ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सिंगापुर के भारतवंशी
CATEGORY : सिंगापुर की डायरी 01-Nov-2016 12:00 AM 2579
सिंगापुर के भारतवंशी

वाणिज्यिक मार्ग के संगम पर बसा सिंगापुर मलाया द्वीप समूह को नापता हुआ भिन्न मूल के लोगों के प्रवाह का गवाह रहा है। सिंगापुर में भारतीय समुदाय की गितनी तो उँगलियों पर ही है पर देश के विकास में छाप उल्लेखनीय रही है। समय के साथ भारतीयों ने इस द्वीप के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में अपनी पहचान बना ली है। सिंगापुर में भारतीयों के आगमन का लिखित साक्ष्य तो सन् 1819 के आस-पास से ही मिलने लगता है। अगर जोड़ें तो यहाँ का लगभग दो सौ वर्षों का इतिहास भारतीयों के हिस्से आता है। भारतीय भी किस रूप में आए; बंदी बनकर, अंग्रेज़ों की मज़दूरी करने और उनकी गुलामी सहने।
सिंगापुर में भारतीय कैदियों का पहला दल सुमात्रा से सन् 1825 के अप्रैल महीने में आया। धीरे-धीरे व्यापारी भी आए। जितने छोटे काम भारतीयों द्वारा कराए गए उसके कई उदाहरण हमें साफ़ दिखाई देते हैं। जंगल साफ़ करना, इमारत बनाना, दूधवाला, चायवाला, धोबी का काम। भारतीय समुदाय ने किस तरह का काम नहीं किया! ऐसा माना जाता था कि इनसे काम कराना ज़्यादा आसान था क्योंकि ये सवाल नहीं पूछते थे।
एक ही काम कई बार इनसे करवाया जा सकता था। ब्रितानी सरकार की "बाँटो और राज करो" वाली नीति के अंतर्गत अलग-अलग क्षेत्रों के मज़दूरों से काम करवाने का चलन था ताकि एक के खिलाफ़ दूसरे को भड़काया जा सके और कभी भी मज़दूरों की कमी न हो।
सन् 1819 में पिनैंग (मलेशिया) के नारायण पिल्लई के सर स्टैम्फ़र्ड रैफ़ल्स के साथ होने की बात इतिहास से पता चलती है। उन्हें ब्रितानी उपनिवेशिक खजाने के खजांची रूप में दिखाया गया है। बाद में सिंगापुर में बढ़ती आवासीय माँग की पूर्ति हेतु ईंट-भट्टे का काम शुरू करने की बात उनसे जुड़ती है। प्रारम्भिक सिंगापुर के भारतीय व्यापारियों में उनका नाम सबसे प्रभावशाली रहा है। मुक्त बन्दरगाह होने के कारण जहाँ सिंगापुर ने चीनियों को आकर्षित किया वहीं भारतीयों को भी आकर्षित किया। अगर मज़दूरों के रूप में भारतीयों ने वहाँ की इमारतें बनाई या जंगल साफ़ किया तो व्यापारियों के रूप में कारोबार भी खूब किया। चेत्तियार तमिल लोगों का साहूकार रूप में खूब वर्णन मिलता है।
सन् 1824 तक सिंगापुर करमुक्त बन्दरगाह के रूप में स्थापित हो चुका था और इस कदम ने चीन और भारत के व्यापारियों को वहाँ आकर्षित करना शुरू कर दिया। उस समय सिंगापुर की कुल जनसंख्या 10,683 थी जिसमें 756 भारतीय थे। यद्यपि काफ़ी भारतीय आरम्भ में औपनिवेशिक सैन्य सन्धि (कोलोनियल मिलिट्री ट्रिटि) के तहत प्रवासी मज़दूर के रूप में आए पर बाद में इस आगमन ने जबदस्ती लाने का रूप धारण कर लिया। पहली बार सन् 1825 में 80 कैदियों को मद्रास से लाया गया तथा बाद में 122 कैदियों को बंगाल के बन्दरगाह से लाया गया जो भिन्न भारतीय भू-भाग से जुड़े हुए थे जैसे बनारस के ब्राह्मण, सिक्ख और डोगरा क्षत्रिय, चेत्तियार, बंगाली और पारसियों के साथ ही अलग-अलग हिस्सों के अछूत भी शामिल थे। उन कैदियों को ब्रास बासाह रोड में निवास करने का स्थान मिला और उनका मुख्य काम जंगलों को साफ़ करना, सड़क निर्माण, नहर, पुल, इमारत आदि का निर्माण था। उन कैदियों ने सिंगापुर के स्थापत्य के कुछ खास बारीक नमूनों का निर्माण किया जैसे (1862) में सैंट एंड्रयू कैथेड्रेल और (1869) में इस्ताना। सन् 1860 तक उन कैदियों की संख्या 2275 तक पहुँच गई थी। हालाँकि उनमें से कुछ वापस मुल्क भी लौट गए थे।
बागान और बन्दरगाह के विकास के साथ ही 19वीं सदी के मध्य में बड़ी संख्या में भारतीय मज़दूरों का प्रवास हुआ। व्यावसायिक तौर पर कत्था, लौंग, जायफल, अनन्नास, गन्ना और बाद में रबड़ की खेती में चीनी कृषक ही हावी रहे पर यूरोपियन खेतिहरों ने भारतीयों को रखा साथ ही दुग्ध-व्यवसाय और धुलाई क्षेत्र में भारतीयों ने मुख्य कमान सँभाली।
स्थानीय रूप से पढ़े-लिखे लोगों की कमी को पूरा करने के लिए वैसे तो दक्षिण भारतीय यहाँ मध्यवर्गीय पेशे को अपनाने के लिए काफ़ी संख्या में आए पर अगर उत्तर भारतीयों की बात की जाए तो सन् 1870 में सिक्खों का पुलिस सिपाही के रूप में आना शुरू हुआ। अन्य कई स्थानों की सफ़लता के बाद यह धारणा बन गई कि सिक्ख पुलिस की नौकरी के लिए उपयुक्त हैं।
सिंगापुर के अभूतपूर्व विकास ने भारतीय व्यापारियों को भी आकर्षित किया। भारतीय व्यापारियों में सिंधी, गुजराती, पारसी, सिक्ख और तमिल मुसलमान समुदाय ने अग्रणी भूमिका दिखाई। ये व्यापारी वस्त्र-व्यवसाय और बिजली के उपकरण के व्यवसाय से मुख्य रूप से जुड़े हुए थे। इन व्यापारियों ने स्वयं को थोक व खुदरा व्यापारी के रूप में स्थापित किया।
सिंगापुर में गौण भारतीय समुदायों में अन्तर ज़्यादा व्यापक था और खासकर उत्तर प्रदेश के प्रवासियों में। इस समुदाय की कई श्रेणियाँ परिलक्षित होती हैं- बंगाली, बाबू, यूपी वाला, भोजपुरी, बिहारी आदि। इन सबने अपने को एक नाम "हिन्दुस्तानी" से जोड़ने का प्रयास किया और इन समुदायों के बुज़ुर्ग आज भी ख़ुद को हिन्दुस्तानी ही कहते हैं।
आरम्भिक सिंगापुर में दो महत्वपूर्ण व्यापार धोबी और दूध बेचने के काम में इन हिन्दुस्तानी प्रवासियों ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भले ही उनकी भूमिका प्रभावशाली या प्रधान न रही हो परन्तु कपड़े धोने की मशीन के आगमन और सीलबन्द दूध के प्रयोग से पहले तक इन्हीं लोगों ने इस व्यवसाय पर राज किया। हिन्दुस्तानी लोग चौकीदार, जेल-संरक्षक, चायवाला, मिठाईवाला, पानवाला आदि रूपों में भी ब्रितानी राज के समय दिखाई देते हैं।
सिंगापुर में दक्षिण भारतीय शैली के बने लगभग 35 मंदिर हैं जिनसे स्पष्ट रूप से भारतीय आबादी में तमिल आबादी के हावी का आभास होने लगता है। उनके साथ ही तेलगू, मलयाली, पंजाबी और उत्तर भारतीयों की संख्या भी अब काफ़ी बढ़ गई है। अतीत में गौर करने पर कई भारतीय नाम उजले पन्नों पर नज़र आने लगते हैं। कई राजनीति में तो कई व्यापार में नज़र आते हैं। आज पूरे आईटी सेक्टर पर भारतीयों का बोलबाला है। राजनीति की बात करें तो एस. राजारत्नम का नाम सबसे पहले आता है। वे सिंगापुर के प्रथम प्रधानमंत्री श्री लीक्वान यू और अन्य महत्वपूर्ण लोगों के साथ पिपुल्स एक्शन पार्टी के गठन में मुख्य कर्ता-धर्ता थे। स्वतंत्र सिंगापुर के पहले विदेश मंत्री के रूप में उन्होंने कई मिसाल कायम किए। सिंगापुर का राष्ट्रीय वचन सन् 1966 में उन्हीं के द्वारा लिखा गया। सिंगापुर के तीसरे राष्ट्रपति के रूप में सी. वी. देवन नायर का नाम भारतीयों की सूची में चार चाँद लगाता है। एस. धानाबालन, एस. जयकुमार, बालाजी सदासिवन, थरमन संमुग्रत्नम, विवियन बालाकृष्णन आदि कई भारतीय सिंगापुर की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। राजनीति के साथ ही व्यापार के क्षेत्र में भी कई बड़े नाम भारतीयों की झोली में गिरते हैं जैसे सत्पाल कट्टर, ईश्वर दास शर्मा, मुस्ताक़ अहमद यानी मोहम्मद मुस्तफ़ा, राजकुमार व अशोक हीरानन्दानी आदि। अगर आज सिंगापुर के भारतीयों पर नज़र डाली जाए तो हर क्षेत्र में वे पाँव फैलाये नज़र आएँगे। कई भारतीय जो यहाँ आए तो सिर्फ कारोबार या नौकरी के सिलसिले में पर कुछ समय बाद यहीं के बन कर रह गए। आज न सिर्फ वे सिंगापुर नागरिक हैं बल्कि पूरी तरह से इस देश के विकास में रत हैं।

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