दीपक की चीनी कविता पर कुछ विचार
01-Aug-2017 11:47 PM 3068     

प्राचीन काल से ही चीन और भारत दोनों कविता के देश हैं। कविता मानवीय संस्कृति की आत्मा भी कही जा सकती है। कुछ लोग कहते हैं कि कविता का कभी भी अनुवाद नहीं किया जा सकता। यह बात असत्य तो नहीं है, बल्कि इसका मतलब यह नहीं है कि कविता के अनुवाद करने का काम मूल्यहीन होता है। कहा जाता है कि चीन और भारत के सांस्कृतिक आदान-प्रदान के इतिहास में ऐसी हालत हुई कि चीन में भारतीय शास्त्रों का अनुवाद पूरे कमरे भर है, जबकि भारत ने चीनी शास्त्र का अनुवाद एक संदूक भर भी नहीं किया। ऐसी हालत को बदलने के लिए नेहरू विश्वविद्यालय के चीनी प्रोफ़ेसर बी.आर. दीपक ने अत्यन्त उपयोगी कोशिश की है। उनकी "चीनी कविता" नामक किताब ही एक उचित उदाहरण है। इस किताब से बी.आर. दीपक को पांचवीं चीनी किताबों का विशेष योगदान का पुरस्कार मिला।
चीनी कविता का विषय-प्रवेश : चीनी कविता में दीपक जी ने 11वीं शताब्दी पूर्व से 14वीं शताब्दी तक की प्रसिद्ध चीनी कविताएं चुनकर चीनी से हिंदी में अनुवाद किया है। यह एक तारीफ़ करने की बात इसलिए है कि वर्तमान समय में जब अधिकतर भारतीय विश्वविद्यालय मुख्यतया अंग्रेज़ी के माध्यम से चीन का अनुसंधान करते हैं, दीपक जी ने सीधे चीनी से पुराने चीनी साहित्य का परिचय दिया है। अगर ध्यान से अनुक्रम देखा जाए तो मालूम होता है कि उन्होंने चीनी कविता में सभी कविताएं यों ही नहीं चुनी हैं, बल्कि विभिन्न वंश, शैली और कवि के अनुसार अनुवादक अपने मन में सबसे श्रेष्ठ चीनी कविताओं का चित्र खींचने की कोशिश करता है। इससे हम देख सकते हैं कि कौन-सी चीनी कविताएं एक भारतीय विद्वान पर प्रभाव डाल सकती हैं।
चीनी कविता की एक बड़ी विशेषता यह है कि उसमें अत्यन्त कम शब्दों से काफ़ी विस्तृत मतलब अभिव्यक्त करने का झुकाव है। इसी कारण से चीनी कविता का अनुवाद करना एक बहुत मुश्किल काम होता है। इसके बारे में निम्नलिखित कुछ उदाहरण के विश्लेषण के साथ व्यक्त किया जाएगा।
"मैं चांद और शराब" का विश्लेषण : "मैं चांद और शराब" चीन के थान वंश के सबसे प्रसिद्ध महाकवि ली पाए की प्रतिनिधि कविता है। लोग कहते हैं कि ली पाए की कविताएं इतना प्रभावित करती हैं कि उन्हें पढ़कर देवता और भूत दोनों रोने लगते हैं। "मैं चांद और शराब" नामक कविता का मुख्य मतलब यह है कि कवि ने फूलों के बीच एक शराब की सुराही रखी है, पर उनके साथ पीने के लिए कोई नहीं है। इसलिए उन्होंने चांद और अपनी छाया का निमंत्रण किया। इस कविता में कवि का अकेलापन, मासूमियत और अपने आप का दिल बहला देने की भावनाएं भरी हुई है।
अनुवाद की कला की दृष्टि से दीपक जी ने अच्छी तरह इस कविता की भावना को समझा और इसे कलात्मक रूप से हिंदी में व्यक्त किया। आमतौर से अनुवाद के दो तरीके हैं--- शाब्दिक अर्थ के अनुसार और भावना के अनुसार। दीपक जी के अनुवाद पढ़कर हमें लगता है कि उन्होंने इन दोनों तरीकों से संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है। जैसे अगर हम शाब्दिक अर्थ के अनुसार इस कविता के विषय का अनुवाद करें, तो यह अनुवाद मिल सकता है कि "चाँदनी के नीचे अकेला पीता हूं।" यह अनुवाद ठीक तो है, लेकिन संक्षिप्त नहीं है, जो विषय के रूप में होना चाहिये था। और तीसरे वाक्य में एक चीनी शब्द था   जिस का सीधा मतलब है कि थोड़े समय के लिए किसी आदमी के साथ। मगर दीपक जी ने उसे ठान लेता हूं का अनुवाद किया। देखने में उस भब्द का मतलब हिंदी में बदल गया, फिर भी पूरे वाक्य की भावना परिवर्तित नहीं हुई। क्योंकि अनुवाद करते समय अनुवादक को दो चीज़ों का ध्यान रखना है। पहली चीज़ तो पूरी कविता का मतलब और भावना सही होना चाहिये, दूसरी चीज़ यह है कि भाषा का सौंदर्य और रस नहीं खोना चाहिये। अगर   शब्द शाब्दिक अर्थ के अनुसार अनुवाद किया जाता, सही तो है, बल्कि पूरा वाक्य बहुत लम्बा हो जाएगा और पढ़ने में सुन्दर नहीं लगता है।
कविता का अनुवाद करना एक अत्यंत मुश्किल काम है, जो एक सौ प्रतिशत पूर्णता तक पहुंचना मुमकिन नहीं है। अनुवाद करते समय कोई न कोई चीज़ खो जाती है। जैसे नौवां वाक्य में एक चीनी शब्द   है, जिसका मतलब है कि हृदय में झिझक के कारण इधर-उधर घूमता-फिरता जाता है। दीपक जी ने उसे हिंदी में हिलता-डुलता का परिवर्तन किया। यह अनुवाद ग़लत तो नहीं है, बल्कि कवि की अकेलापन और व्याकुल होने की भावना कहीं न कहीं खो जाती है।
पर कभी ऐसा भी होता है कि चीनी कविता की तुलना में उसका हिंदी अनुवाद अधिक बेहतर और सजीव लगता है। जैसे अंतिम वाक्य में कवि ली पाए ने लिखा है कि वे चाँद के साथ मित्र बनाकर भविष्य में सितारों पर फिर एक बार मिलेंगे। यहाँ   का शाब्दिक अर्थ भावनाहीन है, कठोर है, पर यहाँ कवि चाँद के साथ क्यों ऐसा कठोर संबंध बनाना चाहते हैं? इस सवाल का जवाब बहुत सारे चीनी लोगों के पास भी नहीं है, बल्कि दीपक जी ने अपने अनुवाद में इस सवाल का सही उत्तर दिया। उन्हें लगता है कि   का मतलब भावनाहीन नही है, बल्कि दुनियादारी की प्यार से कहीं बढ़कर की भावनाएं है। चांद और छाया आदमी नहीं है, शायद वे दुनियावी प्यार नहीं समझ सकते। पर कवि के मन में उनकी दोस्ती इतनी शुद्ध होती है कि दुनियावी प्यार से भी बढ़ जाती है।
चाँद का चीनी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान होता है। चाँद का चीनी कविता में अनेक मतलब होता है, जैसे सौदर्य, स्वतंत्रता, शांति और चिरस्थायी का प्रतीक है। कवि ली पाय चाँद को विशेष तौर पर पसंद करते थे। उन्होंने दूसरी कविताओं में भी बार-बार चाँद का नाम लिया। जैसे उनकी चाँदनी रात नामक कविता में उन्होंने लिखा है कि चाँद देखते ही अपने घर की याद आयी। और शराब की ख़ातिर में उन्होंने लिखा है कि न हो ख़ाली पैमाना चाँदनी में पी लो जी भर।
दीपक जी ने चीनी कविता किताब में कुल मिलाकर ली पाए की सात कविताओं का अनुवाद किया, जिनमें तीन कविताओं में चाँद का नाम लिया जाता है। इसका कारण शायद यह है कि चाँद को केवल चीनी लोगों में प्रियता मिलती है, बल्कि भारतीय संस्कृति में भी उसका महत्वपूर्ण स्थान है।
"आत्म-गीत - एक" का विश्लेषण : चीनी कविता में अधिकतर चीन के प्रसिद्ध कवियों की प्रतिनिधित्व कविताओं का अनुवाद किया जाता है। पर ऐसी कविताएं भी होती है जो चीन में इतना प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति में मिलती-जुलती है। जैसे चिन वंश के महाकवि थाव य्वान मिङ की "आत्म-गीत - एक" नामक कविता। इस कविता के चीनी विषय का सीधा मतलब मरा हुआ आदमी के लिए गीत है। कवि थाव य्वान मिङ इस कविता को स्वयं अपने लिए लिखा है और लिखने के दो महीने के बाद वे सचमुच मर गए। इस कविता में कवि ने अपने मृत्यु से संबंधित विचार साफ़ व्यक्त किया है।  
चीनी कविता में कुल-मिलाकर थाव य्वान मिङ की चार कविताएं चुनी हैं, जिनमें "आत्म-गीत - एक" के अलावा सब अत्यंत मशहूर है। थाव य्वान मिङ की और बहुत सारी मशहूर कविताएं हैं, पर दीपक जी ने ख़ास तौर पर यही कविता चुनी, जो चीनी लोगों में इतनी लोकप्रिय नहीं है, क्यों मेरे विचार से इसका मुख्य कारण यह है कि इस कविता की भावना भारतीय संस्कृति से सबसे नज़दीक है, जिसे पढ़कर भारतीयों में सहानुभूति उत्पन्न हो सकती है।
"आत्म-गीत - एक" में कवि ने अपने मृत्यु के प्रति अपना अनुभव व्यक्त किया। प्राचीनकाल से आज तक चीनी संस्कृति में मृत्यु का नाम अत्यंत कम लिया जाता है। मृत्यु हमेशा के लिए अशुभ माना जाता है। चीनी प्राचीन महान विचारक कंफ्यूशस ने कहा था कि अच्छी तरह जीवन का मतलब समझने के पहले मृत्यु के बारे में सवाल मत पूछो।   इसलिए चीनी कविता के इतिहास में मृत्यु से संबंधित कविताएं काफ़ी कम हैं। बल्कि भारतीय संस्कृति में मृत्यु का विचार करने में कोई डर नहीं है। उन्हें पुनर्जन्म का विश्वास होता है। इसलिए दीपक जी ने चीनी कविता चुनते समय भारतीय पाठकों के स्वीकार करने के झुकाव पर भी विचार किया होगा।
चीनी प्रसिद्ध साहित्य शास्त्र विद्वान जू गुअनछयेन ने लिखा था कि थाव य्वान मिङ सामान्य शहरवासी की तरह रहता था, बल्कि आधा-देवता की तरह विचार करता था। लोग कहते हैं कि थाव य्वान मिङ की कविता की यही विशेषता है कि वे मन में जिस तरह कहना चाहते हैं, प्राकृतिक रूप से उसी तरह सीधा कहते हैं, अलंकार का प्रयोग अत्यंत कम है। इसी विशेषता "आत्म-गीत - एक" में भी मिल सकती है, जो दीपक जी ने उसे अनुवाद करते समय यथाशक्ति उसे बनाए रखने की कोशिश की है। उनकी हिंदी भाषा थाव य्वान मिङ की अपनी भाषा की तरह सरल और संक्षिप्त है, पर जिसमें गहरा अनुभव और भावना निहित हैं।
उदाहरण के लिए पहला वाक्य इस तरह अनुवाद किया जाता है--- अगर जीवन है तो मृत्यु भी अवश्य है, देर-सबेरे छूट ही जाएगी यह देह। इस वाक्य से पूरी कविता और "आत्म-गीत - दो" एवं "आत्म-गीत - तीन" का मुख्य विचार व्यक्त किया जाता है। दूसरा वाक्य यह है कि कल रात तक रहा मैं मनुष्यों के बीच, आज सुबह हो गया हूं शामिल भूतों के बीच। चीन में भौतिकवाद का विश्वास होता है, मृत्यु के बाद कुछ नहीं शेष है। कवि को लगता है कि हालांकि जीवन और मृत्यु के बीच इतना बड़ा अंतर है, फिर भी मनुष्य क्षण तक जीवन से मृत्यु की ओर मोड़ने लगता है। तीसरे वाक्य में आत्मा का नाम लिया, वास्तव में चीन में आम तौर पर आत्मा का विश्वास नहीं करते। पर अधिकतर भारतीय लोगों को आत्मा का गहरा विश्वास होता है। भगवद्गीता में लिखा है कि पुराने कपड़े को त्यागकर ऩये कपड़े पहने की तरह, आत्मा मरा हुआ देह को छोड़कर दूसरे नये शरीर का प्रवेश करती है। थाव य्वान मिङ को भी लगता है जब आत्मा शरीर को छोड़ती है, तब शरीर मुरझाता है। क्या उनकी आत्मा और शरीर के प्रति यही विचार भारतीय संस्कृति से प्रभावित हुआ है या नहीं, हमें मालूम नहीं है। पर देखने में शायद वे भौतिकवाद का पूरा विश्वास नहीं करते। इसलिए चाहे दीपक जी ने संयोग से इस कविता को चुना या जानबूझकर इसका अनुवाद किया, वे हमें इस कविता से चीन और भारतीय संस्कृति को एक साथ विचार करने और तुलना करने का मौका दिया। मेरी दृष्टि से यही चीनी कविता प्रकाशित होने का एक महत्वपूर्ण मतलब होता है।
अमेरीकी विद्वान पेलित (एड्ढद एड्ढथ्त्द्यद्य) ने कहा था कि मूल पुस्तक और अनुवाद की पुस्तक के बीच एक गहरी खाई होती है, जिसे केवल अनुवादक ही अकेला पार कर सकता है। और सभी प्रकार के अनुवाद में कविता का अनुवाद करना सब से कठिन है। क्योंकि कविता संस्कृति की आत्मा है। दीपक जी ने चीनी कविता का अनुवाद करने का पहला कदम उठाया, आशा है कि उनके पीछे-पीछे अधिक और अधिक अनुवादक इस तरह का काम शुरू करेंगे, तब चीन और भारत दोनों एक दूसरे की संस्कृति की आत्मा छू सकेंगे। 

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