ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
खड़ी मैं अकेली कभी सोचा न था
01-Sep-2017 03:51 PM 1266     

खड़ी मैं अकेली

कई बार ढूँढा, उत्तर नहीं पाया
कौन सुलझाए, यह कैसी पहेली
पति, पुत्र, पैसा, सब पाया पर  
लगता क्यों, खड़ी मैं अकेली?
 
कॉलेज के दिन वे सुनहरे
भावुक मन सोचा करता  
परिवार-पैसा हो पास यदि
कोई अभाव नहीं अखरता  
 
फिर एक दिन आया
काम से जी उचटाया  
कुछ ढूँढ़ने निकली मैं
जाने किधर चली मैं
 
फूल से बेटे का घर आना
कुछ दिन लगता रहा सुहाना
अब लगता कोई न संगी-सहेली
सागर का तीर, खड़ी मैं अकेली।




कभी सोचा न था

कभी सोचा न था कि मन में मेरे
कहाँ छिपा था यह प्यार
जो छलक रहा है आने से तेरे
नटखट आँखें, भोला-सा चेहरा  
घुंघराले बाल, कोमल मन तेरा
तेरी किलकारियों ने
गुँजा दिया आँगन
भर दिया सूना मन
जीवन के तारों पर बजी रागिनी
हँसी, आँख बंद-खोल
मीठे, लटपटे बोल
जीवन की छत पर सजी चाँदनी    
खेल रहा पूनम का चाँद आज  
नक्षत्र तारकों के साथ आँगन में मेरे।

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