ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अतियों के बीच झूलता अमरीकी समाज
CATEGORY : जन्नत की हकीकत 01-Dec-2016 12:00 AM 1566
अतियों के बीच झूलता अमरीकी समाज

मूल रूप से अमरीकी समाज सनक की सीमा तक पहुंचा हुआ समाज है जिसकी अपनी कुंठाओं से मुक्ति नहीं हुई है। वैसे तो हर समाज की अपनी कुंठाएँ होती हैं और उसे उनसे मुक्त होते हुए अपने अस्त्तित्व पर खतरा लगता है। भले ही भारतीय दर्शन वैदिक काल में बहुत मुक्त और उदार रहा है लेकिन परवर्ती काल में अपनी सुखमय भौगोलिक परिस्थितियों के कारण आलसी, कट्टर और अदूरदर्शी भी हो गया और इसीलिए विश्व की अन्य मजबूरन घुमंतू प्रजातियों की अपेक्षा कम जीवट वाला भी। इसीलिए बार-बार कुछ तो अपनी विभाजित सामाजिक संरचना और कुछ आपसी स्वार्थों के कारण सभी आक्रान्ताओं से पराजित होता रहा। पराजय की इस कुंठा को उसने दूसरों को निम्न, घटिया और असभ्य कहकर भुलाने की कोशिश की और उनकी अच्छी बातों से भी कुछ नहीं सीखा बल्कि कछुए की तरह अपने आप में ही सिकुड़ता गया। कमोबेश किसी न किसी कारण से विश्व के अन्य भागों में भी यही श्रेष्ठता-हीनता-ग्रंथि के रूप में दिखाई देती है और समय-समय पर अपना रंग दिखाती है।
अमरीका में योरप के विभिन्न देशों के लोग धन, विस्तृत भूमि और स्वतंत्रता के सपने लेकर अनेक कष्ट उठाते हुए पहुंचे और अपनी बंदूकों के बल पर स्थानीय प्रजातियों को रौंदते हुए इन दोनों महाद्वीपों पर काबिज़ हो गए। जिनमें सबसे अधिक सफल रहे उत्तरी अमरीका के पूर्वी तट पर बसे इंग्लैण्ड द्वारा शासित तेरह राज्य जिन्होंने सबसे पहले ब्रिटेन से अलग होकर अपने को "संयुक्त राज्य अमरीका" नाम से एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया। इन राज्यों, विशेष रूप से दक्षिणी राज्यों की समृद्धि में काले अफ़्रीकी गुलामों के श्रम का बहुत बड़ा योगदान रहा।
स्वाधीनता के बाद जो दो पार्टियां बनीं वे थीं रिपब्लिकन और डेमोक्रेट। रिपब्लिकन दक्षिण राज्यों की दक्षिण पंथी कट्टरता और उच्चता ग्रंथि से ग्रसित थी। हालांकि पार्टी के नाम से सभी पर एक ही ठप्पा नहीं लगाया जा सकता। इसी पार्टी के राष्ट्रपति हुए अब्राहम लिंकन जिन्होंने गुलाम प्रथा को समाप्त किया और अपने पद और देश की शांति के भंग होने का खतरा उठाते हुए भी इस मानवीय काम को किया। इस दृष्टि से अमरीका अपने आप में एक अद्वितीय देश है। उसी गोरे प्रभुत्त्व और श्रेष्ठता ग्रंथि के चलते आज भी डेमोक्रेट दक्षिण में अधिक शक्तिशाली हैं।
अमरीका की स्वतंत्रता और श्रेष्ठता की सनक ने उसके समाज को एक अति की ओर भी धकेला है। और उसके कारण कहीं न कहीं अनुशासन में भी ढील आई है। वहां के लोगों के लिए अमरीका ही दुनिया में सबसे श्रेष्ठ है और उसके अतिरिक्त दुनिया में कुछ है ही नहीं। इसने उन्हें कूपमंडूक बना दिया है। वे दाढ़ी से मनुष्य को पहचानते हैं। बुर्के से भड़कते हैं। रिपब्लिकन पार्टी इसी का प्रतिनिधित्त्व करती है। डेमोक्रेट इसके विपरीत उदारवाद के हामी हैं। वे रंगभेद, बंदूक संस्कृति आदि को नकारते हैं। वे एक सामासिक जीवन शैली और नीतियों का समर्थन करते हैं। अंततः तो समाज की अर्थव्यवस्था ही सभी सिद्धन्तों को कार्य रूप देती है, वह व्यवस्था इतनी उदार नहीं है। वह ऐसी व्यवस्था है जिसमें कहीं करुणा और संवेदना नहीं है इसलिए डेमोक्रेट के सिद्धांत भी कार्य रूप में नहीं उतरते। और जब मोह भंग होता है तो फिर वह दूसरे अतिवादी छोर को छूता है। एक काले व्यक्ति को राष्ट्रपति चुन सकने वाला देश एक महिला को राष्ट्रपति चुनने से हिचक जाता है। धर्म विशेष के आधार पर एक खास समूह को निशाना बनाने लगता है। मेÏल्टग पॉट की जगह गोरे-काले, मुस्लिम और गैर मुस्लिम, हिस्पानिक और गोरे अमरीकी में बंट जाता है। देशों के बीच दीवार बनवाने तक पहुँच जाता है। और तब राजनीति में ट्रंपवाद का उदय होता है। जिसे अभी अमरीका ही पचा नहीं पा रहा है।
अमरीका अब भी दुनिया का एक धनवान देश है जो चाहे तो मानवीय स्वतंत्रता और गरिमा का एक आदर्श प्रस्तुत कर सकता है। अब भी अमरीका में ऐसे बहुत से लोग हैं जो कालों और अन्य नस्ल के लोगों से मिलने में सकुचाते हैं। यद्यपि अमरीका के संविधान निर्माताओं ने अमरीका के संविधान में वहाँ के नागरिकों को बहुत सी स्वतंत्रताएं दी हैं लेकिन जब तक किसी भी रूप में गोरी श्रेष्ठता और काली हीनता का भाव, गुलाम और मालिक की ग्रंथि समाप्त नहीं होगी तब तक सच्ची एकता और समानता हासिल नहीं हो सकती है। यही हाल भारत का है जहां एक तरफ कुछ जातियों और प्रजातियों में शासक का भाव है तो अन्य में विगत में शासित रहने की कुंठा है। जातियों में भी यही भाव कमोबेश विद्यमान है। इस प्रकार के भेदों को छोटी राजनीति करने वाले दल और व्यक्ति हवा देते हैं।
भारत और अमरीका में प्रकारांतर से विविध समाज हैं इसलिए इनकी समस्याएँ और हल एक ही दिशा में खुलते और संचालित होते हैं। निरंतर एकाग्र और ईमानदार प्रयासों के बिना इस दिशा में सफलता संभव नहीं है। इसीलिए यहाँ नए परिवर्तनों के प्रति अभी लोगों की आशंकाएं समाप्त नहीं हुई हैं। यह इन दोनों ही प्रकार की अतियों की परीक्षा का समय है, अमरीका में भी और अन्य देशों के लोकतंत्र में भी। इसमें सरकारों की नीयत की अपेक्षा जनता की समझदारी ही अधिक बड़ी भूमिका निभा सकती है।

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