ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
प्रवासी का दुःख गृहिणी की शिकायत
01-Apr-2017 12:47 AM 1778     

प्रवासी का दुःख

बहुत दिनों तक मौन रही
अब देती हूँ आवाज़
क्या है एक प्रवासी का दुःख
बतलाती हूँ आज

जब से जन्मी, घर में आई
चौक बुहारा, मेज़ सजाई
भाई  से  जब हुई लड़ाई
माँ बोली-
"अपने घर जाकर फैलाना यह साज"

ब्याह हुआ, अपना घर पाया
चक्की पीस, फर्श चमकाया
लेकिन जब गुलदान लगाया
त्यौरी चढ़ी सास की बोली-
"रहने दो यह काज"

यह तो बीती बात पुरानी  
चलो सुनाएँ नई कहानी
मुँह बिदका बोली बहुरानी
"बहुत हुआ अब,
और चलेगा नहीं तुम्हारा राज"

मुझे बताओ,
कहाँ, कौन-सा घर मेरा है आज?


गृहिणी की शिकायत

क्या बतलाएँ! हम पछताये देकर तुमको वोट
हमने अपना समझा
तुमने हम पर ही की चोट!

साजन जब-जब तनख्वाह लाये
मैंने थे कुछ नोट उड़ाए
बतलाओ कैसे भुनवायें?
यों जो जोड़-तोड़ कर पाये, कुछ हज़ार के नोट!

अब साजन को बिना बताये
अगर बैंक में अपने जाएँ
पूछे कोई, क्या बतलाएँ
मेरे पास कहाँ से आये, इतने सारे नोट!

माना, इसी बात की खातिर  
सीमा ढाई लाख बना कर
तुमने बात बनाई भी, पर
सब के सम्मुख हुई उजागर, मेरे दिल की खोट।

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