ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मॉरीशस के देहात
02-Jun-2017 02:50 AM 3924     

मॉरीशस हिन्द महासागर के दक्षिण में स्थित एक छोटा-सा टापू है। वर्षों ज्वालामुखी के सक्रिय रहने तथा ठंडा होने पर यह टापू अस्तित्व में आया। प्रारम्भ में यह टापू समुद्री जहाजों का विश्राम स्थल था (पन्द्रहवीं सदी)। बाद में डच इस टापू पर काफ़ी समय तक रहे (सोलहवीं सदी)। डचों ने इस टापू पर गुलामों द्वारा खेती कराने का भी प्रयास किया पर उन्हें अधिक सफलता नहीं मिली। डचों ने यहाँ पाई जाने वाली एक बड़ी मुर्गी डोडो को, अपना आहार बना कर उसे पूरी तरह समाप्त कर डाला। स्वतंत्र (1968) मॉरीशस का राष्ट्रीय पक्षी यही डोडो है। आज यह केवल इतिहास या संग्रहालय में ही जीवित है। यहाँ हरियाली बहुत थी और आबनूस के पेड़ों की अधिकता थी, डचों ने इन पेड़ों को भी काट कर लगभग समाप्त कर डाला। यह लकड़ी जहाजों तथा अच्छे फर्नीचर बनाने के काम आती थी। तूफानों तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं के कारण डच भी इस टापू को छोड़ कर चले गए। जहाजों के साथ आए चूहों की संख्या इस टापू पर बहुत अधिक हो गई थी। कुछ समय बाद इस टापू पर फ़ेंच (सत्रहवीं सदी) आकर रहने लगे। इन्होंने भी गुलामों से खेती करवाने का प्रयास किया। ये गुलाम माडागास्कर से खरीदे जाते थे। उस समय भारत में पांडिचेरी में फ्रेंच शासन था। अत: यह टापू इनके लिए सामरिक दृष्टि से भी उपयोगी सिध्द हुआ। सन् 1810 में फ्रेंच तथा अंग्रेजों में एक भारी युद्ध हुआ और इसमें अंग्रेजों की जीत हुई। अब मॉरीशस अंग्रेजों के अधीन हो गया।
टापू पर खेती की योजना को सफल बनाने हेतु अंग्रेजों का ध्यान भारत पर गया। उस समय भारत पर अंग्रेजों का ही शासन था। सन् 1834 में गुलामी की प्रथा समाप्त हो गई थी। टापू के गुलामों ने काम करने से इंकार कर दिया। वे समुद्र तटों की ओर जाकर मछली मारने के कार्य को अधिक पसंद करते थे। आज भी मछुआरे अधिकतर उनके ही वंशज हैं। सन 1834 में भारत से पहला जहाज़ शर्तबंद मजदूरों का मॉरीशस पहुंचा। अंग्रेजों के दलाल भारत से जिन लोगों को धोखे से बहला-फुसला कर, यहाँ लाए थे वे अपनी परिस्थितियों के कारण वहां गरीबी का जीवन जी रहे थे। उनसे कहा गया था कि मॉरीशस एक ऐसा टापू है जहां पत्थर पलटोगे तो सोना मिलेगा। यहाँ पहुंचने पर गुलामों से भी बदतर व्यवहार तथा स्थितियां इन गिरमिटिया मजदूरों को मिलीं। अधिकतर इनमें अनपढ़ थे पर वे अपने साथ अपनी संस्कृति की अमूल्य धरोहर लाए थे। उनके पास उनकी बोली, धार्मिक आस्थाएं, संस्कृति थी और अपने गाँव की स्मृतियाँ थीं। इसी धरोहर के सहारे इन गिरमिटिया मजदूरों ने अपने दुखों के दिनों को काटा। इतिहास के पन्नों में यह काला इतिहास लिखा है। जागरूकता की इस लड़ाई में अनेक भारतीयों ने भी अप्रतिम योगदान दिया था।
सन् 1897 में मार्क ट्वेन (यात्रा-वृत्तांत, क़दृथ्थ्दृध्र्त्दढ़ द्यण्ड्ढ कद्दद्वठ्ठद्यदृद्ध) ने लिखा था "ईश्वर ने पहले मॉरीशस की सृष्टि की, तत्पश्चात उसकी नकल करके स्वर्ग की रचना की।" भारतीय संस्कृति के गहरे प्रभाव के कारण मॉरीशस को लघु भारत भी कहा जाता है। स्वतंत्र मॉरीशस पर भारत का प्रभाव अनेक रंग-रूपों में दिखाई पड़ता है। यहाँ के त्योहार, रीति-रिवाज़, पहनावा, खान-पान, पूजा-पाठ, आपसी सम्बोधन, गाँवों के नाम आदि। आज मॉरीशस नौ जिलों में बंटा हुआ है। पोर्ट-लुई, पांप्लेमूस, रिवियर जु राँपार, फ्लाक, ग्रां-पोर्ट, सावान, ब्लाक-रिवर, प्लेन-विलियम्स, तथा मोका।
मॉरीशस का क्षेत्रफल 720 वर्गमील है। यहां की मुख्य सड़क पर आप गाड़ी से एक ही दिन में पूरा चक्कर लगा सकते हैं। अत: मॉरीशस में गाँव तो हैं पर वे शहरों से कमतर नहीं हैं। मीडिया के सभी कार्यक्रम बराबर पूरे देश में प्रसारित होते हैं। समाचार एक से, एक ही समय पर प्रत्येक नागरिक को प्राप्त होते हैं। सभी गाँव मुख्य सड़कों से जुड़े हुए हैं। राजधानी पोर्ट लुईस में या किसी अन्य स्थान पर कार्य करने की सुविधा तथा वाहन सुविधा सभी स्थानों पर है। बाजार में सब्जियां सबको बराबर मिल जाती हैं, खान-पान, शादी विवाह के कार्यक्रमों में भी समानता है। हाँ! यदि कोई पैसा अधिक खर्च करके होटल वगैरह में मेहमानों को बुलाना चाहे तो कारण गाँव या शहर नहीं वरन धन होगा। सभी के बच्चे बराबर शिक्षा पाते हैं। सरकार की नीतियाँ सबके ऊपर बराबर लागू होती हैं। देश छोटा है इस कारण सरकार को नियन्त्रण में भी अधिक परेशानी नहीं होती।
सभी वृद्धों (60 वर्ष से) को सरकारी पेंशन (5000 रुपए) प्रति माह मिलती है। यदि कोई सौ वर्ष का हो जाता है तो उसके जन्मदिन पर उसके घर पर मंत्री भी आते हैं और इसका एक छोटा सा अंश टेलिविज़न पर समाचारों में भी आता है।
मॉरीशस के गाँवों के नामों का आधार इतिहास, परिस्थितियां, व्यक्तियों के नाम, युगीन स्थितियां, नदियाँ, बाग़, जंगल, फल, भारतीय गाँव आदि हैं। आज भोजपुरी चैनल पर गाँवों या शहरों से सम्बन्धित कार्यक्रम भी आते हैं। कुछ के नाम इस प्रकार है : गुलमोहर की छाँव में, आव चले गाँव घूमें, हमारे गाँव आदि। फलों के आधार पर कुछ गाँवों के नाम हैंं- बानान (केला), प्लेन दे पापाय (पपीता), पांप्लेमूस (चकोतरा), तामारें (इमली)। इन क्षेत्रों में इन पेड़ों की बहुलता थी। कुछ नाम पहाड़ों के आधार पर भी हैंंमोंताई लोंग (बड़ा पहाड़), मोंताई ब्लांश (सफेद पहाड़)। कुछ नाम नदियों के आधार पर भी हैंं। पेचित रिवीयर (छोटी नदी), ग्रां रिवीयर नोआ (बड़ी काली नदी), रिवीयर दे गाले (नदी के किनारे छोटे-छोटे पत्थर), रिवीयर दे क्रियोल (नदी के किनारे क्रियोल)। आज भी यहाँ क्रियोल जाति के लोग ही अधिक रहते हैं। फलों के आधार पर जैसे ब्वा मांग (आम का जंगल), ग्रां ब्वा (बड़ा वन) आदि। व्यक्तियों के नाम के आधार पर रबे जू कॉप (जू कॉप नामक फ्रांसीसी अधिकारी था)। मिट्टी के आधार पर रगुद्लैंड्स, बोन्तेआ (उपजाऊ भूमि), मिडलैंड्स, हाईलैंड्स आदि। कुछ गाँवों के नाम भारतीय स्मृतियों के आधार पर हैं- बनारस, ब्रह्मस्थान, गोकुल।
क्रिश्चियन संतों के नाम पर- रसें पियर, सें जुलिए, सें(सेंट) फेलिक्स आदि। कुछ गाँवों के नामों का आज हिन्दीकरण भी हो गया है- ह्र्मिताज़ का पंचवटी, वाले दे प्रत का चित्रकूट, बेल्रीव का केवल नगर आदि। इन क्षेत्रों में हिन्दू बहुसंख्या में रहते हैं। ग्रां-बासें का नाम आज परी-तालाब हो गया है, महाशिवरात्रि पर लाखों हिन्दू इस परी-तालाब या गंगा-सरोवर से पवित्र जल लाते हैं तथा अपने गाँव के मन्दिरों के शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। दूर के गाँवों से कांवड़ उठाने वाले पदयात्री चार या पांच दिनों की पदयात्रा कर, पवित्र-जल लेकर अपने गाँव लौटते हैं। मार्ग में शिवभजन गाते हैं। जगह-जगह पर लोग उनके स्वागत हेतु जल-पान का प्रबंध करते हैं। मन्दिरों में इन शिवभक्तों के रात्रि विश्राम की भी व्यवस्था करते हैं। आप यू ट्यूब जाकर ये सुंदर कांवड़ देख सकते हैं।
कुछ गाँवों के नामों का आधार ऐतिहासिक भी है। बेल्रीव गाँव का नाम आज केवलनगर है, देश के पहले प्रधानमंत्री चाचा सर शिवसागर रामगुलाम का बचपन का नाम केवल था। आँत्वानेत नगर का नाम फूलियार हो गया है। तमिल समुदाय के लोग गणेश को पीलियार कहते थे और भोजपुरी मजदूरों नए इसे फूलियार कहा।
इस गाँव में आज भी वह बरगद का बड़ा वृक्ष विद्यमान है, जहां भारतीय गणेशजी पूजा किया करते थे।
बों सेज़ू गाँव आज गोकूला नाम से जाना जाता है। गोकूला नाम के हिन्दू ने यहाँ जमीन खरीदी थी उन्हीं के नाम से इस गाँव का नाम गोकूला पड़ा। आपने गाँव में मन्दिर बनाने हेतु जमीन भी दी थी। मायबू गाँव का नाम एक फ्रांसीसी अधिकारी के नाम से पड़ा। वह एक अच्छा शासक था। "माहे द लाबूरदो" नेे ने मॉरीशस के विकास में विशेष योगदान दिया था।
मॉरीशस में जैसे-जैसे गिरमिटियों के एग्रीमेंट पूरे होते गए, उन्होंने धीरे-धीरे अपने लिए जमीन के टुकड़े खरीदने शुरू किए। इसके लिए उन्होंने कठोर परिश्रम किया। जो अमीर हुए उन्होंने मन्दिर या फिर अपनी आस्था के अनुसार आर्य-समाज को मन्दिर हेतु जमीने दीं। ये मन्दिर भाषा तथा संस्कृति के मर्मस्थल बने। प्रत्येक गाँव तथा शहर में मन्दिर, आर्य सभा का मन्दिर, गिरजाघर, मस्जिद हैं। कहीं कहीं चीनी समुदाय का पागोदा भी है। पौराणिक परिवारों के आंगन में महावीर ध्वजा होगी तथा आर्य समाजी परिवार के यहाँ ॐ देखने को मिलेगा।
देश की अर्थव्यवस्था का आधार पर्यटन उद्योग है। इस देश की सफेद रेत, चमकीली धूप, नीला तथा स्वच्छ समुद्र विदेशियों के लिए आकर्षण का केंद्र है। पर्यटकों की अधिकता के कारण विसंस्कृतिकरण की स्थिति बढ़ रही है। यूरोपीय सभ्यता का आकर्षण यहाँ भी नई पीढ़ी को भटका रहा है। देश की बड़ी-बड़ी योजनाओं के अतिरिक्त देश की युवा पीढ़ी विदेश जाकर बसने में अधिक प्रसन्न है।
शिक्षा के क्षेत्र में गाँव हों या शहर, छात्रों का परीक्षा परिणाम बराबर ही है क्योंकि पढ़ाई तथा ट्यूशन आदि की सुविधाओं में कोई अंतर नहीं है।
मॉरीशस के गाँवों का सौन्दर्य देखते ही बनता है। हरियाली से भरपूर वातावरण, अतिथि देवोभव की भावना, गाँवों में अभी भी चोरी आदि का भय कम ही है, आपस का विश्वास रहने वाले को प्रभावित किए बिना नहीं रहता। हाँ एक बात और जरूर जोड़ देना चाहती हूँ कि मॉरीशस में आज भी अपनी जमीन पर हर व्यक्ति खेती का काम करना पसंद करता है, वह फिर निदेशक के पद पर भी क्यों न काम करता हो?
आज भी इस देश की पुरानी पीढ़ी अपने जीवन के अस्सी बसंत काम करते हुए स्वस्थ रूप में व्यतीत कर रही है। चिंता तो अब नई पीढ़ी के स्वास्थ्य तथा संस्कारों की है! अपनी भाषा को बचाने की है। मॉरीशस के गाँवों ने ही मॉरीशस में भारतीयता को बचा कर रखा है, लेकिन मीडिया, शिक्षा तथा विकास ने अब गाँव तथा शहर दोनों को नई पीढ़ी की जिम्मेवारी सौंप दी है।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 15.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^