ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कुछ चीज जेब
CATEGORY : कविता 01-Apr-2017 01:06 AM 302
कुछ चीज जेब

कुछ चीज

कुछ चीजें
एक छोटी-सी चूक
थोड़ी-सी भूल
ज़रा सी लापरवाही से
खराब हो जातीं हैं...
खो देतीं है
अपना रंग रूप
अपनी चमक
अपनी महक...
हो जातीं हैं
बदरंग, बदबूदार...
और इनमें
पड़ जाते हैं कीड़े...
जो धीरे-धीरे
इन्हें खत्म कर देते हैं
पूरी तरह... रिश्ते
इनमें सबसे पहले आते हैं।


जेब

धोने से पहले
टटोली नहीं गई
जेबें...
कभी किसी जेब में
मोड़-माड़कर
रख दी थी एक दिन
जिंदगी...
सहसा कौंधी वो याद
कि किसी जेब में
रख भूले थे ज़िन्दगी के पुर्ज़े
सुख के नोट
खुशियों की रेज़गारी...
जब टटोली तो पाया
वक़्त की मार
और आंसुओं की धार से
बदल गई ज़िन्दगी
लुग्दी में
नोट कट गए थे
अपने मोडों से...
पर रेज़गारी
खनखना कर कहती पाई
खत्म नही हुआ अभी सब
कुछ है जो बचा है
जीने को...

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