ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भाषा की कशमकश
CATEGORY : न्यूयॉर्क की डायरी 01-Dec-2016 12:00 AM 1250
भाषा की कशमकश

न्यूयॉर्क में प्रवासी भारतीयों द्वारा विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं। इसके लिये अलग-अलग नामों के तमाम संगठन काम कर रहे हैं, लेकिन इनके नामों की विविधता को छोड़ दिया जाये तो उनके उद्देश्य कमोबेश लगभग एक जैसे होते हैं।
विगत दिनों मुझे मेरे एक मित्र ने "अमेरिका तमिल संगम" संस्था के कार्यक्रम में शामिल होने के लिये आमंत्रित किया। इस आयोजन में प्रख्यात फिल्म पाश्र्व गायिका कविता कृष्णमूर्ति एवं डॉक्टर सुब्रमण्यम अपनी कला का प्रदर्शन करने वाले थे। मेरे मन में सवाल उठा कि उनके इस कार्यक्रम जाकर मैं क्या करूंगा। तमिल गाने क्या मेरी समझ में आएंगे? मुझे बताया गया कि मेरी ही तरह अन्य बहुतेरे हिंदीभाषी मित्र अपने परिवारों के साथ इस समारोह में शामिल हो रहे हैं। इस उत्सुकता पैदा करने वाली सूचना के बाद मैंने भी इस समारोह में शामिल होने का मन बना लिया। लगा कि कुछ नहीं तो परिवार सहित घूमना-फिरना तो हो ही जायेगा।
उम्मीद के अनुसार कार्यक्रम का प्रारंभ गणेश वंदना से हुआ। उसके बाद कविता कृष्णमूर्ति आईं और उन्होंने अपनी पहली प्रस्तुति "श्रीरामचंद्र कृपाल भज मन" एक अलग एवं निराले अंदाज में गाया। उसके बाद उन्होंने एक मीरा का भजन सुनाया। फिर "1942 एक लव स्टोरी" का बहुत ही कर्णप्रिय गाना "प्यार हुआ चुपके सेे" सुनाया और आखिर में "नींबूडा नींबूडा..." मेलोडियस गाया। यहां उल्लेखनीय यह बात है कि कैसे एक घंटा गुजर गया श्रोताओं को पता ही नहीं चला। चूंकि मुझे तमिल भाषा नहीं आती, लिहाजा तमिल संगठन द्वारा आयोजित प्रोग्राम में मैं क्या करूंगा? इस सवाल का उत्तर मुझे मिल गया था। यह पूरा कार्यक्रम हिंदी में हुआ। निष्कर्ष में कह सकते हैं कि बहुतेरी समस्याएँ हमारे पूर्वाग्रह पैदा करते हैं। इसी संदर्भ में मुझे कुछ दिनों पूर्व वाट्सएप पर चल रही एक बहस याद आ गई जिसमें तमिल एवं हिंदी के ऊपर चर्चा हो रही थी। जिसमें अनेक लोगों ने प्रश्न उठाया था कि क्या हमें तमिल प्रोग्राम में उतने ही जोश से शामिल नहीं होना चाहिए, जितने कि किसी हिंदी के प्रोग्राम में?
अब प्रश्न है कि क्या हमें अन्य भारतीय भाषाओं को समझने का प्रयास नहीं करना चाहिए? आज एक दक्षिण भारतीय चाहे वह तमिलनाडु, कर्नाटक, हैदराबाद या केरल से हो, वह चारों भाषाओं को कम से कम समझता तो है जबकि यहां पर उत्तर भारतीय हिंदी जानने वाला ना तो मराठी समझता है ना गुजराती। वह केवल संख्या बल के भ्रम में रहता है कि हम श्रेष्ठ हैं क्योंकि इस देश में हिंदी बोलने, पढ़ने, लिखने वाले ज्यादा हैं। परंतु यदि हम हिंदी के अलावा भाषाएं उपयोग करने वालों की बात करें तो संख्या हिंदी के मुकाबले कहीं ज्यादा है।
शायद जरूरत इस बात की है कि हम अपनी मूल भाषा के अलावा अन्य भाषाओं को कितना जानने का प्रयास करते हैं। अक्सर ही जब कोई विदेशी हिंदी में कुछ वाक्य बोलता है तो हमें अच्छा लगता है। इसी तर्क पर क्या हमें दस-बीस वाक्य अपने देश की हर एक भाषा के नहीं आने चाहिए? जिन्हें हम उन लोगों के बीच जाने पर उपयोग कर सकें। इस तरह से एक जुड़ाव निश्चित रूप से पैदा हो सकता है। यह क्रम हम आगे बढ़ा सकते हैं और विभिन्न भारतीय भाषाएं बोलने वालों के बीच सामंजस्य स्थापित हो सकता है। जरूरत केवल एक कदम उठाने की है।
सेंट जोंस यूनिवर्सिटी क़ुवीनस न्यूयॉर्क में नवम्बर के पहले सप्ताह में सम्पन्न हुए संगीत के इस कार्यक्रम का आयोजन - पैसज तू इंडिया - इ ग्रैंड म्यूजिकल इवनिंग के नाम से श्री वारी फाउंडेशन इंक तथा अमेरिका तमिल संगम द्वारा किया गया था। पद्मभूषण संगीतज्ञ डॉ. एल. सुब्रमण्यम तथा पद्मश्री कविता कृष्णमूर्ति ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। सभागार श्रोताओं से पूरी तरह भरा हुआ था और लगभग पांच हजार संगीत प्रेमी श्रोता यहां उपस्थित थे, जो यहाँ के बहुत बड़ी संख्या मानी जायेगी। कार्यक्रम में भारत के प्रधान कौंसिल, न्यूयॉर्क रीवा गांगुली दास तथा सीनेट मेंबर मिस मेलोनी भी उपस्थित थे। कार्यक्रम के बीच में अतिथियों का सम्मान किया गया। विशेष रूप से मिस मेलोनी का जिनके अथक प्रयासों से अमेरिका में दीवाली के ऊपर डाक टिकट जारी हो सका।

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