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विश्वविद्यालयों के हिंदी विभाग वह सुबह कभी तो आएगी
01-Sep-2017 03:15 PM 1771     

महाविद्यालय की चौहद्दी से निकलकर जब विद्यार्थी विश्वविद्यालय रूपी ज्ञानसागर में प्रवेश करते हैं तो वे उसमें डुबकियां लगाकर लाभान्वित होने की चाहत मन में छिपाए होते हैं जो बिल्कुल स्वाभाविक भी है लेकिन इसके साथ ही एक स्वाभाविक प्रश्न यह भी उठता है कि क्या ऐसे विद्यार्थियों की मनोकांक्षा पूर्ण होती है?
अब यह सवाल यदि एक विद्यार्थी से पूछा जाएगा तो वह बेचारा भय और भविष्यचिंता के सागर में डूबते-उतराते हुए उत्तर न केवल हाँ में देगा बल्कि विश्वविद्यालय और आचार्यों की प्रशंसा में एकाधिक ग्रंथों की रचना करने को भी तैयार हो जाएगा, क्योंकि उसे न केवल स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण करनी है बल्कि शोधकार्य पूरा करके नौकरी भी पानी है, वह भी विश्वविद्यालय में नहीं तो किसी महाविद्यालय अथवा विद्यालय में ही सही। तो जिस कठिन प्रश्न का उत्तर भय से भीत और आशंका से चित्त होकर दिया जाए उसकी सत्यता पर निसंदेह संदेह किया जा सकता है। यानी तारीफ के एलईडी बल्ब कितने भी क्यों न जला लिए जाएँ, अँधेरा दूर होता नजर ही नहीं आता। और यही स्थिति विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों की भी है जिनकी तारीफ के लिए तो सैकड़ों पन्ने भी कम ही पड़ेंगे। महाविद्यालयों के शिक्षकों में कम से कम इतनी प्रतिबद्धता तो होती है कि पाठ्यक्रम पूरा करवा दें पर विश्वविद्यालय में तो गिने-चुने शिक्षक ही अपने प्राथमिक कार्य अर्थात् पठन-पाठन के प्रति प्रतिबद्धता दिखाते हैं। अन्यथा अधिकांश तो विश्वविद्यालयीन राजनीति की उठापटक में ही लगे रहते हैं, ताकि उनके चहुँमुखी विकास का मार्ग निरंतर प्रशस्त होता रहे, विद्यार्थियों का विकास हो न हो, उनकी बला से।
वैसे भी वहां के अद्भुत वातावरण में कुछ समय व्यतीत करने के बाद विद्यार्थियों की समझ में यह बात तो आसानी से आ जाती है कि विकास और भविष्य सँवारने के लिए अध्ययन- मनन के श्रमसाध्य कार्य के अतिरिक्त दूसरे सरल उपाय भी हैं। कम से कम अगर जिनकी इच्छा स्नातकोत्तर के पश्चात् शोधकार्य करने की है तो उसमें वे दूसरे तरीके अधिक कारगर सिद्ध होते हैं। अपने विद्यार्थी जीवन की एक घटना बरबस याद आती है। जब एमए में दाखिला लिया तो सुनने में आया कि विद्यार्थी को अपने नौवें पर्चे पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए तभी उसका भविष्य सुरक्षित हो सकता है। बात कुछ समझ नहीं आई कि यह नौवाँ पर्चा भला कौन-सा है? क्योंकि पर्चे तो कुल आठ ही हैं। लेकिन वरिष्ठ एवं सुयोग्य विद्यार्थियों की संगति में यह तत्वज्ञान मिला कि, विद्यार्थी के भविष्य का सारा दारोमदार तो इसी नवें पर्चे पर है और वह पर्चा बहुत महत्वपूर्ण तो है पर मुश्किल नहीं। उसमें सफल होने का एकमात्र उपाय है येन-केन- प्रकारेण प्राध्यापकों को प्रसन्न करना और इस प्रसन्नता का विद्यार्थी की प्रतिभा से कोई खास संबंध भी नहीं है। इसके कई तरीके हैं जैसे प्राध्यापकों और उनके परिवार के सदस्यों की सेवा करना, गैस बुक कराने से लेकर बिजली और फोन के बिल तक जमा करा देना, उत्तर पुस्तिकाओं के परीक्षण में सहायता करना और बात-बेबात उनकी तारीफों के पुल बाँधना। छोटे-मोटे उपहार वगैरह की बात तो जाने ही दें, शोधकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ तो और भी भारी-भरकम होती हैं। जो विद्यार्थी इस नवें परचे की तैयारी जी-जान से करते हैं वही अपनी तमाम अयोग्यता के बावजूद बहुधा सर्वोत्तम स्थान प्राप्त करते हैं और जी-तोड़ मेहनत करने, पुस्तक कीट की संज्ञा पाने वाले प्रतिभावान विद्यार्थी योग्यता सूची में ही पीछे नहीं ढकेल दिये जाते हैं, बल्कि उसके लिए नौकरी आदि के रास्ते प्रायः अकादमिक क्षेत्र में बंद ही हो जाते हैं। सुयोग्य प्राध्यापक तेजतर्रार और प्रतिभाशाली छात्रों पर व्यंग्यबाण छोड़ते हुए गाहे-बगाहे उन्हें धमकाते भी रहते हैं कि हमारी शरण में आए बिना तुम्हारा उद्धार संभव नहीं है। और जैसे ही विद्यार्थी "जाऊँ कहाँ तजि चरण तिहारे" की तर्ज पर प्राध्यापक के समक्ष आत्मसमर्पण करता है, न केवल उसकी तरक्की का रास्ता खुल जाता है बल्कि उसकी प्रतिभा प्राध्यापकों की तरक्की और प्रशस्ति का सबब भी बन जाती है।
मुझे यह कहते हुए जरा भी हिचक नहीं कि दिनोंदिन यह स्थिति बद से बदतर होती जा रही है और इसे कुछ यूं बयाँ किया जा सकता है :
सुना था हर रात की सुबह होती है/ जिंदगी की शाम ढली/ ढलती गयीं आँखें मेरी अब भी रोती हैं।
एक जमाना था जब विश्वविद्यालय में योग्य शिक्षकों की ही नियुक्ति होती थी। कसौटी अब भी वही है लेकिन योग्यता का पैमाना कब और कैसे इतनी जल्दी बदल गया पता ही न चला। अब नियुक्ति उसी की होती है जो या तो सत्तासीन राजनैतिक दल का पूर्णकालिक कार्यकर्ता हो या फिर उसकी पहुँच ऊपर तक हो। भले ही उसे अपने विषय का जरा भी ज्ञान न हो। अर्थात् जुगाड़ और रसूख के बिना वहां नौकरी पाना मुश्किल ही नहीं लगभग असंभव है। और नियुक्ति के बाद ये अध्यापकगण बहुधा पार्टी के झंडाबरदार बनकर पदोन्नति पाते हुए प्रशासनिक पदों पर काबिज होने की दौड़ में शामिल हो जाते हैं। प्रायः देखा जाता है कि विद्यार्थी कक्षा में अध्यापकों की प्रतीक्षा करते रहते हैं पर अध्यापक अतिथि प्रवक्ताओं के भरोसे विद्यार्थियों को छोड़कर राजनीतिक या शैक्षणिक यात्रा करते हुए नाम और दाम बटोरने में लगे होते हैं। आखिर जिस नियुक्ति के लिए उन्होंने चयन समिति के सदस्यों की फ्लाइट की टिकटों के साथ-साथ उन्हें सुविधाजनक स्थान पर ठहराने और खाने-पीने का शानदार बंदोबस्त किया, उसका कुछ लाभ तो उन्हें मिलना ही चाहिए।
बहुधा विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों के शोध-पत्र देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, प्रशंसित और पुरस्कृत होते रहते हैं। आश्चर्य होता है कि जुगाड़ से नौकरी पाने वाले आचार्य अपनी चरम व्यस्त दिनचर्या के बावजूद शोध-पत्र भला कैसे लिख लेते हैं। यहीं उन योग्य विद्यार्थियों की खपत होती है जिनका भरपूर लाभ प्राध्यापक उठाते हैं और विद्यार्थी इस भरोसे यह सब करने को विवश होता रहता है कि चलो कभी तो पीएचडी की डिग्री मिलेगी और नौकरी के साथ ही इस शोषण से मुक्ति भी। इसके अलावा आज के कंप्यूटर युग में कापी और पेस्ट की सुविधा के साथ पैसे लेकर लिखनेवालों की भी कमी नहीं। इसी पद्धति से जाने कितनी संपादित, अनूदित पुस्तकें तैयार हो जाती हैं और प्रकाशक भी पैसे लेकर या इस भरोसे छापने को तैयार हो जाता है कि पुस्तकालयों के लिए किताबों का आर्डर तो विभाग से ही आयेगा और अधिकांश किताबें तो विभिन्न महाविद्यालयों आदि में ही खप जाएँगी। और कुछ प्रतियाँ तो शोध-छात्र भी खपा देंगे।
हिंदी के प्राध्यापकों की एक विशेष योग्यता और होती है। पढ़ते-लिखते या शोधकार्य कराते हुए जब वे थक जाते हैं तो अपने मनोरंजन, नहीं-नहीं माफ़ कीजियेगा समाजसेवा विशेषकर विद्यार्थियों के परोपकार के लिए किसी संस्था की स्थापना कर स्वयं उसके अध्यक्ष बन जाते हैं और समानधर्मा लोगों को विभिन्न पदों पर बैठाकर संस्था-संस्था का वह मनोरंजक खेल आरंभ कर देते हैं जिसमें शामिल होना विद्यार्थियों की मजबूरी होती है। संस्था विशेष की सदस्यता लेकर तन-मन- धन से उसकी सेवा करनेवाले विद्यार्थी की सफलता में कोई संदेह नहीं रहता। चूंकि नौकरियों की संख्या हमेशा ही विद्यार्थियों की संख्या से बहुत कम होती है इसीलिए विद्यार्थी बढ़-चढ़कर संस्था के प्रति अपनी निष्ठा का प्रमाण देने में जुट जाते हैं। हां, असंतुष्ट विद्यार्थियों को खेमा बदलने की छूट भी होती है क्योंकि जितने अध्यापक उतने खेमे। जिस अध्यापक का प्रभुत्व या  रसूख, तकनीकी शब्दावली में कहें तो नेटवर्क जितना तगड़ा होता है उसका खेमा उतना ही बड़ा और साख उतनी ही मजबूत। हर संस्था के कुछ तयशुदा मुद्दे होते हैं मसलन कोई भाषा की सेवा के बहाने मेवा बटोरता है तो कोई साहित्य, संस्कृति की फ़िक्र में दुबला हुआ जाता है। कुछ प्राध्यापकों की महानता का अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि वह अपने आप में एक संस्था होते हैं। "इंदिरा इज़ इंडिया" की तर्ज़ पर "पंडित जी इज़ यूनिवर्सिटी" न भी कहें तो "पंडित जी इज़ हिंदी डिपार्टमेंट" तो बेहिचक कहा जा सकता है। अब यह मत पूछिए कि पंडित जी ही क्यों? अरे भाई सीधा सा जवाब है, आरक्षण के सरकारी नियम के बावजूद हिन्दी विषय के सर्वांगीण ज्ञान का अधिकारी पंडित जी के अलावा और कौन हो सकता हैं। मंचों पर जातिवाद को कितना भी क्यों न कोस लिया जाए पर राजनीति के साथ ही शिक्षा जगत में भी जातिवाद धड़ल्ले से चलता है। खैर, कहानी लंबी है, बाकी फिर कभी। उम्मीद बस इतनी है कि परिवर्तन की उजली सुबह कभी तो आएगी।

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