ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कफ़न मृत्यु नहीं, जीवन की कहानी है
01-Dec-2017 10:18 PM 3360     

कफ़न (दिसंबर 1935) कहानी प्रेमचंद की सबसे अधिक चर्चित, विवादास्पद एवं लोकप्रिय कहानी है। कफ़न कहानी पर जितने दृष्टिकोणों, विचारों और वादों से विचार विवेचन हुआ है, यदि उसे यहाँ उद्धृत किया जाये तो एक पूरी पुस्तक ही तैयार हो जाएगी। इन सभी में राजेंद्र यादव के इस मत की विवेचना अधिक हुई है कि कि कफ़न हृदय-स्तब्धता या विजड़ित संवेदना की कहानी है। इस स्थापना के दो आधार हैं- एक, आलू खाने के लालच में घीसू-माधव का बुधिया को मरने देना और दूसरा, दोनों का कफ़न के पैसों से शराब पीना और मस्ती में झूमना-नाचना। ये दोनों ही अमानवीय एवं संवेदन शून्यता की घटनाएँ हैं, परंतु कहानी का सारा वातावरण ऐसा नहीं है। उसमें संवेदना और मानवीयता से परिपूर्ण प्रसंगों की कमी नहीं है। घीसू में हमदर्दी का भाव है। उसकी औरत मरी थी तो वह तीन दिन तक उसके पास से हिला भी नहीं था। वह माधव से प्रसव-वेदना से चीखती बुधिया को देखने-संभालने को कहता है। बुधिया मरती है तो पड़ोसी सांत्वना देते हैं और गाँव की नर्म दिल वाली स्त्रियां आंसू बहाने आती हैं तथा गाँव के दूसरे लोग कफ़न तथा लकड़ी को एकत्र करने में मदद करते हैं। यह सब गाँव की सामूहिक संवेदना का प्रमाण है, माधव का दो बार रोना भी भावावेग ही है। हंसना और रोना दोनों ही मनुष्य की संवेदनशीलता के अंग हैं। "गोदान" सन 1936 में प्रो. मेहता यही बात गोविंदी से कहता है, "मैं कहता हूँ, अगर तुम हँस नहीं सकते और रो नहीं सकते, तो तुम मनुष्य नहीं हो, पत्थर हो।" प्रेमचंद की भी एक लेखक के रूप में यही राय है। उन्होंने "हंस" के मई 1935 के अंक में लिखा था कि साहित्य भावुकता की वस्तु है, लेकिन आदर्श साहित्य वही है जिसमें बुद्धि और भावुकता का कलात्मक सम्मिश्रण होता है। यदि रचना में हँसने और रोने के भावुक क्षण नहीं हैं तो ऐसा सूखा साहित्य अगर अमृत भी हो पड़ा-पड़ा भाप बनकर उड़ जायेगा और जनता के मनोभावों का स्पर्श भी न कर सकेगा। स्पष्ट है, प्रेमचंद अपनी किसी भी रचना को संवेदना-शून्य नहीं बनाना चाहते हैं। मानव के व्यवहार और विचारों में तो मनोभावों और मनुष्यता का रंग है। वह पत्नी के प्रति कृतज्ञ हैं, क्योंकि उसके कारण ही उसे वह भोज मिला जो उम्र भर न मिला था। वह "दु:ख और निराशा" में चीख मार-मारकर रोता है यह सोचकर कि बुधिया ने जीवन में कितना दुःख झेला है। उसका मनुष्यत्व एक भिखारी को देखकर जाग्रत होता है और वह बची हुई पूड़ियाँ उसे दे देता है और लेखक इस पर लिखता है कि उसे पहली बार देनेे का गौरव, आनंद एवं उल्लास का अनुभव होता है। यह आत्मिक गौरव और आह्लाद तो माधव को उस समय भी नहीं था, जब वह मधुशाला में बैठकर जीवन की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर रहा था। माधव की यह आनंदानुभूति चाहे एक-दो क्षण लिए ही थी, परंतु लेखक उसके व्यक्तित्व के मानवीय तथा सकारात्मक पक्ष का उद्घाटन कर देता है। यह सारे प्रसंग "कफ़न" कहानी को विजड़ित संवेदना की कहानी की स्थापना पर प्रश्न चिह्न लगा देते हैं।
कफ़न कहानी में तीन परिच्छेद हैं, दो पात्र और दो ही रंगमंच हैं। कहानी की प्रमुख घटनाएं गाँव और मधुशाला में घटित होती हैं। घीसू माधव ही दोनों स्थलों पर कथा का विकास करते हैं, लेकिन उनकी मन:स्थिति, परिवेश और क्रिया-व्यापार भिन्न-भिन्न हैं। गाँव में चीख है, मौत है, अमानुषीय व्यवहार है और कफ़न के लिए पैसे एकत्र करने की भागदौड़ है और मधुशाला में जीवन की जगह मौत को सम्मान देने पर आपत्ति है, मदिरा है, चिर अभिलाषित भोजन है, गौरव-आनंद-उल्लास है, परलोक-बैंकुठ-आत्मा-परमात्मा में विश्वास है, नशे में अस्थिरता, विस्मृति और कृतज्ञता है और अंत में कबीर का एक पद है जो धार्मिक कर्मकांड को असत्य कहता है। माधव मधुशाला में प्रवेश से पहले एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हुए कहता है, "कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढँकने को चिथड़ा भी न मिले उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।" यह हमारी सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था की विडंबना पर गहरा व्यंग्य है। यह कहानी में पहला बौद्धिक हस्तक्षेप है जो विचार के लिए एक सूत्र देता है। यह वाक्य जीवन और मृत्यु के संबंध में हमारी सामाजिक-धार्मिक धारणाओं पर आघात करता है। जीवन से अधिक समाज मृत्यु को सम्मान देता है तभी मृतक को नया कफ़न और जीवित को फटा वस्त्र भी उपलब्ध नहीं कराता है। यह माधव ही नहीं, कहानी भी यह प्रश्न उठाती है कि हमारे समाज में जीवन का महत्व एवं सम्मान मृत्यु से कम क्यों हैं? हमारी यह परंपरा विश्वास और कर्मकांड जीवन विरोधी हैं क्योंकि मृत्यु जीवन से श्रेष्ठ नहीं है। वास्तव में, जीवन ही श्रेष्ठ है और वही सत्य है। जीवन है तो अभिलाषाएँ और लालसाएँ भी होंगी और उन्हें तृप्त एवं पूर्ण करने के लिए उचित-अनुचित साधनों का उपयोग होता ही रहेगा।
घीसू-माधव के अंतर्मन की दुनिया कफ़न के लिए एकत्र पाँच रुपये हाथ में आते ही बदलने लगती हैं। कफ़न खरीदने का विचार कमजोर होता जाता है और जीवन की सबसे बड़ी लालसा पंख फड़फड़ाने लगती है। इस लालसा के प्रकट होने से पहले वह नया कफ़न खरीदने के अनौचित्य पर तीन तर्क प्रस्तुत करते हैं- रात को कौन कफ़न देखता है, इसलिए कफ़न कैसा भी हो सकता है, जीवित को जब चीथड़ा भी नसीब नहीं है तो मृतक को नया कफ़न क्यों मिलना चाहिए था कफ़न तो लाश के साथ जल जाता है तो वह नया हो या पुराना, क्या फर्क पड़ता है। इन्हीं विचारों के साथ वे बाजार जाते हैं तथा कफ़न के लिए तरह-तरह के कपड़े देखते हैं, परन्तु उन्हें कोई कपड़ा नहीं जँचता नहीं है और वे लेखक के अनुसार "दैवी प्रेरणा" और "पूर्व निश्चित व्यवस्थानुसार" एक मधुशाला के अंदर चले जाते हैं। यहाँ लेखक के ये दोनों कारण बुद्धिगम्य नहीं हैं, क्योंकि कोई देवी प्रेरणा तथा पूर्व निश्चित व्यवस्था के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करेगा, और यदि कोई दैवी शक्ति है भी तो वह क्यों मृतक के अंतिम संस्कार की अपेक्षा उन्हें मदिरालय में भेजना चाहेगी? लेखक ने प्रकट में कोई तर्कसंगत कारण नहीं दिया है, परन्तु कहानी के आरंभ में हमें एक सबल कारण मिलता है। घीसू आलू खाते समय ठाकुर की बारात में खाई दावत का स्वाद ले-लेकर बखान करता है और माधव इस भोज का मन-ही-मन आनंद लेता है। इससे माधव के मन में भी ऐसे ही भोज की लालसा उत्पन्न होती है। वह कहता भी है, "अब हमें कोई ऐसा भोज नहीं खिलाता।" माधव की लालसा कहानी की भावी घटनाओं को रचती है और उसे चरम परिणिति तक ले जाती है। माधव की इस लालसा के उत्पन्न होने के बाद ही बुधिया की मौत होती है। कफ़न के पाँच रूपये बाप-बेटे के हाथ में आते हैं और उनके अंतर्मन में उभरी लालसा उन्हें मधुशाला के तृप्ति-स्थल पर जैसे खींचकर ले जाती है। घीसू तो ठाकुर की दावत में भरपेट स्वादिष्ट भोज का आनंद ले चुका था, परंतु वहां शराब नहीं मिली थी। माधव तो इन दोनों ही आनंदभूतियों से वंचित था, परंतु दोनों के मन में एक जैसे ही विचार से आंदोलित होते हैं। लेखक लिखता है, "दोनों एक दूसरे के मन की बात ताड़ रहे थे।" दोनों के मन में मधुशाला कौंध रही थी और दोनों एक-दूसरे की इस लालसा को समझ रहे थे। इस कारण वे मधुशाला के सामने पहुंचकर एक साथ अंदर चले जाते हैं।
घीसू-माधव मधुशाला में पहुंचकर दोनों जरा़ देर के लिए असमंजस में खड़े रहते हैं। उनके अंदर आने तक उनके मन में कोई ग्लानि, पश्चाताप, दुविधा या अपराधबोध नहीं है, परंतु शराब की बोतल खरीदने से पहले असमंजस में खड़े रहते हैं। लेखक इस "असमंजस" शब्द से उनके अंतद्र्वंद्व को प्रकट करता है कि कफ़न के पैसों से शराब पीना पाप-कर्म तो नहीं है? घीसू तो बहुत दुनिया देख चुका था, लेकिन माधव ऐसा कार्य पहली बार करने जा रहा था। इसलिए लेखक माधव के मन में पाप-बोध उत्पन्न करता है, मधुशाला का पूरा आनंद तो पापी मन से लिया नहीं जा सकता था। इसी कारण माधव अपनी "निष्पापता" के लिए देवताओं को साक्षी बनाता है। कहानीकार ने लिखा है "माधव आसमान की तरफ देख कर बोला, मानो देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो।" माधव के मन में पाप चेतना नहीं होती तो लेखक यहाँ निष्पापता के लिए देवताओं तक का प्रमाण क्यों देता? माधव अपने जीवन की सबसे बड़ी लालसा की तृप्ति के इस दुर्लभ अवसर का आनंद पाप की छाया में नहीं ले सकता था। लेखक के अनुसार, मधुशाला वैसे भी अपने प्रेमियों को जीवन की बाधाओं तथा जीवन मरण की स्मृति तक से मुक्त कर देती है, मधुशाला में जीवन का निद्र्वन्द आनंद है और बाहरी संसार के घोर अभावों, कष्टों और पापों का विस्मरणस्थल है। घीसू-माधव के मधुशाला में आते ही उनके मन से मृत्यु-शास्त्र हट जाता है। वे अब मौत का मर्सिया नहीं गाते हैं, बल्कि वे जीवन की नयी सरगम छेड़ते हैं। इसमें जीवन की अतृप्त एवं दबी लालसाएं हैं और उनकी तृप्ति का आनंद है। यहाँ की आनंदानुभूति और उल्लास मृत्यु को प्राप्त करके उसे चेतना से ही लुप्त कर देता है और यहाँ तक भी अस्तित्व-बोध की चेतना भी यहाँ के सुख-सागर में विलीन हो जाती है।
घीसू और माधव का मधुशाला में प्रवेश भीतरी और बाहरी सभी दबावों से मुक्ति का प्रमाण है। उनके लिए पारिवारिक दायित्व, सामाजिक मर्यादाएँ एवं नैतिक बोध जैसे निरर्थक एवं प्राणहीन है। वे जब शराब की बोतल बीच में रखकर पीने बैठते हैं तो वे अपनी व्यक्तिगत लालसाओं की तृप्ति का अनुष्ठान करते हैं। निर्मल वर्मा ने लिखा है कि दो हिंदुस्तानी पियक्कड़ों का शमशान की छाया में हुआ यह मुक्ति-समारोह है। वे जैसे ही कफ़न के पैसों से शराब का कुल्लड़ मुँह से लगाते हैं, उसी क्षण हिंदी साहित्य में व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का स्वाद चखता है। उन्हें यह मुक्ति और स्वतंत्रता बौद्धिक कौशल एवं आत्मछल से मिलती है।
वे परिवार और गाँव वालों दोनों के अपराधी हैं। वे पहले अपराधी अपने परिवार के हैं। बाप-बेटा दोनों घर की बहू को मरने देते हैं और वह भी प्रसव-पीड़ा में चीखती-चिल्लाती बहू को, जो उनकी उपेक्षा और असहयोग के कारण पेट के शिशु के साथ मर जाती है। वे इस अमानुषीय अपराध के दोषी हैं। दूसरे गाँव वालों के दोषी हैं। गाँव के लोग उन्हें बुधिया के कफ़न के लिए पाँच रूपये एकत्र करके उनके हाथ में देते हैं, परंतु वे विश्वासघात करते हैं और मधुशाला में जाकर शराब पीते हैं। गाँव के लोग तो उन्हें पहले से ही कामचोर, आलसी, बेशर्म और झूठे मानते थे और वे भी इस सत्य को जानते थे। अतः उन्हें कोई नया विश्वासघात करने में कोई भय नहीं था। वे जानते हैं और घीसू माधव को समझाता भी है कि गाँव वाले ही दोबारा कफ़न की व्यवस्था करेंगे। इसलिए कफ़न के पैसों से शराब पीना अनुचित इसलिए नहीं है, क्योंकि बुधिया को तो कफ़न मिल ही जाएगा। उनका यह दृढ़ विश्वास उन्हें जीवन के निकृष्टतम अपराध करने के दंश से बचा लेता है। वे मृतक को नया कफ़न देने की धार्मिक, सामाजिक एवं नैतिक अनिवार्यता के दायित्व से भी स्वयं को मुक्त कर लेते हैं और उसके अपराध बोध से भी अपना बचाव कर लेते हैं। इसी कारण वे निद्र्वंद्व और निÏश्चत होकर मधुशाला में पहुँचते हैं और अपने जीवन की सबसे बड़ी लालसा की पूर्ति के लिए बोतल खरीद कर पीने बैठते हैं। इस प्रकार उनकी छलपूर्ण तर्कशीलता उन्हें निरपराधी रूप में मधुशाला तक पहुँचा देती है।
घीसू-माधव मदिरालय में बोतल लेकर बैठते हैं तो उनके मनोभाव, व्यवहार तथा विचार में परिवर्तन होता है। इस अंश की मूल घटना यह है कि वह अपने जीवन की सबसे बड़ी लालसा की पूर्ति के लिए मन भर कर शराब पीते हैं। भोजन करते हैं, बचा हुआ भोजन भिखारी को देते हैं और आनंद विभोर होकर मस्ती में गाते, नाचते, कूदते भटकते एवं अभिनय करते हैं तथा "नशे से बदमस्त" होकर गिर पड़ते हैं। यह उनके जीवन की सुखानुभूति की चरमावस्था है, जब जीवन के सारे सुख-दु:ख मिट जाते हैं, सांसारिक चेतना लुप्त हो जाती है और रहता है केवल आत्मिक आनंद। इस अनुभूति में एक तो मधुशाला का मादक वातावरण एवं मदिरापान से होने वाली चेतना शून्यता सहायक बनी है, दूसरे धार्मिक एवं दार्शनिक विश्वासों तथा आस्थाओं के संसार में उतर कर स्वयं पापनुभूति से मुक्त करके निश्शंक एवं निद्र्वन्द बनते हैं। लेखक ने स्वयं घीसू के "दार्शनिक भाव" से बोलने तथा मानव पर "श्रद्धालुता का रंग" चढ़ने का उल्लेख किया है, क्योंकि घीसू-माधव अब अपने पूर्व दुष्कर्मों और उनके दुष्परिणामों को धार्मिक-दार्शनिक शब्दावली में छिपाकर बुधिया को बैकुंठ तक पहुँचा देते हैं। वे दोनों आत्मा-परमात्मा, परलोक, बैकुंठ, पाप-पुण्य, माया-जाल आदि धार्मिक दार्शनिक शब्दों के प्रयोग से बुधिया की मौत को गौरवांवित करते हैं और इनकी आड़ में वे एक बार फिर अपने पाप-कर्म को छिपा लेते हैं। घीसू-माधव के वार्तालाप में बुधिया का ही गुणगान है। बुधिया पुण्यवान है, क्योंकि उसकी मृत्यु उनके लिए पुण्य-कर्म बनती है। उसकी मृत्यु से ही उन्हें शराब तथा स्वादिष्ट भोजन मिलता है जो उन्हें उम्र-भर नहीं मिला था। इससे घीसू की आत्मा तृप्त होती है और माधव की तो जीवन की सबसे बड़ी लालसा पूरी होती है। इन दोनों के लिए इससे बड़ा पुण्य बुधिया की ओर से क्या हो सकता था? बुधिया जब जीवित थी तो इनका दोजख़ थी और मरी तो इन्हें जीवन का सबसे बड़ा सुख दे गई। बुधिया निर्मल हृदय थी और मानवता उसकी जीवन-शैली थी। वह न किसी को सताती थी और दबाती थी। अतः वैकुंठ न जायगी तो कौन जायगा? माधव इसलिए पूरे विश्वास के साथ घीसू से कहता है, "वह वैकुंठ में जायगी दादा, वैकुंठ में जायगी।" माधव घीसू के संतोष के लिए एक और नया तर्क लाता है। वह कहता है कि बुधिया बैकुँठ न जायगी तो क्या गरीबों को दोनों हाथों से लूटने वाले मोटे-मोटे लोग जायेंगे जो अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं। कहानी में इस कथन से कई अर्थ निकलते हैं। एक, गरीबों को लूटने वाले यह मोटे लोग सामाजिक अपराधी हैं। इनके पाप इतने भयानक और गंदगी से भरे हैं कि गंगा भी उन्हें निर्मल नहीं कर सकती है। दो, जो पापी यह समझते हैं कि गंगा पापों को धो देती है, वे तो अज्ञानी हैं। तीसरा, ऐसे मोटे पापियों और दुनिया में कोई समानता नहीं है। यह उनका कितना बड़ा बौद्धिक छल है कि ये मोटे-मोटे पापियों की तुलना अपने उस पाप-कर्म से नहीं करते हैं जो उन्होंने बुधिया और उसके पेट के बच्चे को मरने देने में किया है। वे उस बुधिया के साथ तुलना करते हैं, जो निष्पापी है और उनके शब्दों में पुण्यवान है और उसे अवश्य ही वैकुंठ मिलेगा। घीसू के अनुसार वह भाग्यवान भी है क्योंकि वह इतनी जल्दी संसार के मायाजाल के बंधन तोड़ कर चली गई। इस प्रकार वह किसी धर्म-गुरु अथवा पुरोहित के समान धार्मिक शब्दों और धारणाओं के द्वारा बुधिया को परलोक के सर्वोच्च स्थान पर पहुँचा कर स्वयं भी अपने जीवन का सबसे बड़ा सुख प्राप्त करते हैं। बुधिया तो इनके काल्पनिक परलोक के बैकुंठ में पहुंचती है लेकिन घीसू-माधव को अपने बैकुंठ जैसे सुखानुभव के लिए बुधिया के समान मरने की आवश्यकता नहीं है। वे जीवितावस्था में ही अपने जीवन की सबसे बड़ी लालसाओं को पूर्ण करते हैं और अपूर्व उल्लास एवं आनंद की अनुभूति करते हैं। असल में भाग्यशाली तो घीसू-माधव हैं जो मौत की काली छाया में भी जीवन का सबसे बड़ा सुख और आनंद खोज निकालते हैं और बुधिया की मौत के अपराध-दंश से भी अपने को बचा कर रखते हैं। यद्यपि उनकी यह आनंदानुभूति अल्पावधि की है, परंतु वे क्षण उनके जीवन के सर्वोत्तम क्षण हैं। उनका यह सुख एकदम निजी है। वे ही उसके नियंता और नियोजक हैं। वे इसके लिए पारिवारिक दायित्वों एवं सामाजिक नैतिकता को नकारते हैं और लोक-परलोक आदि की धार्मिक एवं दार्शनिक शब्दावली का दुरुपयोग करके इस बाहरी दुनिया को एकदम अदृश्य कर देते हैं। प्रेमचंद की कहानियों में यह व्यक्ति की निजी सत्ता का आरंभ है।
प्रेमचंद चाहते तो कहानी का अंत यहीं कर सकते थे, क्योंकि मृत्यु पर जीवन की विजय का उत्सव अपनी अंतिम परिणिति पर पहुँचकर मूर्छित होकर गिर पड़ता है। यह आनंदानुभूति की चरम अवस्था है। जब अस्तित्व की संज्ञा भी शून्य हो जाती है। घीसू-माधव के लिए तो यह लोक में लोकोत्तर आनंद जैसा ही है, जो बुधिया के लोक बैकुंठ यात्रा से कहीं श्रेष्ठ और अनुभूतिजन्य है। घीसू-माधव का आनंद वास्तविक जगत का आनंद है और दुनिया का बैकुंठ कहाँ है, इसे कोई नहीं जानता है। प्रेमचंद की स्थिति को सिद्ध करने के लिए कबीर के पद की आरंभिक पंक्ति को उद्धृत करते हैं। घीसू-माधव कहानी के अंत में नशे में बदमस्त होकर गाते हैं- "ठगनी! क्यों नैना झमकावै! ठगनी।" कहानी में यह पद पूरा नहीं है, लेकिन "अग्नि-समाधि" (जनवरी 1928) कहानी में इसे इस प्रकार दिया गया है : ठगनी! क्यों नैना झमकावै!/कद्दू काट मृदंग बनावे, नीबू काट मंजीरा,/पाँच तरोई मंगल गांवे, नाचे बालम खीरा।/रूपा पहिर रिझावे,/गले डाल तुलसी की माला, तीन लोक भरमावे।"
कबीर की ठगनी माया है, जो मनुष्य को अनेक रूपों में भरमाती है। इनमें धर्म के कर्मकांड और लोकोत्तर विश्वास भी भ्रमोत्पादक हैं। कबीर जिसे "गले डाल तुलसी की माला" से संबोधित करते हैं, उनमें पाप-पुण्य, आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक-बैकुंठ आदि हमारी परंपरागत धारणाएँ एवं विश्वास हैं, वे सब छलनाएँ हैं जो भरमाती हैं। इस संसार के अतिरिक्त और कोई पारलौकिक संसार नहीं है, इसलिए ऐसे सभी विश्वास भी सत्य नहीं है। इसलिए बुधिया की बैकुंठ यात्रा तथा माया-जाल का भंजन आदि में कोई सत्यता नहीं है, वे मिथ्या और भ्रामक हैं। सत्य है तो जीवन ही सत्य है।

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